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इन दिनों ‘इस्लामिक-नाटो’ की बहुत चर्चा हो रही है। लेकिन मध्य-पूर्व में एक इस्लामी गठबंधन का विचार नया नहीं है। 1955 में भी सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए ब्रिटेन-अमेरिका के नेतृत्व में बगदाद पैक्ट बनाया गया था। इसमें इराक, तुर्किये, पाकिस्तान, ईरान शामिल थे। यह उसी वर्ष सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (सेंटो) में तब्दील हो गया। लेकिन 1979 में यह व्यवस्था बिखर गई। 2015 में भी आईएसआईएस के खिलाफ युद्ध को आगे बढ़ाने के मकसद से सऊदी अरब ने इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन के गठन की घोषणा की थी। 2017 में पाकिस्तान के पूर्व फौज प्रमुख राहील शरीफ को इसका पहला सैन्य कमांडर भी नियुक्त किया गया था। अब पाकिस्तान-सऊदी रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता सामने आया है, जिसमें नाटो की तरह यह प्रावधान है कि अगर गठजोड़ के किसी एक मुल्क पर हमला होता है तो इसे पूरे संगठन पर हमला मानकर उसका जवाब दिया जाएगा। तुर्किये भी इस समूह में शामिल होने पर विचार कर रहा है। भले ही ऐसा ‘इस्लामिक-नाटो’ जैसा कोई औपचारिक संगठन इस समय अस्तित्व में न हो, लेकिन इसकी संभावना मात्र के ही गंभीर भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं। सऊदी-पाक समझौता उन घटनाओं की पृष्ठभूमि में सामने आया है, जिनमें अमेरिका-इजराइल का ईरान से युद्ध, इजराइल द्वारा कतर पर बमबारी, यमन को लेकर सऊदी-यूएई तनाव और भारत का ऑपरेशन सिंदूर शामिल हैं। इन सबके बाद सऊदी को यह महसूस हुआ कि मध्य-पूर्व में इजराइल के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर उसे एक भरोसेमंद गठजोड़ की आवश्यकता है। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो सऊदी अरब उसकी चरमराती अर्थव्यवस्था को आर्थिक जीवनरेखा प्रदान कर सकता है। याद रखें कि 1967 में हुए सुरक्षा समझौते के बाद- और फिर 1979 में काबा में उग्रवादियों की घुसपैठ और ईरानी क्रांति के मद्देनजर- पाकिस्तानी सेना ने सऊदी अरब को सुरक्षा उपलब्ध कराई थी। इस समूह के लिए पाकिस्तान का परमाणु हथियार सम्पन्न होना भी बड़ा प्रोत्साहन है। इस्लामाबाद भी लंबे समय से कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन की तलाश करता रहा है और ऐतिहासिक रूप से इस विवाद को इस्लामी संदर्भ में प्रस्तुत करने की कोशिश करता रहा है। एक शक्तिशाली इस्लामी सुरक्षा ब्लॉक की सदस्यता पाकिस्तान के कूटनीतिक दबदबे को बढ़ा सकती है, भले ही अन्य सदस्य देश कश्मीर मुद्दे का सैन्यीकरण करने के प्रति अनिच्छुक हों। इस व्यवस्था में तुर्किये की दिलचस्पी मध्य-पूर्व के घटनाक्रमों से जुड़ी है, जो कभी उस्मानी साम्राज्य का हिस्सा रहा है। नाटो का सदस्य होने के बावजूद तुर्किये अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। वास्तव में, अपनी मजबूत सैन्य क्षमता के कारण वह स्वयं को इस्लामी दुनिया के लीडर के रूप में देखता है। फिर उसके पास एक सशक्त रक्षा उद्योग और युद्धक्षेत्र का पर्याप्त अनुभव भी है। ऐसे में यह नई दिल्ली के लिए रणनीतिक चिंता का विषय हो सकता है। वैचारिक आधार पर गठित ऐसा सैन्य ब्लॉक- जो पश्चिम एशिया, अफ्रीका के कुछ हिस्सों और दक्षिण एशिया तक फैला हो- क्षेत्रीय संतुलन को ऐसे ढंग से फिर से परिभाषित करेगा, जिसे भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता। लेकिन मध्य-पूर्व में चल रहे इन घटनाक्रमों का एक तात्कालिक परिणाम यूएई और भारत के बीच महत्वपूर्ण तालमेल के रूप में सामने आया है। हाल ही में यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद ने भारत की आधिकारिक यात्रा की थी। मध्य-पूर्व में बढ़े तनाव के बीच हुई इस यात्रा ने काफी ध्यान खींचा। अधिकारियों के अनुसार, दोनों नेताओं ने भारत-यूएई समग्र रणनीतिक साझेदारी और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने पर बातचीत की। लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण परिणाम रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिए एक समझौता करने के इरादे की घोषणा थी। देखें तो यह सऊदी-नेतृत्व वाले तथाकथित ‘इस्लामिक-नाटो’ पर यूएई की प्रतिक्रिया जैसा लगता है। भारत की विदेश नीति पारम्परिक रूप से बहुध्रुवीय दुनिया में फलती-फूलती रही है। उसने मुस्लिम-बहुल देशों के साथ अपने सम्बंध व्यावहारिक कूटनीति के जरिये प्रबंधित किए हैं। एक ‘इस्लामिक-नाटो’ इस व्यावहारिकता की जगह पहचान-आधारित गठजोड़ ला सकता है। यह भारत के कूटनीतिक लचीलेपन को कम करेगा, खासकर पश्चिम एशिया में, जहां नई दिल्ली ने सऊदी अरब, ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ अपने सम्बंधों को बड़े संतुलन के साथ साधा है। भारत की आर्थिक जीवनरेखाएं उन्हीं क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं, जो ‘इस्लामिक-नाटो’ की रीढ़ बन सकते हैं- फारस की खाड़ी, लाल सागर, हिंद महासागर। लेकिन मुस्लिम-बहुल देशों के रणनीतिक हितों में गहरे मतभेद भी हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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