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‘मां मुझसे अक्सर पूछती थीं, ‘क्या वो जहाज पर हैं?’ मैं उन्हें कहती- नहीं मां, आप सुरक्षित जमीन पर हैं।’ डिमेंशिया उनकी आंखों में एक भ्रम बुन रहा था- एक ऐसा जहाज जो किनारे से छूट चुका था। बीमारी हमारे बीच ऐसी दूरी पैदा कर रही थी जिसे पाट पाना नामुमकिन था। ये कहना है- ब्रिटेन की ख्यात लेखिका एंथिया रोवन का। वह याद करती हैं… मैं जानती थी… समय के साथ वह क्षितिज के उस पार चली जाएंगीं। उनके जाने के बाद आज समझ आता है कि वह किसी काल्पनिक जहाज की बात नहीं कर रही थीं, बल्कि वह उस ‘बहाव’ को महसूस कर रही थीं जिसे शब्दों में ढालना उनके बस में नहीं था। डिमेंशिया से जूझ रहे लोग अक्सर रूपकों का सहारा लेते हैं। जब उनके पास सही शब्द नहीं होते, तो वे अनुभूतियों को बयां करने के लिए नए शब्द गढ़ते हैं। उनकी इस अजीबोगरीब भाषा में एक अनोखा जादू और दर्द छिपा होता है। पीछे मुड़कर देखती हूं तो सोचती हूं कि काश मैंने उन्हें और ध्यान से सुना होता। काश उस रहस्यमयी बोली का बेहतर अर्थ समझ पाती। मां मुझे भूलकर भाई-बहनों को याद रखती थीं। उन्होंने मुझे कभी सहेली तो कभी नर्स समझा। मैंने सुना है कि ऐसे वक्त बुजुर्गों को अपनी दुनिया में खींचने की कोशिश करने के बजाय उन्हें उनकी ही दुनिया में रहने देना चाहिए। मैंने यही किया…। एक सुबह मां ने ‘फाइलिंग’ की बात कही, तो समझ गई कि वे ‘डिशवॉशर’ की बात कर रही हैं। प्लेटों को रैक में सजाना, चम्मचें छांटना ही उनके लिए फाइलिंग थी। अपनी बिखरती दुनिया में वे इस तरह खुद को स्थिर करने की हताश कोशिश कर रही थीं। जब उन्हें बिना टोके बोलने का मौका दिया, तो वह मुझे कल्पनाओं की अद्भुत उड़ानों पर ले गईं। बताया कि कैसे उन्होंने रेगिस्तानों में स्कीइंग की है। एक बार बोलीं- ‘लग रहा है जैसे मैं जेल में हूं। फिर पूछा, क्या यात्रा लंबी होगी? ‘मैं जानती थी वे असल में क्या पूछ रही थीं, यानी कितना वक्त बचा है?’ मैंने धीरे से कहा,‘मुझे नहीं लगता कि अब ज्यादा समय लगेगा।’ तीन दिन बाद उनका निधन हो गया। उनका जहाज आखिरकार किनारे लग चुका था।’ पिता से नफरत थी…एक मुलाकात से बर्फ पिघली, समझा- माफी के आगे सारी शिकायतें बेमानी बर्लिन। ‘वह रविवार की दोपहर थी। मैं इस्तांबुल की फ्लाइट के लिए चेक-इन काउंटर की ओर जा रही थी। सहसा नजरें एक भूरे लेदर बैग और हल्के लिनेन सूट पर ठहर गईं। मन ही मन सोचा- कितना शानदार आउटफिट । तभी उस व्यक्ति का चेहरा मेरे सामने से गुजरा और जैसे मेरी सांसें थम गईं। वह मेरे पिता थे…। ये बताते हुए जर्मनी की मशहूर लेखिका कैरोलिन वुर्फेल कहती हैं… पिता ने मुझे नहीं देखा। बरसों से बिछड़ी हुई बेटी से एयरपोर्ट की सीढ़ियों पर मिलने की उम्मीद किसे होती है? मन हुआ कि मुड़कर आवाज दूं, पर हमारे बीच के सन्नाटे इतने गहरे थे कि एक सामान्य ‘हैलो’ की भी जगह नहीं थी। पर उस जादुई पल ने कुछ बदल दिया। मैंने पहली बार उन्हें उस तरह नहीं देखा जिनकी गैर मौजूदगी ने मेरा बचपन अधूरा छोड़ दिया था। वे सिर्फ एक मुसाफिर थे, जो सफर करते हैं, जिन्हें लेदर बैग पसंद हैं। सलीके से कपड़े पहनते हैं। वे अचानक ‘अजनबी’ से ‘इंसान’ बन गए थे। मैं लीपजिग में मां के साथ बड़ी हुई। पिता मेरे लिए बस नाम थे। उनसे मिली 14 की उम्र में- चेहरा मेरा ही प्रतिबिंब, पर अजनबी। बरसों तक रिश्ता बनाने की कोशिश की, पर हर बार अतीत की कड़वाहट लौट आती। भीतर का बच्चा चीखता- आपने मेरा ख्याल क्यों नहीं रखा? शिकायतों के शोर में मैं ‘पीड़ित’ की भूमिका के सुकून भरे कम्फर्ट जोन में कैद थी, जो वर्तमान हकीकत से ज्यादा तेज था। मैंने पढ़ा था कि जीवन नफरत पालने के लिए बहुत छोटा है और असली समाधान ‘भूल जाने’ में है। एयरपोर्ट पर पिता से मुलाकात ने भीतर जमी बर्फ पिघला दी थी। बर्लिन लौटने पर मैंने उन्हें मिलने का मैसेज किया। रेस्तरां जाते समय घबराई हुई थी, पुराने झगड़ों में लौटने से डर रही थी। मैं खुद को बार-बार समझा रही थी- बस सामान्य लंच है, कोई उम्मीद मत रखो। आज समझती हूं कि अतीत नहीं बदल सकते, पर भविष्य को नया रूप दे सकते हैं। हम कभी-कभी मिलते हैं। मैंने उन्हें माफ कर दिया है… हालांकि माफ करना एक बार का फैसला नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खुलने वाला दरवाजा है। इस दरवाजे से गुजरते हुए देखती हूं कि पिता और बेटी दोनों इंसान हैं, जिन्होंने गलतियां कीं, पर साथ मिलकर सफर तय कर सकते हैं।’
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