11 घंटे पहलेलेखक: अदिति ओझा
- कॉपी लिंक

कई बार रात भर जागने के बाद अगला दिन बेहद भारी लगता है। सिर सुन्न रहता है, आंखें भारी होती हैं और शरीर साथ नहीं देता। लेकिन जो लोग रोज नाइट शिफ्ट में काम करते हैं, उनके लिए यह थकान एक दिन की नहीं होती। यह धीरे-धीरे सेहत की जड़ तक पहुंच जाती है। आज की 24×7 वर्किंग कल्चर में नाइट शिफ्ट आम होती जा रही है।
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन एंड पब्लिक हेल्थ के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 20% वर्कफोर्स शिफ्ट वर्क में लगी है। अकेले अमेरिका में लगभग 1.5 करोड़ लोग नाइट या रोटेटिंग शिफ्ट में काम करते हैं।
दरअसल, समस्या यह है कि इंसानी शरीर दिन में जागने और रात में सोने के लिए बना है। जब इस नेचुरल रूटीन को उलट दिया जाता है तो बॉडी की बायलॉजिकल क्लॉक बिगड़ जाती है। इससे शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचता है। हालिया स्टडीज इशारा भी करती हैं कि बार-बार नींद की साइकल बदलने से एग्रेसिव ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है।
ऐसे में आज फिजिकल हेल्थ में जानेंगे कि–
• नाइट शिफ्ट में काम करना किस तरह सेहत को नुकसान पहुंचाता है?
• इससे किन बीमारियों का खतरा बढ़ता है?
• मजबूरी में नाइट शिफ्ट करनी हो, तो खुद को कैसे सुरक्षित रखें?
एक्सपर्ट: डॉ. अनिमेष आर्य, डायरेक्टर, इंटरवेंशनल पल्मनोलॉजी और स्लीप मेडिसिन, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली
सवाल– वर्क शिफ्ट यानी काम के घंटों का हमारी सेहत के साथ क्या कनेक्शन है?
जवाब– हमारे शरीर में सर्केडियन रिद्म नाम की एक इंटरनल बायलॉजिकल क्लॉक होती है। यह लगभग 24 घंटे के साइकल में काम करती है। यही क्लॉक तय करती है कि कब नींद आएगी, कब भूख लगेगी, कब हार्मोन रिलीज होंगे और कब शरीर रिपेयर मोड में जाएगा। यह क्लॉक सूरज की रोशनी और अंधेरे के हिसाब से सेट रहती है। नाइट शिफ्ट में काम करने के लिए बॉडी को अपने नेचुरल स्लीप–वेक साइकिल को उलटना पड़ता है।

सवाल– टेक्सस यूनिवर्सिटी की स्टडी ने नाइट शिफ्ट वर्क पर कुछ चौंकाने वाली बात कही है। ये स्टडी क्या कहती है?
जवाब– टेक्सस यूनिवर्सिटी की हालिया स्टडी बताती है कि सर्केडियन रिद्म बिगड़ने से शरीर का इम्यून डिफेंस कमजोर हो जाता है। इस रिसर्च को डॉ. तपश्री रॉय सरकार ने लीड किया। स्टडी के मुताबिक, बार-बार नींद का साइकल बिगड़ने से एग्रेसिव ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। सर्केडियन रिद्म हॉर्मोन रिलीज और सेल रिपेयर को कंट्रोल करता है। नाइट शिफ्ट, अनियमित नींद या बार-बार टाइम जोन बदलने से यह सिस्टम डिस्टर्ब हो जाता है। इसका असर शरीर के रिपेयर प्रोसेस पर पड़ता है।
Oncogene जर्नल में छपी इस स्टडी में पाया गया कि सामान्य स्थिति में कैंसर के लक्षण 22 हफ्तों में दिखे। लेकिन जिन लोगों में सर्केडियन डिसरप्शन था, उनमें 18 हफ्तों में ही कैंसर के संकेत नजर आने लगे। स्टडी में यह भी सामने आया कि इससे मेमोरी ग्लैंड्स की संरचना बदल जाती है। आगे चलकर यह बदलाव कैंसर के खतरे को और बढ़ा सकता है।
सवाल- नाइट शिफ्ट में काम करना सभी इंसानों की सेहत के लिए कैसे खतरनाक है?
जवाब- नाइट शिफ्ट का खतरा सिर्फ नींद बिगड़ने तक सीमित नहीं होता। रात के समय शरीर खुद को रिपेयर करता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है, लेकिन नाइट शिफ्ट में यह नेचुरल रिकवरी प्रोसेस बाधित होता है, जिससे बॉडी को कई नुकसान होते हैं। ग्राफिक से समझते हैं-

