मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:  अमेरिका-यूरोप के गठजोड़ में टूट का हम फायदा उठाएं
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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम: अमेरिका-यूरोप के गठजोड़ में टूट का हम फायदा उठाएं

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2 घंटे पहले

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मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक - Dainik Bhaskar

मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक

डेनमार्क के सम्प्रभु क्षेत्र ग्रीनलैंड पर ट्रम्प की हमले की धमकी ने नाटो के सदस्य देशों के बीच सैन्य टकराव का खतरा पैदा कर दिया है। 32 सदस्यीय नाटो गठबंधन के अनुच्छेद-5 के तहत यदि किसी सदस्य देश पर हमला हो तो दूसरे सदस्यों को उसकी रक्षा करनी होती है। हालांकि ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे नाटो सदस्य अमेरिका से टकराने का जोखिम शायद ही उठाएंगे।

लेकिन आखिर अमेरिका को ग्रीनलैंड क्यों चाहिए? क्योंकि इस आर्कटिक द्वीप की तीन बड़ी खूबियां हैं। पहली, आर्थिक : ग्रीनलैंड में पर्याप्त तेल और खनिज भंडार हैं। दूसरी, सुरक्षागत : ग्रीनलैंड रूसी और चीनी नौसेनाओं तथा उनके लड़ाकू विमानों पर लगतार निगरानी रख सकता है, क्योंकि वे लगातार इस द्वीप के ऊपर से गुजरते हैं। तीसरी, लॉजिस्टिक्स सम्बंधी : ग्रीनलैंड यूरोप व एशिया के बीच कम समय लेने वाले आर्कटिक समुद्री मार्ग मुहैया कराता है। ये व्यापार के साथ भविष्य के सैन्य अभियानों के लिए भी अहम है।

ट्रम्प कहते हैं कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करेगा, चाहे सख्त रास्ता ही क्यों ना अपनाना पड़े। यूरोपीय देश इससे चिंतित हैं। ग्रीनलैंड की आबादी मात्र 57 हजार है, लेकिन उसके लोग अमेरिका का हिस्सा बनने के खिलाफ हैं। 18वीं सदी से ही ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने अपना रुख साफ कर दिया है कि ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्जे की कोशिश नाटो के अंत की घोषणा होगी।

नाटो के सदस्य अन्य यूरोपीय नेताओं ने भी फ्रेडरिक्सन का समर्थन किया है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा है कि ‘ग्रीनलैंड का भविष्य वहां के लोगों और डेनमार्क द्वारा ही तय किया जाएगा।’ लेकिन ट्रम्प ने यूरोप की आपत्तियां खारिज कर दी हैं। उन्हें तो अमेरिका-यूरोप गठबंधन के संभावित विघटन की भी ज्यादा चिंता नहीं है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही पश्चिम के तमाम भू-राजनीतिक सिद्धांतों का आधार रहा है।

ट्रम्प के लिए अमेरिकी और कैरेबियाई क्षेत्र वाले पश्चिमी गोलार्ध का महत्व अटलांटिक महासागर के पार वाले पुराने यूरोप से कहीं अधिक है। भू-भागों पर जबरन कब्जा करने का अमेरिका का लंबा इतिहास रहा है। अमेरिका में आए शुरुआती ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने वहां सदियों से रह रहे मूल अमेरिकियों से उनकी जमीन हथिया ली थीं।

आजादी के बाद अमेरिका ने 1846-48 में मैक्सिको से युद्ध लड़ कर कैलिफोर्निया और टेक्सास समेत उसकी आधी भूमि कब्जा ली थी। उससे पहले 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइसियाना और 1867 में रूस से अलास्का खरीद लिया था। ऐसे में ग्रीनलैंड पर कब्जा करना भी उसके औपनिवेशिक डीएनए का ही हिस्सा है।

अमेरिका और यूरोप के बीच ऐतिहासिक रिश्तों का कमजोर होना भारत के लिए भू-राजनीति के नए विकल्प खोलता है। 2030 तक भारत के दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावना है। भारत का 60 करोड़ मध्यमवर्गीय उपभोक्ताओं का बाजार अमेरिका और ईयू के कुल उपभोक्ता बाजार से भी बड़ा है।

चीन में अहम तकनीकी उद्योगों से बहिष्कृत और अमेरिका में भारी टैरिफ का सामना कर रहीं यूरोपीय कंपनियों के लिए भारत का यह विशाल बाजार एक आकर्षक पेशकश करता है। हालांकि, भारतीय उपभोक्ताओं की खरीद-क्षमता अभी सीमित है, लेकिन उनकी खर्च योग्य आय अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के उपभोक्ताओं की तुलना में तेजी से बढ़ रही है।

आज जब ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-यूरोप का पश्चिमी गठबंधन टूट रहा है तो भारत को इस मौके का फायदा उठाते हुए 1 फरवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट में कस्टम ड्यूटी में और छूट देनी चाहिए। जरूरत इस बात की है कि इस निर्णायक दौर में आर्थिक सुधारों की रफ्तार और तेज कर दी जाए।

आज जब ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप का पश्चिमी गठबंधन टूट रहा है तो भारत को इस मौके का फायदा उठाना चाहिए। हम आगामी 1 फरवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट में कस्टम ड्यूटी में और छूट दे सकते हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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