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आज (सोमवार, 15 जून) ज्येष्ठ अधिकमास की अमावस्या है, इस तिथि के साथ अधिकमास खत्म हो जाएगा और फिर ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष शुरू होगा। जब सोमवार को अमावस्या पड़ती है, तो उसे सोमवती अमावस कहते हैं। आज मिथुन संक्रांति भी है। ज्योतिष में सूर्य के राशि बदलने की घटना को संक्रांति कहते है, आज सूर्य वृष से मिथुन राशि में प्रवेश करेगा।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, सोमवती अमावस, अधिकमास की अंतिम तिथि और मिथुन संक्रांति का योग होने से आज किए गए धर्म-कर्म अक्षय पुण्य प्रदान करेंगे। अक्षय पुण्य यानी ऐसा पुण्य जिसका शुभ असर जीवनभर बना रहता है, ऐसी मान्यता है। आज दान, नदी स्नान, मंत्र जप, पूजा और पितरों के निमित्त धूप-ध्यान करें। अधिकमास किसे कहते हैं? हिन्दी पंचांग चंद्रमा और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है। चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर रहता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग तीन साल में एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।
शुरुआत में इस अतिरिक्त महीने को कोई विशेष महत्व नहीं था, कोई भी देवता इस महीने का स्वामी बनने को तैयार नहीं था। तब इस मास ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। इसके बाद भगवान ने इसे अपना नाम देते हुए इसे पुरुषोत्तम मास कहा और इसके स्वामी बने। इसे सभी महीनों में श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया गया। इस महीने में भगवान विष्णु की विशेष पूजा करनी चाहिए, भागवत कथा पढ़ें-सुनें, गीता पाठ करें, दान-पुण्य भी करें। कई लोग पूरे महीने व्रत भी रखते हैं। इस महीने की अंतिम तिथि आज है, इसलिए अधिकमास की अमावस्या पर धर्म-कर्म जरूर करना चाहिए। जिन लोगों ने पूरे महीने नियमपूर्वक जप, पाठ या व्रत किया है, वे अंतिम दिन विशेष पूजा कर संकल्प की पूर्णाहुति देते हैं, कई लोग व्रत का उद्यापन भी करते हैं। क्या है मिथुन संक्रांति? जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस घटना को संक्रांति कहा जाता है। 15 जून 2026 को सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, इसलिए इस घटना को मिथुन संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा, ऊर्जा, शासन और जीवन शक्ति का कारक माना गया है। सूर्य के राशि परिवर्तन का प्रभाव मौसम, कृषि और सामाजिक जीवन पर भी माना जाता है। सूर्य सिद्धांत, बृहत्संहिता तथा अन्य ज्योतिष ग्रंथों में संक्रांति काल को पुण्यकाल बताया गया है। इस दौरान स्नान, दान और सूर्य पूजा करने का विशेष महत्व है। अब जानिए अमावस्या पर पितरों के लिए धूप-ध्यान कैसे कर सकते हैं… शास्त्रों में दोपहर करीब 12 बजे के समय को कुतुप काल कहा गया है, ये समय पितरों के लिए शुभ काम करने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। अमावस्या की दोपहर गाय के गोबर से बना कंडा जलाएं और जब कंडे से धुआं निकलना बंद हो जाए, तब कंडे के अंगारों पर गुड़-घी और खीर-पुड़ी अर्पित करें। इस दौरान ऊँ पितृदेवेभ्यो नम: मंत्र का जप करते रहें। हथेली में जल लें और अंगूठे की ओर से पितरों को चढ़ाएं। जल में काले तिल मिलाकर तीन बार जल अर्पित कर सकते हैं। इस तरह धूप-ध्यान करने के लिए घर के आसपास जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाएं। अनाज, धन, जूते-चप्पल, कपड़े और धन का दान करें। धूप-ध्यान करते समय पितरों से प्रार्थना कर सकते हैं कि हे पितृगण, आप जहां भी हों, प्रसन्न रहें। हम श्रद्धापूर्वक आपका स्मरण करते हैं। कृपया हमें आशीर्वाद दें। अमावस्या पर सकते हैं ये शुभ काम
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