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- 2nd Doctor Opinion Before Surgery; Misdiagnosis Risk Explained | Apollo Spectra Hospital Advice
8 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी
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फर्ज करिए कि हॉस्पिटल में जांच के दौरान किसी को कैंसर डायग्नोस हुआ। उसने सर्जरी करवा ली। बाद में पता चला कि उसे कैंसर था ही नहीं।
कुछ वक्त पहले ऐसी ही एक घटना का जिक्र हॉलीवुड एक्ट्रेस लूसी लुइस ने किया था। 22 साल की उम्र में उनके ब्रेस्ट में एक गांठ मिली, जिसे कैंसर समझकर सर्जरी कर दी गई। बाद में पता चला कि वह कैंसरस गांठ नहीं थी। यह सब गलत डायग्नोसिस के कारण हुआ था।
उस घटना के बाद से लूसी लोगों को जागरूक करने लगीं कि किसी भी गंभीर बीमारी में-
- जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
- सेंकेंड ओपिनियन जरूर लेनी चाहिए।
इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज समझेंगे कि किसी मेडिकल डिसीजन से पहले सेकेंड ओपिनियन कितनी जरूरी है। साथ ही जानेंगे कि-
- किन बीमारियों में गलत डायग्नोसिस का रिस्क ज्यादा होता है?
- किन मामलों में सेकेंड ओपिनियन जरूर लेनी चाहिए?
- किन बीमारियों में सेकेंड ओपिनियन लेने की जरूरत नहीं होती?
एक्सपर्ट: डॉ. रोहित शर्मा, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर
सवाल- सेकेंड ओपिनियन क्या है?
जवाब- सेकेंड ओपिनियन का मतलब है, किसी बीमारी के इलाज से पहले डॉक्टर की राय लेने के बाद, दूसरे डॉक्टर से भी उसी मामले पर सलाह लेना।
आमतौर पर सेकेंड ओपिनियन तब ली जाती है, जब-
- बीमारी गंभीर हो।
- ऑपरेशन या बहुट टफ ट्रीटमेंट की सलाह दी गई हो।
- पहली सलाह को लेकर मन में शक या असमंजस हो।
- इलाज के कई विकल्प मौजूद हों।

सवाल- हर बड़े मेडिकल फैसले से पहले सेकेंड ओपिनियन लेना क्यों जरूरी है?
जवाब- किसी भी बड़े मेडिकल डिसीजन से पहले सेकेंड ओपिनियन इसलिए जरूरी है, क्योंकि-
- बीमारी की सही पुष्टि हो जाती है।
- गलत डायग्नोसिस का जोखिम कम होता है।
- इलाज के दूसरे विकल्प पता चलते हैं।
- अनावश्यक सर्जरी या टेस्ट से बचाव होता है।
- इलाज के फायदे-नुकसान बेहतर समझ में आते हैं।
- डॉक्टर और इलाज चुनने में भरोसा बढ़ता है।
- बड़े खर्च से पहले सही फैसला लेने में मदद मिलती है।
- मरीज और परिवार का आत्मविश्वास बढ़ता है।
सवाल- सेकेंड ओपिनियन न लेने से किस तरह के संभावित रिस्क हो सकते हैं?
जवाब- इसके कारण कई रिस्क हो सकते हैं। डिटेल ग्राफिक में देखिए-

सवाल- दुनिया और भारत में मिसडायग्नोसिस कितना कॉमन है?
जवाब- देश और दुनिया, दोनों के संदर्भ में यह काफी कॉमन है। जैसेकि–
दुनिया में
- अलग-अलग स्टडीज के अनुसार लगभग 10-15% मेडिकल केसेज में मिसडायग्नोसिस होता है।
- आउटपेशेंट (OPD) सेटिंग में यह लगभग 5-15% मामलों में देखा गया है।
- कुछ रिसर्च बताती हैं कि डॉक्टर पहली बार में करीब 80% मामलों में ही सही डायग्नोसिस कर पाते हैं।
- इमरजेंसी/हॉस्पिटल सेटिंग में भी करीब 10-15% तक डायग्नोस्टिक एरर हो सकता है।
भारत में
- भारत में सटीक नेशनल डेटा सीमित है, लेकिन अलग-अलग बीमारियों पर स्टडीज दिखाती हैं कि मिसडायग्नोसिस या डिले (देरी) काफी आम है, खासकर जटिल या TB जैसी बीमारियों में।
- कुछ क्लिनिकल स्टडीज (जैसे इन्फेक्शन/सीवियर केस) में लगभग 10-12% पेशेंट्स में गलत शुरुआती डायग्नोसिस पाया गया।
- रिसोर्स-लिमिटेड एरिया (ग्रामीण/छोटे शहर) में डायग्नोसिस में देरी और गलत पहचान का जोखिम और ज्यादा होता है।
सवाल- किन बीमारियों में मिसडायग्नोसिस का रिस्क ज्यादा होता है?
जवाब- कुछ बीमारियों में लक्षण एक जैसे या अस्पष्ट होते हैं। इसलिए उनमें मिसडायग्नोसिस का रिस्क ज्यादा होता है-

