फिजिकल हेल्थ- क्या है ट्यूमर मार्कर टेस्ट:  क्या समय से पहले पता लग सकता है कैंसर का, किसे और कब करवाना चाहिए ये टेस्ट
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फिजिकल हेल्थ- क्या है ट्यूमर मार्कर टेस्ट: क्या समय से पहले पता लग सकता है कैंसर का, किसे और कब करवाना चाहिए ये टेस्ट

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13 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी

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पूरी दुनिया में हर साल लगभग 6 करोड़ लोगों की मौत होती है। हर साल कैंसर के कारण दुनिया में करीब 1 करोड़ लोगों की मौत होती है। इसका मतलब है कि दुनिया में हर छठी मौत कैंसर के कारण होती है। ज्यादातर कैंसर के मामले तीसरी-चौथी स्टेज में पता चलते हैं। इसलिए इसका इलाज मुश्किल हो जाता है और ज्यादातर लोगों की मौत हो जाती है। अगर शुरुआती स्टेज में कैंसर का पता चल जाए तो इसका इलाज काफी हद तक आसान हो सकता है और कई लोगों की जान बचाई जा सकती है।

कैंसर या ट्यूमर का समय पर पता लगाने के लिए मेडिकल साइंस में कुछ तरीके हैं। इनमें से एक है- ट्यूमर मार्कर टेस्ट। यह ब्लड या बॉडी फ्लूड टेस्ट है, जिसकी मदद से कैंसर सेल्स से जुड़े कुछ खास प्रोटीन या जेनेटिक बदलावों को पहचाना जा सकता है। इस टेस्ट से 4 चीजों का पता लगाया जा सकता है-

  • ट्यूमर की आशंका
  • ट्यूमर का प्रकार
  • ट्यूमर का विस्तार
  • इलाज का जरूरी तरीका

इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज ट्यूमर मार्कर टेस्ट की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • ये टेस्ट कैंसर डायग्नोज करने में कैसे मदद करते हैं?
  • क्या हर कैंसर के लिए अलग ट्यूमर मार्कर होता है?
  • किसे और कब ये टेस्ट कराने चाहिए?

हर साल बढ़ रहे कैंसर के मामले

साल 2022 में करीब 2 करोड़ लोगों को कैंसर हुआ और लगभग 97 लाख लोगों की इससे मौत हो गई। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के मुताबिक, साल 2050 तक दुनिया में हर साल 3.3 करोड़ नए कैंसर केस आ सकते हैं और इससे मौत का आंकड़ा 1.82 करोड़ तक पहुंच सकता है। ट्यूमर मार्कर टेस्ट की मदद से मौतों का आंकड़ा कम हो सकता है।

क्या है ट्यूमर मार्कर टेस्ट?

ट्यूमर मार्कर टेस्ट ब्लड या बॉडी फ्लूइड के जरिए शुरुआती स्टेज में कैंसर का पता लगाने का तरीका है।

ट्यूमर मार्कर टेस्ट में आमतौर पर प्रोटीन को मापा जाता है। शरीर की सामान्य कोशिकाएं ये प्रोटीन बनाती हैं, लेकिन कैंसर कोशिकाएं इन्हें बहुत अधिक मात्रा में बनाने लगती हैं। कोशिकाओं की यह असामान्य एक्टिविटी ही ट्यूमर या कैंसर की ओर इशारा करती है।

ये टेस्ट कैंसर डायग्नोस करने में कैसे मदद करते हैं?

ट्यूमर मार्कर टेस्ट पूरी तरह कैंसर की पुष्टि नहीं कर सकता है, लेकिन यह शुरुआती संकेत देता है कि शरीर में कुछ गड़बड़ हो रही है। अगर ट्यूमर मार्कर का लेवल सामान्य से बहुत ज्यादा है तो डॉक्टर कैंसर की आशंका को लेकर आगे की जांचे जैसे- बायोप्सी, MRI या CT स्कैन कराने की सलाह दे सकते हैं। ये टेस्ट शुरुआती स्टेज में कैंसर पहचानने में मदद करते हैं और बाकी टेस्ट्स के लिए रास्ता साफ करते हैं।

क्या ये टेस्ट इलाज में भी मददगार होते हैं?

