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- The Story Of Lord Shiva And Goddess Parvati, Lesson Of Lord Shiva And Goddess Sati, Lord Shiva And Goddess Parvati Story In Hindi
16 घंटे पहले
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प्रजापति दक्ष के यज्ञ कुंड में देवी सती ने योग अग्नि से देह त्याग दी थी। इसके बाद भगवान शिव तप में लीन हो गए थे। काफी समय पर देवी ने हिमालयराज के यहां पार्वती के रूप में अवतार लिया। पार्वती शिव जी को पति रूप में पाना चाहती थीं, इसके लिए देवी कठोर तप कर रही थीं।
उस समय भगवान शिव भी तप में लीन थे। शिव संसार से पूरी तरह विरक्त हो चुके थे। वे न संबंधों में थे, न समाज में, केवल अपनी साधना में डूबे हुए थे।
एक दिन हिमालयराज अपनी पुत्री पार्वती के साथ शिव जी के पास पहुंचे। पार्वती का मन शिव को पति रूप में स्वीकार चुका था, और हिमालय राज भी यही चाहते थे। शिव जी तो गहन तपस्या में थे, वे किसी भी सांसारिक बंधन को स्वीकारने को तैयार नहीं थे।
हिमालय राज ने भगवान शिव जी प्रार्थना की कि हे प्रभु, आप एकांत में तप कर रहे हैं, यहां आपकी सेवा करने वाला कोई नहीं है। यदि आप अनुमति दें तो मेरी पुत्री पार्वती आपकी सेवा करना चाहती है।
शिव जी ने स्पष्ट कहा कि स्त्री-संग से विषयों की उत्पत्ति होती है। इससे वैराग्य डगमगाने लगता है, तप बाधित होता है। मैं एकांत चाहता हूं, क्षमा करें।
ये बात सुनकर देवी पार्वती ने बहुत ही मौलिक प्रश्न पूछा- जब आप स्वयं तप में लीन हैं, तो आपको ये कैसे ज्ञात होता है कि मैं स्त्री हूं और आप पुरुष?
ये प्रश्न सुनते ही शिव जी सोच-विचार करने लगे। ये केवल एक स्त्री का नहीं, एक ज्ञानी आत्मा का प्रश्न था। शिव जी ने स्वीकार किया कि हम दोनों ही अपने-अपने स्थान पर सही हैं। इसके बाद भगवान शिव ने कहा कि देवी पार्वती सीमित समय तक मेरी सेवा कर सकती हैं और फिर लौट जाएंगी।
प्रसंग की सीख
- मर्यादा हर रिश्ते में जरूरी है- चाहे वह अध्यात्म हो या व्यक्तिगत रिश्ता, यदि अपनी सीमाएं स्पष्ट हों तो कोई भी रिश्ता बिगड़ता नहीं है। रिश्तों में मर्यादा बनाए रखनी चाहिए, एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए।
- एकांत में आत्मनियंत्रण सर्वोपरि है – जब हम एकांत में होते हैं, विशेषकर विपरीत लिंग के साथ, तो मन की चंचलता को नियंत्रण में रखना अत्यंत आवश्यक है। ऐसा समय ही आत्मसंयम की असली परीक्षा होता है। एकांत में मन की पवित्रता बनाए रखनी चाहिए, गलत विचारों से बचना चाहिए।
- बुद्धिमानी केवल उत्तर देने में नहीं, सही समय पर सही प्रश्न पूछने में भी है – पार्वती ने जिस तरह भगवान शिव से प्रश्न किया, वह दर्शाता है कि बुद्धिमानी सिर्फ उत्तर देने में नहीं है, बल्कि सही समय पर सही प्रश्न पूछने में है। बुद्धिमान व्यक्ति ही सही समय पर सही प्रश्न पूछ सकता है।
- व्यवहार में संतुलन जरूरी है – भगवान शिव ने हिमालयराज की बात को न तो पूर्ण अस्वीकार किया और न ही भावनाओं में बहकर कोई निर्णय लिया, उन्होंने एक संयमित मध्यम मार्ग चुना। शिव जी ने देवी को समय-समय पर सेवा करने की अनुमति दी। हमें भी जहां तो हो सके सोच-विचार कर सही रास्ता चुनना चाहिए, तभी जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
- संयम, मर्यादा और संतुलन बनाए रखें- ये तीन स्तंभ हैं जो हमें आत्म-विकास की ओर ले जाते हैं। चाहे संबंधों का प्रबंधन हो या आत्मबोध की यात्रा, शिव और पार्वती की ये कथा हमें संयमित रहने का संदेश देती है।








