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- Brahma Chellaney’s Column Our Stand Is Strong, But Be Cautious Of China Pakistan Alliance
6 घंटे पहले
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ब्रह्मा चेलानी पॉलिसी फॉर सेंटर रिसर्च के प्रोफेसर एमेरिटस
पिछले महीने जिन आतंकवादियों ने पहलगाम में 26 नागरिकों की हत्या कर दी थी, उनमें से दो की पहचान पाकिस्तानी नागरिक के रूप में की गई थी। यह हमला क्रूर होने के बावजूद अप्रत्याशित नहीं था, क्योंकि आतंकवादी समूह लंबे समय से पाकिस्तान की धरती से संचालित होते रहे हैं।
उन्हें पाकिस्तान की फौज का समर्थन प्राप्त है। लेकिन इस बार नई बात यह है कि भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने का प्रभावी तरीका खोज निकाला है। पाकिस्तान में मौजूद आतंकी शिविरों पर ऐसे सैन्य हमले- जिनके बारे में भारतीय अधिकारियों ने दावा किया है कि वे नपे-तुले, जिम्मेदार और अपनी प्रकृति में नॉन-एस्केलेटरी थे। पाकिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई के जोखिम के बावजूद भारत एक मजबूत पक्ष है और वह संघर्ष को अपने हितों के अनुरूप बढ़ा या घटा सकता है।
हालांकि भारत को खतरा केवल पाकिस्तान से नहीं है। चीन ने लगातार भारत के आतंकवाद-प्रायोजक पड़ोसी को कूटनीतिक और रणनीतिक कवर प्रदान किया है। उदाहरण के लिए, चीन की सरकार ने शीर्ष पाकिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को बार-बार अवरुद्ध किया है।
पहलगाम हमले के बाद भी उसने पाकिस्तान के काउंटर-टेररिज्म प्रयासों की प्रशंसा की और उसे अपना सदाबहार रणनीतिक साझेदार बताया। जाहिर है कि चीन अपने दुश्मन के दुश्मन को दोस्त ही मानेगा। लेकिन इससे भारत दो परमाणु-शक्तियों के बीच फंस जाता है।
दोनों ही भारतीय क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर अपना दावा ठोकते हैं। हाल के संकटों- पाकिस्तान से होने वाले आतंकवादी हमलों से लेकर डोकलाम और लद्दाख में चीन द्वारा बेशर्मी से हमारी जमीनें हड़पने तक- ने इस बात को उजागर किया है कि चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ भारत के लिए कितना बड़ा खतरा है।
हालांकि सत्ता में अपने 11 वर्षों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन और पाकिस्तान दोनों के प्रति बड़े पैमाने पर प्रतिक्रियात्मक सुरक्षा रुख बनाए रखा, जिसमें दोनों देशों के प्रति बहुत कम रणनीतिक प्रतिरोध देखने को मिला।
भारत के लद्दाख सीमावर्ती क्षेत्रों पर चीनी अतिक्रमणों के कारण 2020 में शुरू हुआ सैन्य गतिरोध अभी भी पूरी तरह से हल नहीं हुआ है। लेकिन इस बार मोदी ने एक संतुलित और प्रभावशाली प्रतिक्रिया पेश की है। पहले तो उन्होंने सिंधु जल संधि को रोक दिया, जो दुनिया का सबसे उदार जल-साझाकरण समझौता था।
यह संधि पाकिस्तान को सिंधु बेसिन के 80% से अधिक पानी तक पहुंच प्रदान करती थी। विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में हुई इस संधि को लंबे समय से सीमापार सहयोग के मॉडल के रूप में सराहा जाता रहा है।
अलबत्ता चीन ने इसका अनुसरण नहीं किया है। 1951 में तिब्बत पर कब्जा करने से उसे प्रमुख नदियों के उद्गम पर नियंत्रण प्राप्त हो गया था, फिर भी उसने 18 पड़ोसी देशों के साथ जल-बंटवारे की संधि करने से इनकार कर दिया है।
दूसरी तरफ पाकिस्तान ने आतंकवाद के जरिए भारत के खिलाफ छद्म-युद्ध छेड़ रखा है। 2611 देश की स्मृति में अभी भी ताजा है। दरअसल, हाल की हत्याएं अमेरिका द्वारा मुंबई हमले के मुख्य षड्यंत्रकारी को भारत को प्रत्यर्पित किए जाने के कुछ समय बाद ही हुई हैं।
पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने भी हाल ही में पाकिस्तानियों से अपने बच्चों को यह सिखाने का आग्रह करके संघर्ष को हवा दी कि मुसलमान हिंदुओं से अलग हैं। दुनिया के किसी भी देश से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह शांतिकाल में हुई संधियों को अघोषित युद्ध के परिणाम भुगतते हुए भी जारी रखेगा।
अगर पाकिस्तान यह सब नहीं चाहता तो उसे शांति के लिए एक वास्तविक प्रतिबद्धता दिखानी होगी। उसे अपने आतंकवादी नेताओं को गिरफ्तार करना होगा, आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों को बंद करना होगा और सीमापार हिंसा के लिए अपना समर्थन समाप्त करना होगा।
हाल के संकटों- पाकिस्तान से होने वाले आतंकवादी हमलों से लेकर डोकलाम और लद्दाख में चीन द्वारा हमारी जमीनें हड़पने तक- ने इस बात को उजागर किया है कि चीन-पाकिस्तान का गठजोड़ भारत के लिए कितना बड़ा खतरा है। (© प्रोजेक्ट सिंडिकेट)








