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शुक्रवार को लवलीना बोरगोहाईं का जन्मदिन था, लेकिन उपहार तमाम देशवासियों को मिला। एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर भारतीयों को गौरवान्वित करने वाली लवलीना की आज सर्वत्र जय-जयकार हो रही है और वे इसकी सुपात्र हैं भी। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि हाल ही में हुए ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के बाद इन्हीं लवलीना को बहुत बुरी तरह से ट्रोल किया गया था। दु:खद यह था कि खेल पत्रकार भी अपना पर्सपेक्टिव गंवाते हुए भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ बॉक्सरों में से एक के बारे में नकारात्मकता फैलाने में जुट गए थे। लवलीना की स्वर्णिम-उपलब्धि ने अब कइयों के मुंह बंद कर दिए होंगे। सच्चाई यह है कि ग्लासगो में लवलीना प्रतिष्ठित बॉक्सर और दो बार विश्व चैंपियनशिप की मेडलिस्ट रह चुकीं ऑस्ट्रेलिया की एमा सू ग्रीनट्री से बेहद करीबी मुकाबले में फाइनल मैच हारी थीं। उस मैच में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे यह संकेत मिलता कि लवलीना का समय अब बीत चुका है। ऐसे में यह पढ़ना निराशाजनक था कि हमारे वरिष्ठ खेल पत्रकार भी कह रहे थे कि वे कॉमनवेल्थ में महज एक जीत के बाद सिल्वर मेडल लेकर लौट रही हैं। हां, वे ऐसा कर रही थीं, लेकिन क्या उन्होंने बाई (किसी मुक्केबाज को बिना कोई मुकाबला खेले सीधे अगले दौर (राउंड) या सेमीफाइनल/फाइनल में प्रवेश मिल जाना) मांगी थी? उन्होंने तो ऐसा नहीं किया था और वे ग्लासगो में कड़ी मेहनत कर आगे बढ़ने के लिए मौजूद थीं। किस्मत से उन्हें अगर बाई मिली तो इसमें उनका दोष नहीं था। वैसे भी खेलों में किस्मत बहुत मायने रखती है और बात वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन क्या लवलीना इसके लिए ट्रोल किए जाने और मजाक उड़ाए जाने के योग्य थीं? नहीं। और इसी जगह पर आकर हम अकसर नाकाम हो जाते हैं। क्या लवलीना ने इस ट्रोलिंग और आलोचना के बारे में कुछ पढ़ा था? एशियाई खेलों में जब उन्होंने विश्व चैंपियनशिप-2025 की गोल्ड मेडल विजेता बॉक्सर को परास्त किया, तो मेरे इस प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा- ‘कौन परवाह करता है?’ जब वे फिर से एशियाई खेलों के फाइनल में पहुंचीं तो भारत में यह रिकॉर्ड किसी के नाम नहीं था। महान मैरी कॉम भी दो बार फाइनल में नहीं पहुंच सकी थीं, जबकि लवलीना ने ऐसा करके इतिहास रच दिया था। उसके बाद, स्वर्ण-पदक का तो कहना ही क्या। जब लवलीना सेमीफाइनल खेल रही थीं, तब मैं वहीं पर मौजूद था और सच यह है कि मैं उन्हें लेकर थोड़ा आशंकित भी था। वहां मौजूद कई लोग भी मेरी राय से सहमत थे और हममें से किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे मैच जीतेंगी। पहले राउंड में ऐसा लग रहा था कि लवलीना रक्षात्मक खेल रही हैं और हमें हैरानी नहीं हुई, जब वे यह राउंड 2-3 से हार गईं। राउंड के बीच मिले छोटे-से अंतराल में कोच सैंटियागो नीवा इशारों से बता रहे थे कि उन्हें क्या करना चाहिए। जितना हम समझ पाए और बाद में कोच ने भी जिसकी पुष्टि की, वे उनसे आक्रामक होकर खेलने के लिए कह रहे थे।
यही कारण था कि दूसरे राउंड में लवलीना पूरी तरह बदली हुई खिलाड़ी नजर आईं। वे मुकाबले पर पूरी तरह हावी हो गई थीं। घंटी बजने तक सभी को साफ दिखाई दे रहा था कि उन्होंने यह राउंड जीत लिया है। एथलीट रिप्रेजेन्टेटिव के तौर पर वहां मौजूद भारतीय खिलाड़ी साक्षी, अरुंधति चौधरी, प्रीति और बाकी पूरे दल के सदस्य लवलीना के हर पंच पर शोर कर उनका उत्साहवर्धन करने लगे थे, क्योंकि वे जानते थे कि कुछ शानदार हो रहा है। लवलीना इस बात का एक अच्छा उदाहरण हैं कि अगर आप किसी एथलीट का समर्थन नहीं कर सकते, तो कम से कम उसे अपने हाल पर छोड़ दें या चुप रहें। उसे हतोत्साहित तो बिलकुल न करें। उसे जज भी न करें। किसी खिलाड़ी की उपलब्धि को कम करके आंकने की कोशिशों का कभी भी कोई फायदा नहीं होता और यही भारतीय खेल मीडिया और यहां तक कि खेल प्रशंसकों को भी सीखना होगा। फाइनल में लवलीना ने जैसा प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता, वह उनके खेल को कमतर आंकने वालों के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए। अगर आप किसी एथलीट का समर्थन नहीं कर सकते, तो कम से कम उसे अपने हाल पर छोड़ दें या चुप रहें। उसे हतोत्साहित या जज न करें। खिलाड़ी को कम करके आंकने की कोशिशों का कभी भी कोई फायदा नहीं होता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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