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8 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल
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किताब: सुख की खोज, सफल जीवन के प्रैक्टिकल सूत्र
लेखक: निर्यापक मुनिश्री वीर सागर जी
प्रकाशक: मंजुल
मूल्य: 299 रुपए
हर व्यक्ति सुख चाहता है, लेकिन सुख की उसकी परिभाषा अलग होती है। कोई पैसा, नौकरी, परिवार या प्रतिष्ठा में सुख खोजता है तो कोई अपनी इच्छाओं के पूरे होने में। कई बार मनचाही चीजें हासिल करने के बाद भी भीतर एक खालीपन बना रहता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या सुख वास्तव में बाहरी परिस्थितियों से मिलता है या उसका संबंध हमारे मन और नजरिए से है?
निर्यापक मुनिश्री वीर सागर जी की किताब ‘सुख की खोज’ इसी सवाल के जवाब पर आधारित है। किताब सुख को किसी एक वस्तु, उपलब्धि या परिस्थिति से जोड़ने की बजाय उसे मन की अवस्था के रूप में समझने की कोशिश करती है।
किताब में जीवन के उद्देश्य, इच्छाओं, क्रोध, डर, तनाव, ओवरथिंकिंग, आत्म-प्रेम, सकारात्मक सोच, कृतज्ञता और आत्मविश्लेषण जैसे विषयों को सरल तरीके से समझाया गया है।
सबसे पहले खुद से सवाल
किताब की शुरुआत ही एक जरूरी सवाल से होती है कि ‘हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?’ मुनिश्री बताते हैं कि इंसान के पास क्षमताएं और संभावनाएं बहुत हैं। लेकिन अक्सर वह भीड़ के साथ चलते-चलते यह भूल जाता है कि वह वास्तव में चाहता क्या है। पैसा, पद और सफलता हासिल करने के बावजूद मन में बेचैनी बनी रहती है। ऐसे में जीवन की दिशा पर दोबारा विचार करना जरूरी हो जाता है।
सुख आखिर है क्या?
किताब का मूल सवाल यही है कि जिसे हम सुख मान रहे हैं, क्या वह वास्तव में सुख है? मुनिश्री बताते हैं कि इंसान की इच्छाएं लगातार बदलती रहती हैं। बचपन में खिलौने सुख देते हैं, बड़े होने पर अच्छे मार्क्स, नौकरी, पैसा, परिवार, प्रतिष्ठा और दूसरी उपलब्धियां सुख का आधार बन जाती हैं। लेकिन एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है।
यहीं से सुख की तलाश एक अंतहीन दौड़ शुरू हो जाती है। किताब पाठक को रुककर यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि सुख पाने के लिए लगातार कुछ हासिल करना जरूरी है। इसके बजाय अपनी सोच और नजरिए को बदलना ज्यादा जरूरी है।

किताब के पांच खंड
यह किताब पांच खंडों में विभाजित है-
पहला खंड– ‘सुख को समझें’
दूसरा खंड– ‘मनोविकारों को जीतें’
तीसरा खंड– ‘निडर मन से मजबूत जीवन बनाएं’
चौथा खंड– ‘जीवन विकास के सूत्र’
पांचवां खंड– ‘संभावनाओं का खजाना- आप’
- पहले खंड में जीवन के उद्देश्य और सुख की वास्तविक प्रकृति पर बात की गई है।
- दूसरे खंड में क्रोध, तृष्णा, ‘मैं’ की भावना और दूसरे मानसिक विकारों को समझने की कोशिश की गई है।
- तीसरा खंड डर, तनाव, ओवरथिंकिंग और मृत्यु के भय जैसे विषयों पर केंद्रित है।
- चौथे खंड में आत्म-प्रेम, सामंजस्य, विनम्रता, सकारात्मक सोच, आत्मविश्लेषण और कृतज्ञता जैसे जीवन के सूत्र दिए गए हैं।
- अंतिम खंड व्यक्ति को अपनी क्षमताओं और संभावनाओं को पहचानने के लिए प्रेरित करता है।
किताब के 10 मुख्य सबक ग्राफिक में देखिए-

