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‘थोड़ा मुस्कुराया करो…’ अनास्तासिया रयान ने लंबे समय तक यह जुमला सुना। हद तो तब हो गई जब वह एक टेलीमार्केटर के रूप में काम कर रही थीं। अनास्तासिया बताती हैं, ‘मेरा अधिकांश काम फोन पर होता था, फिर भी सुपरवाइजर कहता था कि मुझे कॉल के दौरान मुस्कुराना चाहिए। अंत में कहा गया कि ऑफिस में मेरे चेहरे के हाव-भाव ठीक नहीं हैं और मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। इस अपमान को उन्होंने ताकत बनाया और उपन्यास ‘यू शुड स्माइल मोर’ लिखा। यह ऐसी महिला की कहानी है जो अपनी तटस्थ अभिव्यक्ति के कारण नौकरी खो देती है और फिर बदला लेती है। वे कहती हैं, ‘यह गुस्सा दिलाने वाला है क्योंकि आपको काम के बजाय आपके लुक और व्यवहार के लिए निशाना बनाया जाता है, ऐसा पुरुषों के साथ तो नहीं होता। येल यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिक और ‘व्हाई स्माइल ?’ की लेखिका मैरिएन लाफ्रांस इसके लिए जेंडर को लेकर पारंपरिक सोच को जिम्मेदार ठहराती हैं। मैरिएन कहती हैं, ‘दुनियाभर के बोर्डरूम से लेकर वर्कप्लेस तक, महिलाओं को मुस्कुराने की सलाह दी जाती है। पहली नजर में यह साधारण सुझाव लग सकता है, पर इसके पीछे छिपी लैंगिक असमानता व मानसिक दबाव की कहानी गहरी है। पुरुषों को लगता है कि महिलाओं को मुस्कुराने के लिए कहना उनका अधिकार है। इसलिए हर जगह महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे ‘स्त्रीत्व’ का प्रदर्शन करें। मुस्कुराहट इसका सबसे बड़ा जरिया मानी जाती है। एनवाईयू की प्रोफेसर मिंडा हार्ट्स के अनुसार, लोग चेहरे के हाव-भाव न समझ पाने पर असहज हो जाते हैं। इसलिए, आपकी मुस्कुराहट उनके लिए एक ‘तसल्ली’ की तरह काम करती है, जिसे वे अपनी सुविधा के लिए आपसे मांगते हैं। मिंडा कहती हैं, ‘ऐसी टिप्पणियां धीरे-धीरे इंसान के भरोसे को तोड़ देती हैं। वे कहती हैं, ‘मुझे भी लगता था कि क्या मेरे चेहरे में कोई खराबी है? असल में, मुस्कुराने के लिए कहने में यह संदेश छिपा होता है कि तुम मुझे असुविधा दे रही हो।
नकली मुस्कान से कड़ा संदेश दें, असहमति जताएंः एक्सपर्ट
मैरिएन कहती हैं, ऐसी स्थिति में व्यंग्यात्मक ‘नकली मुस्कान’ से कड़ा संदेश दें, जो सामने वाले को उसकी अनुचित मांग व आपकी असहमति का एहसास करा दे। मीटिंग में कोई ऐसा कहे, तो उसे नजरअंदाज करना या ‘चलिए विषय पर वापस आते हैं कहना बेहतर है। यह आपका अधिकार दर्शाता है। रयान के मुताबिक कोई सहकर्मी दबाव डाले, तो स्पष्ट रूप से कहें- क्या आप यही बात किसी पुरुष से कहते?’ मिंडा कहती हैं, ‘अपनी गरिमा व आत्मसम्मान को महत्व दें। बिना मुस्कुराए भी आप पेशेवर हो सकते हैं…।’ सामाजिक हथियार की तरह इस्तेमाल कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री डॉ. एलीं होचस्चाइल्ड कहती हैं, ‘प्रोफेशनल महिलाओं को भावनाएं ‘मैनेज’ करने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें मुस्कुराने के लिए कहा जाता है, तो उनसे उम्मीद की जाती है कि वे न सिर्फ अपना काम करें, बल्कि दूसरों को अच्छा महसूस कराने का ‘बोझ’ भी उठाएं। यह मानसिक रूप से थकाने वाला होता है क्योंकि उन्हें अपनी असली भावनाओं को दबाना पड़ता है। एक्सपर्ट मानते हैं कि ‘थोड़ा मुस्कुराओ’ कहना सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि महिलाओं की स्वायत्तता व उनके व्यक्तित्व को नियंत्रित करने का एक सामाजिक हथियार है।
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