16 घंटे पहले
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सवाल– मेरी उम्र 33 साल है और मैं नोएडा में एक कॉल सेंटर में 20,000 रुपए सैलरी पर काम करता हूं। पिछले कुछ सालों से मैं धीरे-धीरे डिप्रेशन में जा रहा हूं। मैंने घर जाना और घरवालों से फोन पर बात करना भी तकरीबन बंद कर दिया है। मेरे पापा क्लास 1 गवर्नमेंट जॉब में थे। मेरे दो भाई और कजिन्स सब टॉप क्लास सरकारी और प्राइवेट जॉब्स में हैं। बहुत मेहनत के बाद भी मेरा करियर उनकी तरह नहीं बन पाया। काफी साल तो मैंने आईएएस की तैयारी में ही गंवा दिए। मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ और उम्र निकल गई। पापा से जब भी बात होती है तो वो यही ताना देते हैं कि अपने भाइयों को देखो, सब जीवन में कितने आगे निकल गए, कितने सफल हैं और तुम वहीं–के–वहीं रह गए। मुझे कोई समझता नहीं है, सिर्फ कमियां ही निकालते हैं। घर पर सिर्फ मम्मी से मेरी बात होती है। फैमिली से दूर होकर मैं अकेला पड़ गया हूं। मेरा अकेलापन और उदासी गहरी होती जा रही है। मैं अपनी मदद कैसे करूं, कैसे बेहतर महसूस करूं।
एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।
सबसे पहले तो यह सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। सवाल पूछना ही यह दर्शाता है कि आप में अपनी समस्या को एड्रेस करने और खुद के बारे में बेहतर महसूस करने का जज्बा है। आप यथास्थिति में नहीं रहना चाहते।
इसलिए हम एक–एक करके आपके सवाल के सभी पहलुओं पर बात करेंगे और डिटेल में सेल्फ हेल्प प्लान भी डिसकस करेंगे।
EE के नजरिए से स्थिति का मूल्यांकन
सबसे पहले मैं मनोविज्ञान के एक सिद्धांत EE (एक्सप्रेस्ड इमोशंस) के जरिए आपकी मन:स्थिति का मूल्यांकन करूंगा। सन् 1950 में एक ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक जॉर्ज ब्राउन ने EE की थ्योरी पेश की थी। यह थ्योरी मनुष्य के मनोविज्ञान पर परिवार और करीबी लोगों के प्रभाव को समझने और उसका मूल्यांकन करने का प्रयास करती है। यह थ्योरी डिटेल में यह एक्सप्लेन करती है कि जो हमारे अपने करीबी लोग होते हैं, उनकी आलोचना, ताने या दूसरों से तुलना का हमारे मनोविज्ञान पर क्या असर पड़ता है। अगर वो हमारी जिंदगी में बहुत ज्यादा हस्तक्षेप करें, हमें नीचा दिखाएं और अगर परिवार से सराहना और सहयोग न मिले तो ये चीजें हमारे मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती हैं।

EE के मुख्य प्रकार
EE थ्योरी फैमिली के द्वारा एक्सप्रेस किए जा रहे इमोशंस को मुख्य रूप से इन 5 श्रेणियों में बांटती है, जिसकी डिटेल नीचे ग्राफिक में है। जैसाकि आपके सवाल से स्पष्ट है, आपकी पीड़ा सिर्फ ये नहीं है कि आप अपने भाइयों या परिवार के बाकी लोगों के बराबर जीवन में सफलता नहीं हासिल कर पाए, पीड़ा ये है कि आपके प्रयास को अप्रिशिएट करने और सहयोग करने की बजाय परिवार हमेशा आपको इस बात का एहसास कराता है कि आप बाकियों से कमतर हैं। यह तुलना और आलोचना मानसिक स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा नेगेटिव असर डालती है और सेल्फ इस्टीम को प्रभावित करती है।

परिवार की आलोचना का सेल्फ इस्टीम पर प्रभाव
सेल्फ इस्टीम और EE इंपैक्ट टेस्ट
आगे बढ़ने से पहले मैं आपको अपने इमोशनल स्टेट को बेहतर समझने के लिए दो सेल्फ स्क्रीनिंग टूल दे रहा हूं। नीचे दो ग्राफिक्स में दो अलग–अलग टेस्ट हैं, जिनमें 5–5 सवाल दिए हैं। इन सवालों का आपको हां या ना में जवाब देना है। सवाल के नीचे उसके जवाबों का इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में ही दिया हुआ है। पहले सवालों के जवाब दीजिए और फिर उसका इंटरप्रिटेशन चेक करिए।

