18 घंटे पहले
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सवाल– मेरी उम्र 28 साल है और मैं नोएडा में एक आईटी कंपनी में काम करता हूं। मैं पहली बार रांची से बाहर निकला हूं और घर से दूर अकेले रहकर जॉब करने का ये पहला मौका है। मैं हमेशा से ही थोड़ा कम बोलने वाला और दब्बू किस्म का बच्चा था। स्कूल में भी इस कारण मुझे काफी बुली किया गया है। मेरे कभी कोई दोस्त भी नहीं रहे। मेरे पापा की डेथ बहुत बचपन में ही हो गई थी। मेरी मां सिंगल मदर हैं। घर में सिर्फ मैं और मम्मी ही हैं और हमारी कुछ ज्यादा सोशल सर्कल भी नहीं है। मेरी प्रॉब्लम ये है कि मुझे लोगों से मिलने–जुलने और बात करने में डर लगता है। ऑफिस में भी मैं किसी से घुल–मिल नहीं पाता। मीटिंग में प्रेजेंटेशन देते हुए घबराने लगता हूं, जिसका असर मेरी प्रोफेशनल ग्रोथ पर भी पड़ रहा है। ऑफिस में सब मुझे एरोगेंट समझते हैं, जो कि सच नहीं है। मुझे लड़कियों से बात करने में भी अजीब सी घबराहट और संकोच होता है। देखकर ही हकलाने लगता हूं। जब तक रांची में था तो इतना ज्यादा अकेलापन नहीं लगा, जितना अब नोएडा आकर फील होता है। मेरा कोई दोस्त नहीं। मुझे क्या करना चाहिए।
एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।
जवाब– खुलकर आने और सवाल पूछने के लिए आपका बहुत शुक्रिया। आपका सवाल पढ़ने के बाद मुझे जो शुरुआती कंसर्न नजर आ रहे हैं, वो कुछ इस प्रकार हैं–
- सोशल रिलेशनशिप्स की पहल करने और उसे बनाए रखने में कठिनाई हो रही है।
- आप एक तरह की सोशल आइसोलेशन महसूस करते हैं, खासतौर पर बिल्कुल नए, अनजान वातावरण में।
- सार्वजनिक रूप से बोलने, बात करने में आपको डर लगता है (जैसे कि मीटिंग में बोलने में घबराहट)।
- आपके कुलीग्स आपको अपने आप में रहने वाला और एरोगेंट समझते हैं।
- आप बचपन में भी बुलीइंग का शिकार हो चुके हैं।
- बचपन में पिता को खो देना और सिंगल पेरेंट के द्वारा परवरिश का मनोविज्ञान में अपना प्रभाव पड़ा है। (मैं यहां सिंगल मदर की जगह सिंगल पेरेंट लिख रहा हूं। अकेली मां टर्म के साथ जो एक नेगेटिविटी या पूर्वाग्रह जुड़े हैं, उम्मीद हैं आप उससे मुक्त होंगे। इस पर हम आगे और भी चर्चा करेंगे।)
- मां से दूर होने, नए शहर में अकेले रहने के कारण अकेलेपन का एहसास और ज्यादा बढ़ गया है।
- आपको कोई क्लोज फ्रेंड या कोई रोमांटिक रिलेशनशिप नहीं है।

1. सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर (SAD) टेस्ट
आपने अपने सवाल में जिस सोशल फिअर या डर के बारे में लिखा है, जहां आपको इस बात का डर सताता है कि लोग आपको जज कर रहे हैं। इस कारण आप बात करने, पब्लिकली बोलने से डरते हैं। ये सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर (SAD) के संकेत हैं। SAD के कारण अकसर चाइल्डहुड बुलिंग और सोशल रिजेक्शन के अनुभवों में छिपे होते हैं
SAD सेल्फ स्क्रीनिंग टेस्ट
आप SAD के स्पेक्ट्रम में कहां खड़े हैं, ये जानने के लिए हम एक सोशल एंग्जाइटी सेल्फ स्क्रीनिंग करेंगे। यहां हम Liebowitz सोशल एंग्जाइटी स्केल का इस्तेमाल करेंगे।
नीचे ग्राफिक में दिए गए सवालों को ध्यान से पढ़ें और खुद को नीचे दिए गए स्कोर चार्ट के हिसाब से नंबर दें।

2. सेल्फ इस्टीम टेस्ट
लंबे समय तक सोशल आइसोलेशन झेलने, बुली का शिकार होने और मददगार रिश्तों की कमी के कारण आपकी जो एक सेल्फ इमेज बन गई है, वो ऐसी है कि जिसमें आप खुद को मूल्यवान नहीं समझते। सेल्फ वर्थ का एहसास कम हो गया है।
इसके स्पेक्ट्रम को समझने के लिए हम सेल्फ इस्टीम टेस्ट करेंगे, जिसके लिए हम रोजेनबर्ग सेल्फ इस्टीम स्केल (RSE) का इस्तेमाल करेंगे। नीचे ग्राफिक में 10 सवाल दिए हुए हैं। इन सवालों को ध्यान से पढ़ें और खुद को नीचे दिए गए स्कोर चार्ट के हिसाब से नंबर दें।