वर्तमान में जीना क्यों जरूरी?
किताब में ‘वर्तमान में जीने’ और ‘ओवरथिंकिंग से बचने’ पर बात की गई है। इंसान अक्सर बीती बातों को लेकर पछताता रहता है या भविष्य को लेकर चिंतित रहता है। ऐसे में वर्तमान उसकी नजर से ओझल हो जाता है। इस बारे में किताब में मुनिश्री लिखते हैं-

डर से भागें नहीं, सामना करें
किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डर को लेकर है। डर कई बार किसी वास्तविक खतरे से ज्यादा हमारे मन की प्रतिक्रिया होती है, जैसेकि-
- असफलता का डर।
- लोगों की राय का डर।
- भविष्य का डर या मृत्यु का डर।
ये डर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार काम करने से रोकते हैं। किताब में मुनिश्री डर से बचने की बजाय उसका खुलकर सामना करने की बात कहते हैं।

सकारात्मक सोच से जीवन होता आसान
किताब में सकारात्मक सोच को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यहां सकारात्मक सोच का अर्थ यह नहीं कि जीवन में समस्याएं नहीं आएंगी। बल्कि मुश्किल परिस्थितियों के बीच व्यक्ति अपना नजरिया कैसा रखता है, यह महत्वपूर्ण है।
रिश्तों में अपेक्षा कम, समर्पण ज्यादा
किताब केवल व्यक्ति के भीतर की दुनिया तक सीमित नहीं है। रिश्तों को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कहती है। अक्सर रिश्तों में हमारी खुशी इस बात पर निर्भर हो जाती है कि सामने वाला हमारे लिए क्या कर रहा है। अपेक्षाएं बढ़ने पर रिश्तों में तनाव भी बढ़ सकता है। मुनिश्री किताब में निस्वार्थ भाव से रिश्ते निभाने और बदले में अपेक्षा न रखने की बात कहते हैं।
किताब की खासियत
किताब की सबसे अच्छी बात इसका प्रैक्टिकल अप्रोच है। पांचों खंडों में अलग-अलग विषयों पर चर्चा करने के बाद उनसे जुड़े अभ्यास भी दिए गए हैं। ये अभ्यास सीधे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं, जैसेकि-
किताब में सेल्फ-अवेयरनेस को ‘WATCH YOURSELF’ के एक सरल सूत्र से समझाया गया है। इसके जरिए पाठक को अपने शब्दों, काम, विचार, संगति और आदतों पर नजर रखने के लिए कहा गया है-
- W – (वॉच योर वर्ड्स): अपने शब्दों पर विचार करें।
- A – (वॉच योर एक्शन): अपने काम पर विचार करें।
- T – (वॉच योर थॉट्स): अपने विचारों पर गौर करें।
- C – (वॉच योर कंपनी): अपनी संगति देखें।
- H – (वॉच योर हैबिट्स): अपनी आदतों पर विचार करें।
यह सूत्र व्यवहार में बदलाव के लिए किसी बड़े संकल्प की बजाय छोटी-छोटी चीजों पर नजर रखने के लिए कहता है। इसे रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी से अपनाया जा सकता है। किताब में ऐसे कई अभ्यास भी बताए गए हैं, जो प्रैक्टिकल लाइफ को आसान बनाने में मदद करते हैं। ग्राफिक में देखिए, ये किताब किन लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

किताब के बारे में मेरी राय
किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सुख को जीवन जीने के तरीके की तरह देखती है। किताब बार-बार पाठक को बाहर की परिस्थितियों से हटाकर अपने मन की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है।
पांच खंडों में विषयों का क्रम भी काफी सहज है। पहले सुख को समझने की कोशिश होती है, फिर उन मनोविकारों की बात आती है, जो सुख में बाधा बनते हैं। इसके बाद डर और तनाव से निपटने, जीवन को बेहतर बनाने के सूत्र और अंत में अपनी संभावनाओं को पहचानने की दिशा दिखाई गई है।
सबसे उपयोगी बात है कि हर अध्यायों के साथ दिए गए अभ्यास जीवन की परिस्थितियों पर विचार करने और खुद में बदलाव शुरू करने का मौका देते हैं।
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