EE इंपैक्ट टेस्ट
पिछले टेस्ट के बाद अब यह दूसरा टेस्ट करिए और समझिए कि परिवार द्वारा व्यक्त किए जा रहे इमाेशंस आपके मेंटल स्टेट और मेंटल हेल्थ को किस हद तक प्रभावित कर रहे हैं। अगर 3 से ज्यादा सवालों का उत्तर हां में है तो उसका अर्थ है कि यह प्रभाव बहुत गहरा है और सेल्फ हेल्प के साथ–साथ आपको प्रोफेशनल हेल्प की भी जरूरत पड़ सकती है।

EE का मेंटल हेल्थ पर असर
यह हमारे आत्मसम्मान को कैसे प्रभावित करता है
EE जब लगातार होता है, तो व्यक्ति खुद पर शक करने लगता है। अपनी नजरों में उसकी वैल्यू कम हो जाती है, उसका आत्मसम्मान प्रभावित होता है। वे खुद से ऐसे सवाल पूछने लगता है–
- क्या मैं वाकई कमजोर हूं?
- क्या मैं कुछ भी करने के लायक नहीं हूं?
- क्या मैं बाकियों जितना काबिल नहीं हूं?
लंबे समय में यह लो सेल्फ इस्टीम और सेल्फ क्रिटिसिज्म क्लिनिकल डिप्रेशन का भी कारण बन सकता है।
आपके केस में EE कैसे दिखता है?
दूसरे ग्राफिक में EE के जो प्रकार बताए गए हैं, उस पैरामीटर पर अगर आपके केस को देखें तो आलोचना से लेकर हॉस्टिलिटी और प्यार का अभाव कुछ इस रूप में दिखाई देता है।
आलोचना– “तुम आईएएस नहीं बन पाए, बाकी सब बन गए।”
हॉस्टिलिटी– “तुमसे तो अब कोई उम्मीद नहीं है।”
ओवर इन्वॉल्वमेंट– “हमने तो सबकुछ किया तुम्हारे लिए।”
प्यार और अपनेपन का अभाव– “अब घर आकर क्या मुंह दिखाओगे?”
आप डिप्रेशन नहीं, लो सेल्फ इस्टीम का शिकार हैं
आप जिस भावनात्मक स्थिति से गुजर रहे हैं, वो दरअसल डिप्रेशन नहीं, बल्कि लो सेल्फ इस्टीम है। हालांकि अगर यह स्थिति बहुत लंबे समय तक बनी रहे और व्यक्ति खुद को नापसंद करने लगे तो यह क्लिनिकल डिप्रेशन का भी रूप ले सकती है। लेकिन मेरा मानना है कि अभी आपकी कंडीशन उस लेवल तक नहीं पहुंची है क्योंकि आप सवाल पूछ रहे हैं और अपनी समस्या को एड्रेस करने की कोशिश कर रहे हैं। नीचे कुछ पॉइंट्स में समझिए कि लो सेल्फ इस्टीम और डिप्रेशन में क्या फर्क होता है।
- लो सेल्फ इस्टीम होने पर इंसान सोचता है कि मैं शायद उतना अच्छा और काबिल नहीं हूं। लेकिन डिप्रेशन में ऐसे ख्याल आते हैं कि मेरे जीवन का कोई अर्थ ही नहीं है।
- लो सेल्फ इस्टीम में इंसान खुद पर शक करता है। लेकिन डिप्रेशन में कुछ काम करने की इच्छा, ऊर्जा नहीं होती। नींद, भूख सब नेगेटिव ढंग से प्रभावित होती है।
- लो सेल्फ इस्टीम में इंसान अपने भीतर गलतियां ढूंढता है। लेकिन डिप्रेशन में वो एक प्रोलॉन्ग आत्मग्लानि से भर जाता है।
CBT आधारित 4 हफ्ते का सेल्फ हेल्प प्लान
CBT (कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी) यह मानती है कि हमारे विचार हमारी भावनाओं और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। परिणाम हमारे हाथ में नहीं होते, लेकिन प्रयास करना हमेशा हमारे हाथ में होता है। इसलिए हमें हर दिन अपने प्रयास का मूल्यांकन करना चाहिए। बाहरी परिणामों और लोगों की राय से खुद को नहीं आंकना चाहिए।
