मेंटल हेल्थ– पूरा बचपन हॉस्टल में अकेले दिवाली मनाई:  आज भी त्योहार पर घर जाने का मन नहीं करता, बढ़ता डिप्रेशन, अकेलापन
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मेंटल हेल्थ– पूरा बचपन हॉस्टल में अकेले दिवाली मनाई: आज भी त्योहार पर घर जाने का मन नहीं करता, बढ़ता डिप्रेशन, अकेलापन

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8 घंटे पहले

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सवाल– बहुत पहले मैंने एक आर्टिकल में पढ़ा था फेस्टिव ब्लूज के बारे में। फेस्टिवल के समय कुछ लोग डिप्रेशन और एंग्जाइटी महसूस करते हैं। वो आर्टिकल पढ़कर मुझे लगा कि मेरे साथ भी तो कुछ ऐसा ही होता है। खासकर दिवाली और होली के टाइम पर मैं बहुत डिप्रेशन महसूस करता हूं। शायद इसका कारण फैमिली के साथ मेरे डिफिकल्ट रिश्ते हैं। मैं पांच साल का था, जब मेरी मां की डेथ हो गई। पापा ने दूसरी शादी कर ली और दूसरी मां ने कभी मुझे और मेरी बहन को अपने बच्चों की तरह एक्सेप्ट नहीं किया। रहते हम एक ही घर में थे, लेकिन मुझे मां का प्यार महसूस नहीं हुआ। पापा भी हम बच्चों से बिल्कुल डिटैच ही रहते थे। 12 साल की उम्र में मैं हॉस्टल पढ़ने चला गया। दिवाली के समय जब सारे बच्चे अपने घर जाते थे, मैं हॉस्टल में ही रहता था। अब मेरी उम्र 33 साल है और मैं दिल्ली में जॉब करता हूं। अभी भी जब फेस्टिवल का टाइम आता है और मैं अपने कुलीग्स को घर जाते या घर पर फैमिली के साथ फेस्टिवल मनाते देखता हूं तो मुझे बहुत डिप्रेशन महसूस होता है। दिवाली के दिन मैं घर पर अकेले ही रहता हूं और देर रात तक ड्रिंक करता रहता हूं। क्या आप मुझे कुछ सुझाव दे सकते हैं कि मैं अवसाद और उदासी की इस फीलिंग से कैसे बाहर निकलूं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

त्योहार हमारे समाज में खुशी, अपनेपन और सामूहिकता का प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन कई लोगों के लिए यह समय खुशी का न होकर उदासी, डिप्रेशन और अकेलेपन का होता है। जब पूरी दुनिया परिवार के साथ मिलकर खुशियां मना रही होती है, कुछ लोगों के लिए ये वो वक्त होता है, जब पुराना ट्रॉमा और पुराने दर्द फिर से उभर जाते हैं। मनोविज्ञान में इसे “फेस्टिव ब्लूज” कहा जाता है।

बच्चों के लिए फेस्टिवल का मतलब

बचपन में त्योहार का मतलब सिर्फ पटाखे, मिठाई या छुट्टियों तक सीमित नहीं रहता। यह वह समय होता है, जब बच्चा सबसे ज्यादा प्यार, अपनापन और सुरक्षा महसूस करता है।

बच्चे के दिमाग में फेस्टिवल के साथ ये सारी मेमोरीज जुड़ जाती हैं-

  • मम्मी प्यार कर रही हैं।
  • पापा के साथ मिलकर पटाखे फोड़ रहे हैं।
  • मां तरह-तरह के पकवान बना रही हैं।
  • घर में दोस्त-रिश्तेदार आ रहे हैं।
  • चारों तरफ रौनक और चहल-पहल है।
  • ब्रेन में यह मेमोरी सेव हो गई है कि फेस्टिवल मतलब खुशी और प्यार।

अब उस बच्चे की कल्पना करिए, जिसके मन में फेस्टिवल की ऐसी कोई मेमोरी नहीं है। वो त्योहार के दिन स्कूल के हॉस्टल में अकेला है। मेस का खाना खा रहा है। हॉस्टल के बाकी सारे बच्चे घर जा चुके हैं। एकाध टीचर, मेस वर्कर ही बचे हैं। उसके ब्रेन में फेस्टिवल की मेमोरी उदासी और अकेलेपन की है।