सवाल- किन मामलों में सेकेंड ओपिनियन जरूर लेनी चाहिए?
जवाब- कुछ परिस्थितियाें में सेकेंड ओपिनियन लेना बहुत जरूरी होता है, ताकि सही ट्रीटमेंट और डिसीजन लिया जा सके। जैसकि–

सवाल- किसी बड़े मेडिकल फैसले से पहले डॉक्टर से क्या सवाल पूछने चाहिए?
जवाब- किसी बड़े मेडिकल डिसीजन से पहले डॉक्टर से सही सवाल पूछना बहुत जरूरी होता है, ताकि आप समझदारी से निर्णय ले सकें। सारे अहम सवाल नीचे ग्राफिक में देखें-

सवाल- किन स्थितियों में सेकेंड ओपिनियन की जरूरत नहीं है?
जवाब- कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं, जहां सेकेंड ओपिनियन की जरूरत नहीं पड़ती। जैसेकि-
- अगर छोटी या सामान्य बीमारी हो, जैसे सर्दी-खांसी, हल्का बुखार।
- अगर डॉक्टर की सलाह साफ और आसानी से समझ में आ रही हो।
- अगर इलाज सरल और लो रिस्क वाला हो।
- अगर इलाज से जल्दी सुधार हो रहा हो।
- अगर भरोसेमंद और अनुभवी डॉक्टर का इलाज चल रहा हो।
- अगर इमरजेंसी कंडीशन हो, जहां तुरंत इलाज जरूरी हो।
सवाल- इमरजेंसी में भी क्या बेसिक सवाल पूछे जा सकते हैं?
जवाब- हां, इमरजेंसी में भी कुछ बेसिक और जरूरी सवाल संक्षेप में पूछे जा सकते हैं-
- अभी पेशेंट की स्थिति कितनी गंभीर है?
- अभी तुरंत क्या ट्रीटमेंट दिया जा रहा है?
- क्या कोई बड़ा रिस्क है?
- आगे क्या कदम उठाए जाएंगे?
- क्या किसी सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है?
- पेशेंट कब तक स्थिर हो सकता है?
- हमें अभी क्या करने की जरूरत है?
सेकेंड ओपिनियन से जुड़े कुछ कॉमन सवाल-जवाब
सवाल- सेकेंड ओपिनियन लेते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
जवाब- कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखें-
- दूसरे डॉक्टर को पुरानी सभी रिपोर्ट्स और टेस्ट दिखाएं।
- पहले डॉक्टर की सलाह छुपाएं नहीं।
- उसी फील्ड के स्पेशलिस्ट से सलाह लें।
- जल्दबाजी में फैसला न लें, दोनों राय को समझें।
- जरूरत हो तो तीसरी राय भी ले सकते हैं।
सवाल- क्या सेकेंड ओपिनियन लेने से इलाज में देरी हो सकती है?
जवाब- कई बार लोगों को लगता है कि सेकेंड ओपिनियन लेने में समय बर्बाद होगा, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता।
- सही समय पर ली गई सेकेंड ओपिनियन गलत इलाज से बचा सकती है।
- इससे लंबी अवधि में समय, पैसा और सेहत तीनों को फायदा होता है।
- हां, इमरजेंसी में देरी नहीं करनी चाहिए।
सवाल- क्या सेकेंड ओपिनियन लेना डॉक्टर पर अविश्वास दिखाता है?
जवाब- नहीं, सेकेंड ओपिनियन लेना बिल्कुल सामान्य और प्रोफेशनल प्रक्रिया है।
- अच्छे डॉक्टर भी इसे सपोर्ट करते हैं।
- यह मरीज के अधिकार का हिस्सा है।
- इससे बेहतर और कॉन्फिडेंट निर्णय लेने में मदद मिलती है।
सवाल- क्या ऑनलाइन सेकेंड ओपिनियन लेना सुरक्षित है?
जवाब- सेकेंड ओपिनियन ऑनलाइन भी ली जा सकती है, लेकिन ध्यान रखें कि-
- केवल विश्वसनीय अस्पताल या प्लेटफॉर्म से ही लें।
- अपनी सही और पूरी मेडिकल हिस्ट्री शेयर करें।
- गंभीर मामलों में फिजिकल जांच भी जरूरी हो सकती है।
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