सेल्फ हेल्प प्लान
ऊपर दिए गए दोनों सेल्फ एसेसमेंट करने के बाद अब हम बात करेंगे सेल्फ हेल्प प्लान की। आपके लिए इस प्लान को डिजाइन करते हुए मैंने इन बेसिक टेकनीक का सहारा लिया है।
- कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT)
- एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थेरेपी (ACT)
- सोशल स्किल ट्रेनिंग (रिसर्च और क्लिनिकल प्रैक्टिसेस द्वारा प्रमाणित)
इसमें अब हम सबसे पहले बात करेंगे कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) की।
स्टेप 1
अपने नकारात्मक विचारों और सोच को रीस्ट्रक्चर करना
इसके लिए सबसे पहले हमारे मन में जो भी नेगेटिव ख्याल आते हैं, उनके बारे में तार्किक ढंग से सोचने का अभ्यास करना होता है। ये एक डेली प्रैक्टिस है, जो आपको हर उस स्थिति के लिए करनी चाहिए, जिसे लेकर आपके मन में डर या नेगेटिव ख्याल हैं।
समस्या: मैं सोशलाइज नहीं कर पाता। लोग समझते हैं कि मैं एरोगेंट हूं।
समाधान: एक ‘थॉट डायरी’ लिखना शुरू करें। इसे विचारों की डायरी भी कह सकते हैं।
नीचे ग्राफिक में इसका एक उदाहरण है।

स्टेप 2
सोशल एंग्जाइटी को धीरे-धीरे कम करना
इसके लिए आपको खुद को एक टारगेट देना है। और हर रोज अपनी डायरी में लिखना है कि आपने अपना टारगेट पूरा किया या नहीं। जैसेकि किसी कुलीग को देखकर मुस्कुरा, हलो कहना, कुलीग्स के साथ बैठकर लंच करना। रोज एक छोटा-छोटा कदम बढ़ाना है। नीचे दिए ग्राफिक के मुताबिक अपनी डायरी में एक ग्राफिक बनाइए और रोज हां या ना में उसका जवाब लिखिए।

