नई दिल्ली11 घंटे पहलेलेखक: मुकेश कौशिक/अनिरुद्ध शर्मा
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भारत ब्रिक्स समिट के दौरान डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ने वाले एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। चीन और रूस,भारत के साथ मिलकर इसका ट्रायल करेंगे।
इसका मकसद ब्रिक्स देशों के बीच कारोबार में अमेरिकी डॉलर जैसी किसी तीसरी करेंसी पर निर्भरता कम करना है। यानी देश आपस में सीधे अपनी-अपनी करेंसी में पेमेंट कर सकें। हालांकि कोई नई साझा करेंसी शुरू नहीं की जाएगी।
इस सिस्टम में भारत का डिजिटल रुपया, चीन का डिजिटल युआन और रूस का डिजिटल रूबल एक साझा क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम से जुड़ेंगे।
इसके साथ ही भारत के UPI, चीन के CIPS और रूस के SPFS जैसे मौजूदा पेमेंट सिस्टम को भी आपस में जोड़ने की तैयारी है। इससे हर देश अपनी करेंसी और अपने केंद्रीय बैंक का नियंत्रण बनाए रख सकेगा।
ब्रिक्स समिट 11 से 13 सितंबर के बीच नई दिल्ली के भारत मंडपम में होगी।

दिल्ली में ब्रिक्स समिट के लिए जगह-जगह प्रमोशनल पोस्टर लगे हैं।
भारत को इससे क्या फायदा होगा
इस व्यवस्था से करेंसी बदलने का खर्च, बैंकिंग चार्ज और पेमेंट सेटल होने में लगने वाला समय कम हो सकता है। भारत और रूस के बीच अपनी-अपनी करेंसी में कारोबार पहले ही बढ़ रहा है।
ब्रिक्स के विस्तार के बाद इंडोनेशिया, ईरान और यूएई जैसे देश भी समूह में शामिल हो चुके हैं। इन देशों के बीच सीधे अपनी-अपनी करेंसी में पेमेंट की सुविधा बढ़ने से भारतीय आयातकों और निर्यातकों को फायदा हो सकता है।
भारत ने इस सिस्टम को तैयार करने के लिए प्रोजेक्ट एमब्रिज, प्रोजेक्ट अबेर और प्रोजेक्ट डनबार जैसे दूसरे अंतरराष्ट्रीय प्रयोगों से भी सीख ली है।

जयपुर में ‘ब्रिक्स इनवॉयस डिस्काउंटिंग मैकेनिज्म’ की स्टडी पर सहमति बनी
विदेश से ऑर्डर मिलने के बाद भी छोटे एक्सपोर्टर्स को कई बार बैंक से कर्ज नहीं मिल पाता। इसकी बड़ी वजह यह है कि उनके पास जमीन या संपत्ति जैसी गारंटी देने के लिए पर्याप्त संपत्ति नहीं होती। इस समस्या को दूर करने के लिए ब्रिक्स देशों ने एक नई व्यवस्था पर काम शुरू किया है। जयपुर में हुई बैठक में ‘ब्रिक्स इनवॉयस डिस्काउंटिंग मैकेनिज्म’ की स्टडी पर सहमति बनी।
इस व्यवस्था में छोटे कारोबारियों को कर्ज देने के लिए उनकी संपत्ति के बजाय उनके कारोबार और आने वाले पैसे को आधार बनाया जाएगा। मसलन, अगर किसी भारतीय कारोबारी ने विदेश में सामान भेज दिया है और उसका भुगतान तीन महीने बाद मिलना है, तो वह उस ऑर्डर का इनवॉयस बैंक को दिखाकर पहले ही वर्किंग कैपिटल ले सकता है।
भारत में TReDS प्लेटफॉर्म पहले से इसी तरह काम कर रहा है। भारत के इस अनुभव की वजह से इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने में उसकी अहम भूमिका हो सकती है।
अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो भारतीय MSME के लिए विदेशों में कारोबार बढ़ाने के रास्ते में आने वाली एक बड़ी दिक्कत कम हो सकती है।
BRICS समिट की अध्यक्षता कर रहा है भारत
BRICS दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, ईरान, इथियोपिया, UAE और इंडोनेशिया भी शामिल हैं। इसमें शुरुआत में 4 देश थे, जिसे BRIC कहा जाता था। यह नाम 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने दिया था।
इस साल BRICS की कमान भारत के पास है। भारत की अध्यक्षता में पूरे साल अलग-अलग शहरों में बैठकें, मंत्रीस्तरीय सम्मेलन और कई स्तर की चर्चाएं हो रही हैं।
भारत का फोकस ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने, आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल तकनीक, आतंकवाद से निपटने और सप्लाई चेन मजबूत करने पर है।
यानी BRICS को सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश और विकास के बड़े मंच के तौर पर आगे बढ़ाने की कोशिश है।

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