इसके लिए हमें अपने सोचने का तरीका बदलने की जरूरत है। यह ओवरनाइट नहीं होता। लेकिन रोज थोड़ी–थोड़ी कोशिश करके अपनी सोच को बदला जा सकता है और उसका असर हमारे बाहरी व्यवहार पर भी दिखाई पड़ता है।
तो चलिए चार हफ्तों के सेल्फ हेल्प प्लान पर बात करते हैं।
सप्ताह 1
अपनी सोच और विचारों को बदलना
- अपने नेगेटिव विचारों को पहचानें और उसे चुनौती दें
- एक कागज पर अपने नेगेटिव विचार लिखें। जैसेकि “मैं जिंदगी में फेलियर हूं।”
- अब खुद से पूछें: “क्या यह सोच 100% सच है?”
- अब इसके सामने अपना ऑल्टरनेटिव विचार जोड़ें। जैसेेकि–
- – “मैंने कोशिश की और यही मायने रखता है।”
- – मैं फेलियर नहीं हूं। मैं अपना काम पूरी ईमानदारी से करता हूं।
- – जरूरी नहीं कि सब एक जैसे ही हों। मैं अपनी तरह का हूं। मुझे बाकियों की तरह होने की जरूरत नहीं।
सप्ताह 2
डेली डायरी– ‘मेहनत की कीमत’
- रोज डायरी लिखना शुरू करें और उसका नाम रखें– ‘मेहनत की कीमत’
- हर दिन खुद से पूछें:
- क्या आज मैंने अपना बेस्ट दिया?
- क्या मैं आगे सीखने को तैयार हूं?
- उत्तर हां हो तो खुद को शाबाशी दें और अपनी तरफ से पूरी कोशिश करें। फिर चाहे रिजल्ट जो भी हो।
- इससे जुड़ी सेल्फ वर्थ, रिजल्ट पर आधारित नहीं होती, बल्कि इंटेंशन यानी इरादों और कोशिशों पर आधारित होती है।
सप्ताह 3
EE से मानसिक दूरी बनाएं
- जब घर वाले आपकी आलोचना करें या आप में कमियां निकालें तो उन बातों पर ध्यान देने और उन्हें सच मानने की बजाय खुद से सार्थक संवाद करें।
- खुद को याद दिलाएं–: “यह उनकी राय है, यह मेरी सच्चाई नहीं”
- विवाद से बचें, लेकिन एक सकारात्मक संवाद बनाए रखें।
सप्ताह 4
अपनी दिशा तय करना और स्किल डेवलप करना
- रोज अपने समय का 15 मिनट किसी नई को सीखने में खर्च करें।
- जैसे Excel टूल, भाषण देने की कला या टाइम मैनेजमेंट।
- अपनी रोज की मेहनत और प्रोग्रेस को ट्रैक करें।
- रोज रात में खुद से पूछें– “क्या आज मैंने अपनी मेहनत की?”
- आज मैंने कौन सी स्किल सीखी। आज मेरी किस स्किल में सुधार हुआ।

निष्कर्ष
EE एक अनजाना जहर है, लेकिन इसे पहचानकर सुधारा जा सकता है।CBT सिखाता है कि परिणाम से ज्यादा हमारी कोशिशों की गुणवत्ता मायने रखती है। आप खुद पर यकीन रखें और सबसे पहले अपनी सेल्फ इस्टीम को बेहतर करने का प्रयास करें। अपने बारे में अच्छा सोचें, दूसरों की राय से प्रभावित न हों और रोज खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करते रहें।
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सबसे पहले तो यह स्वीकार करिए कि आप जो महसूस कर रही हैं, आपने जो लक्षण बताए हैं, वो क्लासिक पोस्टपार्टम डिप्रेशन के संकेत हैं। यह एक मेडिकल कंडीशन है, जो अक्सर बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं को होती है। ऐसा जरूरी नहीं है कि यह पहले या दूसरे बच्चे के जन्म पर ही होगी। पूरी खबर पढ़िए…