स्टेप 3
सेल्फ इस्टीम डेवलप करना
सेल्फ इस्टीम डेवलप करने के तीन प्रमुख हिस्से हैं:
A. डेली अचीवमेंट जर्नल यानी रोज की उपलब्धियों को डायरी में लिखना
रोज अपनी कोई तीन उपलब्धियां डायरी में नोट करें-
- आज मैंने अपने कुलीग्स के साथ बैठकर लंच किया।
- आज मैंने एक कुलीग को देखकर स्माइल दी।
- आज मैंने टीम मीटिंग में हिस्सा लिया।
- आज मैंने अपने नेगेटिव थॉट को आने नहीं दिया।
- आज मैंने एक टीममेट से आई कॉन्टैक्ट किया।
- आज मैंने एक कुलीग को शादी के लिए बधाई दी।
- आज मैंने एक कुलीग को आगे बढ़कर बर्थडे विश किया।
B. एसर्टिवनेस या सकारात्मकता की प्रैक्टिस करना
मैं, मुझे, मेरा, मेरे लिए शब्दों के साथ वाक्य बोलने का अभ्यास करें :
- मैं इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना चाहता हूं।
- मुझे ये काम पूरा करने के लिए दो दिन और चाहिए।
- जब मुझे प्रोजेक्ट में शामिल नहीं किया जाता तो मुझे बुरा लगता है।
C. सेल्फ कंपैशन का अभ्यास
रोज सुबह एक आईने के सामने खड़े हों और खुद से कहें:
- मैं बेस्ट कर रहा हूं।
- मैं रोज एक कदम बढ़ रहा हूं।
- मैं अच्छा काम कर रहा हूं।
- मुझे खुद पर गर्व है।
स्टेप 4
नए एडल्ट फ्रेंड्स बनाने की प्रैक्टिस करना
- छोटे-छोटे ग्रुप क्लोसज जॉइन करें, जैसे फोटोग्राफी, पेंटिंग, कुकिंग, बेकिंग, योगा क्लासेज वगैरह।
- छोटी-छोटी ग्रुप एक्टिविटी में हिस्सा लें, जैसे वॉकिंग ग्रुप, हेरिटेज वॉक ग्रुप, बर्ड वॉचिंग ग्रुप, पोएट्री ग्रुप, ड्रामा ग्रुप वगैरह।
- किसी लोकल एनजीओ के लिए कुछ वॉलेंटियर काम करें (वहां आपको हमविचार लोगों से मिलने का मौका मिलेगा।)
- अपनी भाषा में एक तरह की ओपेननेस की प्रैक्टिस करें। जैसेकि ये कहना-
- मैं इस शहर में नया हूं। यहां अच्छा साउथ इंडियन खाना कहां मिलेगा?
- मैं इस शहर में नया हूं। यहां अच्छा सिनेमा हॉल कौन सा है?
- मैं इस शहर में नया हूं। यहां आर्ट-कल्चरल एक्टिविटीज कहां होती हैं ?
स्टेप 5
वर्कप्लेस स्किल ट्रेनिंग
ऑफिस में खुद को लोगों से इंट्रोड्यूज करने की प्रैक्टिस करें। छोटे-छोटे संवाद करें। फैमिली, हॉबी, मोटिवेशन, सिनेमा, म्यूजिक, इंटरेस्ट वगैरह के बारे में स्मॉल टॉक करें।
कुछ उदाहरण:
- हलो, मेरा नाम….. है। मुझे ये ऑफिस जॉइन किए 6 महीने हुए। आप यहां क्या काम करते हैं?
- आपने ये वर्कफील्ड क्यों चुना?
- क्या आपको म्यूजिक का शौक है?
- क्या आप यहां आसपास हाइकिंग के लिए जाते हैं?
स्टेप 6
डेली सेल्फ रेगुलेशन प्रैक्टिस
इससे अपने इमोशंस को कंट्रोल करने और एंग्जाइटी को कम करने में मदद मिलती है। इस प्रैक्टिस के दो हिस्से हैं:
A. ब्रीदिंग प्रैक्टिस
जब भी सोशल एंग्जाइटी महसूस हो तो ये ब्रीदिंग प्रैक्टिस करें।
- सांस भीतर खींचें।
- 4 सेकेंड तक रोककर रखें।
- सांस छोड़ें।
- फिर 4 सेकेंड तक सांस रोककर रखें।
- दोबारा सांस भीतर खींचें।
- ऑफिस में मीटिंग या प्रेजेंटेशन से पहले 2 से 5 मिनट तक यह ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें।
B. ग्राउंडिंग टेकनीक (5–4–3–2–1)
जब भी एंग्जाइटी महसूस हो तो इस ग्राउंडिंग टेकनीक का अभ्यास करें। इस टेकनीक में हम अपने सारे सेंसेज का इस्तेमाल करते हैं।
- 5 चीजें जो दिखाई दे रही हैं
- 4 चीजें जो महसूस हो रही हैं
- 3 चीजें जो सुनाई दे रही हैं
- 2 चीजें जो स्मेल कर पा रहे हैं।
इसे इस उदाहरण से समझें। जब आपका ब्रेन एंग्जाइटी से परेशान हो तो उसे भटकाने के लिए आप इस टेक्नीक का अभ्यास कर रहे हैं। आपके ब्रेन ने सोचना शुरू किया:
- 5 चीजें जो दिखाई दे रही हैं- पेड़, सड़क, खिड़की, पंखा, लैपटॉप
- 4 चीजें जो महसूस हो रही हैं- चिंता, डर, उत्तेजना, कंपकंपी, गर्मी
- 3 चीजें जो सुनाई दे रही हैं- हॉर्न की आवाज, नल से पानी का टपकना, बच्चे का रोना
- 2 चीजें जो स्मेल कर पा रहे हैं- हवा में बारिश की खुशबू, एसी की अजीब सी स्मेल
स्टेप 6
प्रोफेशनल हेल्प कब लें
अगर 6 से 8 हफ्ते तक इस सेल्फ हेल्प प्लान पर काम करने के बाद भी आपके मन में नीचे दिए ख्याल आ रहे हों तो आपको तुरंत प्रोफेशनल मदद की जरूरत है।
- आपकी सोशल एंग्जाइटी कम न हो।
- आप लोगों से मिलने, बात करने से कतराते रहें।
- आपकी सेल्फ वर्थ का एहसास और कम हो जाए।
- भूख, नींद कम होने लगे या बहुत ज्यादा बढ़ जाए।
- मन में खुद को नुकसान पहुंचाने के ख्याल आएं।
हमेशा याद रखें-
आप टूटे हुए नहीं हैं। आप बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। आपके बचपन के अनुभवों ने सामाजिक जीवन को थोड़ा मुश्किल बना दिया है। लेकिन आपका अतीत, आपका वर्तमान नहीं तय करता। आप उससे परिभाषित नहीं होते। आप अभी भी सीख सकते हैं, खुद को बदल सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं। …………………
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मेरी उम्र 33 साल है और मैं रांची में रहता हूं। मुझे लगता है कि पिछले डेढ़ साल से मैं इमोशनल ईटिंग का शिकार हूं। जब भी कोई तनाव या परेशानी होती है तो मैं पूरा पैकेट चिप्स, केक, कुकीज या आइसक्रीम का पूरा बॉक्स खा जाता हूं। इस वजह से मेरा वजन भी बढ़ रहा है। हाल ही में ब्लड टेस्ट कराया तो उसमें फैटी लिवर निकला। पूरा दिन कंट्रोल भी करता हूं, लेकिन फिर रात होते-होते स्नैक्स का पैकेट खोल ही लेता हूं। क्या ये मेंटल हेल्थ इश्यू है? पूरी खबर पढ़िए…








