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ब्रह्मा चेलानी का कॉलम: ब्रिक्स ने जो हासिल किया है, वह कोई छोटी उपलब्धि नहीं

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4 घंटे पहले

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ब्रह्मा चेलानी, पॉलिसी फॉर सेंटर रिसर्च के प्रोफेसर एमेरिटस - Dainik Bhaskar

ब्रह्मा चेलानी, पॉलिसी फॉर सेंटर रिसर्च के प्रोफेसर एमेरिटस

सितम्बर के इसी महीने में, 20 साल पहले ब्राजील, रूस, भारत और चीन के विदेश मंत्रियों ने ब्रिक्स की पहली बैठक की थी। गोल्डमैन सैक के तत्कालीन अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने तेजी से बढ़ती इन चार अर्थव्यवस्थाओं के नामों के प्रथमाक्षरों के आधार पर इस समूह का नाम ‘ब्रिक’ रखा था। 2011 में दक्षिण अफ्रीका भी इसमें शामिल हुआ तो ब्रिक का ‘ब्रिक्स’ हो गया। बाद में कई अन्य देश इससे जुड़े, कुछ पूर्ण सदस्य के रूप में तो कुछ आधिकारिक साझेदार के रूप में।

आज ब्रिक्स अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक बेहद महत्वपूर्ण प्रयोग है, जो पश्चिमी-वर्चस्व से दूर वैश्विक शक्ति के पुनर्संतुलन और बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था के उभार को बताता है। आज यह ग्लोबल साउथ की एक लगातार प्रभावशाली होती आवाज बन चुका है। 2024-25 में मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई के भी जुड़ने के बाद से ब्रिक्स में अब दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी का करीब 40% हिस्सा आता है (पीपीपी के आधार पर)।

जबकि जी7 में दुनिया की 10% से भी कम आबादी और वैश्विक जीडीपी का 30% से भी कम हिस्सा है। जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है, वहीं विकसित अर्थव्यवस्थाओं में उत्पादकता और आर्थिक वृद्धि की रफ्तार 1990 के दशक से ही लगातार घटती रही है। बात केवल इकोनॉमी तक ही सीमित नहीं, भू-राजनीति भी तेजी से बदली है। पहले जहां पश्चिम का वैश्विक प्रभुत्व हुआ करता था, वहीं अब शक्ति और प्रभाव में अधिक व्यापकता और विविधता है।

ब्रिक्स ने इस धारणा को चुनौती दी है कि विश्व-व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित पश्चिम-नेतृत्व वाली संस्थाओं के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहनी चाहिए। गैर-पश्चिमी देशों के लिए ब्रिक्स बढ़ती आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के खिलाफ एक सुरक्षा-कवच है। कुछ हद तक अमेरिका भी इसमें मदद ही कर रहा है, जो वैश्विक नेतृत्व से पीछे हटने पर आमादा दिखाई देता है। यह रणनीतिक स्वायत्तता को आगे बढ़ाने और आर्थिक सहयोग का दायरा विस्तृत करने के लिए संस्थागत मंच भी उपलब्ध कराता है।

ऐसे में इसमें शामिल होने को लेकर इतना उत्साह होना आश्चर्य की बात नहीं है : तीन दर्जन से अधिक देशों ने औपचारिक रूप से इसकी सदस्यता के लिए आवेदन दे रखा है या इसमें शामिल होने की इच्छा जताई है। इनमें नाटो का सदस्य तुर्किये और अमेरिकी नौसैनिक बलों का प्रमुख ऑपरेशनल-हब बहरीन भी शामिल है। ब्रिक्स के दस साझेदार देश भी हैं- बेलारूस, बोलीविया, कजाखस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम- जो शिखर सम्मेलनों में भाग लेते हैं।

यह ढांचा ब्रिक्स को सहयोग के अपने नेटवर्क का विस्तार करने और ग्लोबल-साउथ का प्रतिनिधित्व करने की अपनी क्षमता मजबूत करने में मदद करता है। ब्रिक्स महज एक प्रतीकात्मक समूह नहीं है। उसने संस्थान-निर्माण के क्षेत्र में ठोस प्रगति की है। न्यू डेवलपमेंट बैंक वैश्विक स्तर पर काम करने वाला पहला बहुपक्षीय विकास बैंक है, जिसकी परिकल्पना और अगुआई उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने की है। इसके संस्थापक ब्रिक्स सदस्यों की इसमें हिस्सेदारी और वोटिंग-अधिकार बराबर हैं।

इसके विपरीत, विश्व बैंक और आईएमएफ- दोनों में ही अमेरिका के पास प्रभावी वीटो है। ब्रिक्स अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के भीतर मौजूद कमजोरियों को कम करने के लिए भी काम कर रहा है। अटकलों के विपरीत, यूरो जैसी किसी ब्रिक्स मुद्रा का गठन फिलहाल तो एजेंडे में नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापारिक लेन-देन के निपटारे का विस्तार करने, सदस्य देशों की डिजिटल भुगतान प्रणालियों के बीच इंटरऑपरेबिलिटी बेहतर करने, केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने आदि पर यह ध्यान देता है।

  • भारत में हुई 18वीं समिट के बाद कहा जा सकता है कि ब्रिक्स ने इस विचार को स्वीकार्य बनाया है कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं आपस में सहयोग कर सकती हैं, अपने संस्थान बना सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदल सकती हैं। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।

(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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