मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:  अमेरिका और चीन के बीच हम क्या रणनीति अपनाएं?
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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम: अमेरिका और चीन के बीच हम क्या रणनीति अपनाएं?

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5 घंटे पहले

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मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक - Dainik Bhaskar

मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक

2014 से 2018 के बीच शी जिनपिंग ने भारत को अमेरिका के भू-राजनीतिक घेरे से निकाल बाहर करने की भरसक कोशिशें की थीं। सितंबर 2014 में वे अहमदाबाद में साबरमती रिवरफ्रंट के सामने नरेंद्र मोदी के साथ झूले पर बिना किसी वजह के नहीं बैठे थे।

2008 में वुहान और 2019 में महाबलीपुरम में हुई समिट्स में उन्होंने दो और प्रयास किए। इन प्रलोभनों के अलावा शी ने ताकत की आजमाइश करने की भी कोशिश की। इसका सबूत डोकलाम था। लेकिन कोई कवायद काम नहीं आई। भारत अमेरिका के खेमे में बना रहा। 2020 में गलवान की घटना हुई। भारत-चीन संबंधों को फिर से सामान्य होने में पांच साल लग गए।

आखिर चीन भारत को अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गठबंधन से दूर क्यों रखना चाहता है? दलाई लामा पर आक्रामक बयानबाजी और अरुणाचल प्रदेश में जिलों के नाम बदलने की हिमाकतों के बावजूद शी को पता है कि अमेरिका, चीन और भारत के बीच विकसित हो रहे त्रिकोण में भारत एक तीसरा महत्वपूर्ण कोण है।

अमेरिका को भी यह बात मालूम है। यही कारण है कि ट्रेड-वॉर की पेचीदगियों के बावजूद प्रतिरक्षा, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत-अमेरिका साझेदारी और गहरा रही है। हालांकि, अमेरिका इस बात से भी चिंतित हो सकता है कि भारत अगला चीन बन सकता है।

वो जानता है कि आज भारत की जीडीपी उतनी ही है, जितनी कि 2008 में चीन की थी। यदि भारत अपनी वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर को 8 प्रतिशत तक बढ़ाता है, तो उसकी अर्थव्यवस्था 18 वर्षों में चौगुनी होकर 16 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी- जो आज चीन की अर्थव्यवस्था के लगभग बराबर होगी।

बेशक अमेरिका के लिए भारत, चीन की तुलना में अलग तरह की चुनौतियां और लाभ प्रस्तुत करता है। यह चीन के उलट एक लोकतांत्रिक देश है। इसमें स्वतंत्र मीडिया और एक पारदर्शी न्यायपालिका है। कई मायनों में भारत की विविधता अमेरिका के अनुरूप है।

इसलिए अमेरिकी थिंक टैंकों का मानना है कि एक ध्रुवीकृत दुनिया में भारत उनका आदर्श सहयोगी साबित होगा। लेकिन अमेरिका की फितरत यह है कि वह अपने प्रतिस्पर्धियों की नकेल कसने के बारे में सोचता रहता है, फिर चाहे वे आज के हों या आने वाले कल के।

यही कारण है कि उसने 1990 के दशक से 2025 तक सोवियत संघ के बाद वाले रूस को घेरने के लिए नाटो के धीरे-धीरे बढ़ते विस्तार का इस्तेमाल किया था। रूस-यूक्रेन युद्ध के मूल में अमेरिका की यही नीति है। रूस की अर्थव्यवस्था पर भारी प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिससे चीन पर उसकी निर्भरता बढ़ गई है।

शीत युद्ध के दौर के अपने प्रतिद्वंद्वी को कमजोर करने के बाद अब अमेरिका ने अपना ध्यान चीन की ओर लगाया है। लेकिन चीन रूस की तुलना में अलग तरह का खतरा पेश करता है। ईवी, महत्वपूर्ण खनिजों और एआई में चीन की बढ़त अमेरिकी आधिपत्य को चुनौती देती है।

2035 तक भारत की अर्थव्यवस्था 8 ट्रिलियन की हो जाएगी। ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया है कि भारत ने दशकों से चली आ रही अपनी शांतिवादी छवि को त्यागा है। अब पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद का मुकाबला सैन्य-कार्रवाई से किया जाएगा। यह अमेरिका को चिंतित करता है। यही कारण है कि वह भारत को तंग करने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है।

भारत-उदय का डर बीजिंग को भी परेशान करता है, अलबत्ता पूरी तरह अलग कारणों से। अमेरिका की तरह चीन भी भारत के बड़े उपभोक्ता बाजार का दोहन करना चाहता है। लेकिन भारत की बढ़ती ताकत उसे खटकती है। शक्तिशाली भारत के प्रति चीन का डर अमेरिका की तुलना में ज्यादा तात्कालिक है।

ऐसे में भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए? त्रिभुज के तीसरे कोण के रूप में भारत एक अच्छी स्थिति में है। हम चीन को दूर रखते हुए अमेरिका के साथ अपनी आर्थिक, तकनीकी और रक्षा साझेदारी को गहरा कर सकते हैं, लेकिन बीजिंग को भी भारत के बढ़ते उपभोक्ता बाजार का स्वाद चखने का मौका दे सकते हैं।

अमेरिकी बाजार में प्रमुख चीनी निर्यात के लिए जगह नहीं होने के कारण बीजिंग को जल्द से जल्द विकल्प तलाशने की जरूरत है। आसियान और ईयू- दो विकल्प हैं। लेकिन चीन पहले से ही आसियान के साथ भारी व्यापार कर रहा है, जिससे उसका लाभ सीमित हो रहा है।

इधर यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद ईयू के साथ संबंध खराब हो गए हैं। इस भू-राजनीतिक भूलभुलैया में भारत के पास कुछ महत्वपूर्ण कार्ड हैं। लेकिन अगले दशक की प्रमुख शक्ति के रूप में उभरने के लिए उसे रणनीतिक रूप से कदम बढ़ाने होंगे।

अमेरिका, चीन और भारत के बीच विकसित हो रहे त्रिकोण में भारत तीसरा कोण है। अमेरिका को यह बात मालूम है। भारत-अमेरिका साझेदारी गहरा रही है। हालांकि अमेरिका इससे भी चिंतित है कि भारत अगला चीन बन सकता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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