ट्यूमर मार्कर सिर्फ बीमारी की पहचान में ही मदद नहीं करते हैं, बल्कि इलाज के असर को जांचने में, बीमारी के दोबारा होने पर इसका पता लगाने और सही इलाज तय करने में भी मदद करते हैं।

अगर इलाज के बाद टेस्ट होने पर ट्यूमर मार्कर घट रहे हैं, तो मतलब है कि इलाज असरदार है। अगर इलाज के बाद कुछ समय में ये फिर से बढ़ने लगे तो समझा जा सकता है कि कैंसर वापस लौट रहा है।

क्या ट्यूमर मार्कर बढ़ने का मतलब कैंसर होता है?

डॉ. दिनेश सिंह कहते हैं कि ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार ऐसा भी होता है कि ट्यूमर मार्कर का लेवल किसी इन्फेक्शन, सूजन या किसी नॉन-कैंसर कंडीशन की वजह से बढ़ गया है। इसलिए सिर्फ इसी टेस्ट के आधार पर कैंसर का फैसला नहीं किया जाता है। अगर डॉक्टर को कैंसर की आशंका होती है को डॉक्टर इसकी पुष्टि के लिए दूसरी जांच करने को भी कहते हैं।

किसे और कब ये टेस्ट करवाने चाहिए?

ट्यूमर मार्कर टेस्ट हर किसी के लिए रेगुलर चेकअप का हिस्सा नहीं होते हैं। यह खासतौर पर कुछ लोगों को कराया जाता है, ग्राफिक में देखिए-

ट्यूमर मार्कर टेस्ट से जुड़े कॉमन सवाल और जवाब

सवाल: क्या ट्यूमर मार्कर टेस्ट 100% भरोसेमंद होते हैं?

जवाब: डॉ. दिनेश सिंह कहते हैं कि यह जरूरी सवाल है। असल में ट्यूमर मार्कर टेस्ट कैंसर की पुष्टि नहीं करते हैं। ये सिर्फ संकेत देते हैं कि शरीर में कुछ गड़बड़ हो सकती है। कई बार इसके टेस्ट का नतीजा पॉजिटिव आता है, लेकिन व्यक्ति को कैंसर नहीं होता है। वहीं, कभी कैंसर मौजूद होने के बावजूद टेस्ट सामान्य आता है।

इसलिए डॉक्टर इन टेस्ट को सपोर्टिव डायग्नोस्टिक टूल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। सही डायग्नोसिस के लिए हमेशा क्लिनिकल टेस्ट, बायोप्सी और इमेजिंग जैसे टेस्ट जरूरी होते हैं।

सवाल: क्या ट्यूमर मार्कर टेस्ट से कैंसर की स्क्रीनिंग की जा सकती है?

जवाब: सामान्य तौर पर ट्यूमर मार्कर टेस्ट को कैंसर स्क्रींनिंग के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ये टेस्ट रेगुलर हेल्थ चेकअप का हिस्सा नहीं होते हैं।

हालांकि, कुछ हाई-रिस्क ग्रुप जैसे- जिनके परिवार में कैंसर की हिस्ट्री है या जिनमें BRCA म्यूटेशन है, उनके लिए डॉक्टर CA-125, PSA जैसे मार्कर की स्क्रींनिंग की सलाह दे सकते हैं। यह टेस्ट सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर ही करवाना चाहिए।

सवाल: ट्यूमर मार्कर टेस्ट की कीमत क्या है और ये कहां उपलब्ध होते हैं?

जवाब: ये टेस्ट अब भारत के ज्यादातर प्रमुख शहरों और मेडिकल सेंटर्स में उपलब्ध हैं। एक टेस्ट की कीमत आमतौर पर 800 से 3500 रुपए के बीच होती है। कीमत टेस्ट के प्रकार और लैब पर निर्भर करती है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों या हॉस्पिटल्स में ये टेस्ट कम कीमत पर या निशुल्क भी हो सकते हैं।

सवाल: क्या एक ही कैंसर के लिए एक से ज्यादा ट्यूमर मार्कर होते हैं?

जवाब: हां, बिल्कुल होते हैं। ब्रेस्ट कैंसर के लिए CA 15-3 और CA 27-29, दोनों टेस्ट उपयोग में आते हैं। इसी तरह कोलन कैंसर में CEA और कभी-कभी CA 19-9 भी देखा जाता है। एक से ज्यादा ट्यूमर मार्कर से डॉक्टर को कैंसर की स्टेज, उसका विस्तार, इलाज का असर और रिकरेंस (वापसी) का बेहतर अंदाजा मिलता है।

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