2 घंटे पहले
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आज भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी है। आज भगवान विष्णु के वामन अवतार की जयंती है। श्रीमद्भागवत महापुराण के मुताबिक भगवान वामन अवतार श्रवण नक्षत्र और अभिजित मुहूर्त में दोपहर के समय महर्षि कश्यप और अदिति के पुत्र के रूप में हुआ था। इस दिन द्वादशी तिथि थी। इसे विजया द्वादशी कहा गया है। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जब भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के साथ श्रवण नक्षत्र होता है तो इसे महती द्वादशी कहा जाता है। आज ये ही योग बन रहा है।
चार भुजाओं वाले विष्णु रूप में प्रकट हुए, फिर बने वामन बटुक श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध के 18वें अध्याय में लिखा है कि भगवान शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए चार भुजाओं वाले विष्णु रूप में अदिति के सामने प्रकट हुए। इसके बाद माता-पिता के देखते ही उन्होंने छोटे ब्रह्मचारी बालक, यानी वामन का रूप धारण कर लिया। महर्षियों ने उनके संस्कार करवाए और उपनयन के बाद यही बटुक रूप राजा बलि की यज्ञशाला के लिए निकला।
सूर्य ने गायत्री मंत्र दिया, आकाश से मिला छाता और ब्रह्मा ने दिया कमंडल वामन भगवान के बटुक रूप की हर चीज के पीछे पौराणिक कथा है। भागवत के मुताबिक उपनयन के समय सूर्य ने उन्हें गायत्री मंत्र दिया, बृहस्पति ने जनेऊ और महर्षि कश्यप ने मुंज की मेखला दी। पृथ्वी ने मृगचर्म और सोम ने दंड दिया। आकाश ने छाता, ब्रह्मा ने कमंडल, सप्तर्षियों ने कुश और देवी सरस्वती ने अक्ष माला दी। कुबेर ने भिक्षा पात्र दिया और देवी उमा ने उसमें पहली भिक्षा दी। इन्हीं वस्तुओं के साथ भगवान वामन ब्रह्मचारी के रूप में राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे थे।
99 यज्ञ पूरे कर 100वां अश्वमेध कर रहे थे राजा बलि राजा बलि प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र थे। देवताओं को हराकर उन्होंने स्वर्ग सहित तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। स्कंद पुराण में बताया गया है कि बलि 99 अश्वमेध यज्ञ पूरे कर चुके थे और 100वां अश्वमेध पूरा करने की तैयारी में थे। भगवान वामन छाता, दंड और जल से भरा कमंडल लेकर यज्ञशाला में पहुंचे। उनका तेज देखकर यज्ञ में मौजूद लोग पहले यह तय नहीं कर पाए कि सूर्यदेव आए हैं, अग्निदेव या सनत्कुमार। राजा बलि ने उनका स्वागत किया और इच्छा के मुताबिक दान मांगने को कहा।
तीन लोकों के राजा से मांगी सिर्फ तीन पग जमीन बलि ने वामन से सोना, गांव, हाथी, घोड़े और जरूरत के मुताबिक संपत्ति मांगने को कहा, लेकिन वामन ने इनमें से कुछ नहीं लिया। उन्होंने अपने पैरों से नापी जाने वाली केवल तीन पग भूमि मांगी। दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने बलि को समझाया कि यह साधारण ब्राह्मण नहीं, स्वयं विष्णु हैं और तीन पग में उनका पूरा राज्य ले लेंगे।
इसके बाद भी बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटे। उन्होंने जल लेकर दान का संकल्प पूरा किया। वामन ने उसी समय विराट त्रिविक्रम रूप धारण किया। एक पग से पृथ्वी और दूसरे पग से ऊंचे लोकों को नाप लिया। तीसरे पग के लिए बलि के पास देने को कुछ नहीं बचा।
राजा बलि ने तीसरा पग अपने सिर पर रखने को कहा और बलि को सुतल लोक भेज दिया। लेकिन राजा बलि से स्वर्ग का अधिकार लिया गया, तो उन्हें सुरक्षित सुतल का राज्य, भविष्य का इंद्र पद और भगवान का सान्निध्य भी मिला।
पुराणों में वामन द्वादशी पर छाता और जलपात्र दान देने की परंपरा वामन जयंती पर छाता, कमंडल या जलपात्र दान करने की परंपरा है। भागवत में लिखा है कि जब भगवान वामन का उपनयन संस्कार हो रहा था तब आकाश ने छाता और ब्रह्मा ने कमंडल दिया था। वहीं गरुड़ पुराण में भगवान वामन की पूजा के साथ छाता और पादुका दान करने का विधान मिलता है। इसलिए वामन द्वादशी पर छाता और जल से भरा पात्र दान करने की परंपरा है।