सवाल– नाइट शिफ्ट हमारी स्लीप साइकल को कैसे प्रभावित करती है?
जवाब– जब कोई व्यक्ति नाइट शिफ्ट में काम करता है, तो उसकी बायलॉजिकल क्लॉक अपने नेचुरल टाइम से बाहर हो जाती है। शरीर रात में आराम और दिन में एक्टिव रहने के लिए प्रोग्राम्ड होता है। नाइट शिफ्ट में व्यक्ति उस समय सोने की कोशिश करता है, जब शरीर पूरी तरह जागना चाहता है। वहीं, जिस वक्त शरीर आराम मांगता है, उसी समय उससे काम करवाया जाता है। इस उलटफेर का असर नींद पर पड़ता है। नींद गहरी नहीं हो पाती।

सवाल– सोने, जगने, खाने का रूटीन बार–बार बदलने पर ओवरऑल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है और क्यों?
जवाब– ऐसी स्थिति में शरीर को कभी सही तरह से एडजस्ट होने का मौका ही नहीं मिलता है। वह हमेशा जेट लैग जैसी हालत में रहता है। इस गड़बड़ रूटीन से भूख को कंट्रोल करने वाले हॉर्मोन भी प्रभावित होते हैं। नतीजा यह होता है कि अनहेल्दी खाने की क्रेविंग बढ़ती है, फोकस कम होता है और वजन तेजी से बढ़ने लगता है। साथ ही ब्लड शुगर कंट्रोल बिगड़ता है और शरीर का एनर्जी लेवल भी असंतुलित रहता है।
सवाल– नाइट शिफ्ट से किन बीमारियों का खतरा बढ़ता है?
जवाब– नाइट शिफ्ट शरीर के मेटाबॉलिज्म और हॉर्मोन सिस्टम को प्रभावित करती है। इससे कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ग्राफिक से समझते हैं कि कौन–कौन सी बीमारियों का खतरा बढ़ता है-

सवाल- अगर नाइट शिफ्ट में काम करना मजबूरी हो तो खुद को हेल्दी रखने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब- अच्छी नींद के लिए कमरे में अंधेरा रखें। सोने से पहले तेज रोशनी से बचें। स्लीप फाउंडेशन के मुताबिक, लाइट एक्सपोजर कंट्रोल करने से शरीर को रात का सिग्नल मिलता है।
- खाने का टाइम बहुत अहम है। NIH स्टडी बताती है कि दिन के समय खाना खाने से ब्लड शुगर कंट्रोल बेहतर रहता है। रात में हल्का खाना खाएं। वहीं, बड़े मील दिन में खाएं।
- अगर संभव हो तो नाइट शिफ्ट्स को एक साथ रखें। यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट ऑगस्टीन फॉर हेल्थ साइंसेज के एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इससे शरीर एक ही रूटीन में एडजस्ट हो पाता है।
- हल्की एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग और शिफ्ट के दौरान छोटे ब्रेक ब्लड सर्कुलेशन और एनर्जी बनाए रखते हैं।
- पानी पीते रहना दिमाग, पाचन और एनर्जी के लिए जरूरी है।
- सोशल आइसोलेशन से बचें। दोस्तों और परिवार से जुड़े रहें। मेडिटेशन और डीप ब्रीदिंग से तनाव कम होता है।
- कैफीन सीमित रखें और सोने से 4–6 घंटे पहले न लें, ताकि नींद प्रभावित न हो।

नाइट शिफ्ट आज कई लोगों की मजबूरी है, लेकिन इसे हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। सही नींद, सही खाना और थोड़ा सा ध्यान आपकी सेहत को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकता है। शरीर के संकेतों को समझिए और जरूरत पड़े तो समय पर डॉक्टर से सलाह जरूर लीजिए।
…………….
ये खबर भी पढ़िए…
फिजिकल हेल्थ- आंखें बतातीं सेहत का हाल:डॉक्टर से जानें आंखों में सूजन, पीलापन या उभार किस बीमारी का संकेत, 11 आई केयर टिप्स

हमारी आंखें सिर्फ दुनिया के तमाम रंग देखने का जरिया नहीं हैं, ये हमारे शरीर के अंदर की कंडीशन का आईना भी होती हैं।
आंखों का रंग बदलना, धुंधलापन, उनका बार-बार फड़कना या मैल बढ़ना। ये सभी संकेत बता सकते हैं कि शरीर में कहां पर क्या समस्या चल रही है। पूरी खबर पढ़िए…