कोई भी बच्चा जब उपेक्षा और दूरी महसूस करता है, तो त्योहार उसके लिए खालीपन और असहायता का प्रतीक बन जाते हैं। जैसेकि

  • मां को जल्दी खो देना: जब बच्चा पांच साल की उम्र में मां को खो दे, तो त्योहारों पर सबसे बड़ी कमी मां की अनुपस्थिति के रूप में सामने आती है। दीपावली की पूजा हो या होली की तैयारी, सब अधूरा लगता है।
  • सौतेली मां से दूरी: अगर नई मां बच्चे को अपनेपन से न अपनाए, तो त्योहार के समय जब बाकी बच्चे सजाए-संवारे जाते हैं, उन्हें तोहफे और मिठाई मिलती है, वहीं उपेक्षित बच्चा भीतर से टूट जाता है।
  • पिता का इमोशनली डिटैच होना: जब पिता खुद भी भावनात्मक रूप से दूर हों, तो बच्चा पूरी तरह अकेला महसूस करता है। त्योहारों पर उसके लिए कोई सुरक्षित कोना नहीं होता।
  • हॉस्टल में अकेलापन: जब 12 साल की उम्र से ही बच्चा त्योहारों पर हॉस्टल में रह जाए, जबकि बाकी बच्चे घर जा रहे हों, तो उसके मन को एक गहरी चोट लगती है कि “मैं अलग हूं, मेरे पास कोई नहीं है।”

इन अनुभवों से त्योहार बच्चे के लिए “खुशियों” की नहीं बल्कि “खोई हुई चीजों की याद” बन जाते हैं।

एडल्ट लाइफ में फेस्टिव ब्लूज

अमूमन लोग बचपन के ट्रॉमा को एडल्ट जीवन में भी कैरी करते रहते हैं।

  • बच्चा जब बड़ा होता है, जॉब करता है और इंडीपेंडेंट होता है, तब भी त्योहार पर वही पुराना ट्रॉमा ट्रिगर होता है।
  • ऑफिस कुलीग्स परिवार के साथ त्योहार मनाते हैं, सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालते हैं। यह सब देखकर उसके भीतर का पुराना खालीपन और गहरा हो जाता है।
  • बचपन का पैटर्न फिर से एक्टिव हो जाता है: त्योहार = अकेलापन, उपेक्षा, तुलना।
  • नतीजा ये होता है कि त्योहार के दिन वह अकेले अपने कमरे में रहता है, देर रात तक शराब पीता है और डिप्रेशन महसूस करता है।
  • यह केवल एक दिन की बात नहीं है। धीरे-धीरे यह सोच मन में पक्की हो जाती है कि “त्योहार मेरे लिए नहीं हैं” और व्यक्ति जीवन के सुखद पलों को भी खो देता है।
  • गाइडलाइंस बताती हैं कि बचपन की नकारात्मक भावनात्मक यादें वयस्कता में डिप्रेशन और एंग्जाइटी का सबसे बड़ा ट्रिगर हो सकती हैं।

CBT की मदद से सेल्फ हेल्प

त्योहारों के मायने बदलें, नई यादें बनाएं

याद रखिए, हम अतीत की घटनाओं को नहीं बदल सकते, लेकिन उनसे जुड़ा अर्थ जरूर बदल सकते हैं। यही CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) की बुनियादी सोच है।

इस उदासी से बाहर निकलने और अपनी मदद करने के लिए आपको खुद कदम बढ़ाना होगा। अभी पुरानी यादें दिमाग को कंट्रोल कर रही हैं। इस नरेटिव को बदलने का तरीका ये है कि अपने लिए नई यादें बनाई जाएं, अपने जीवन की एजेंसी और कंट्रोल अपने हाथों में लिया जाए।

रीराइटिंग मेमोरी- यादों को फिर से लिखना

1. आइडेंटीफाई करना: आपको पता है कि त्योहार नजदीक आते ही फिर से उदासी घेर सकती है। फिर अकेलापन लग सकता है। यह बचपन की छाया है, आज की सच्चाई नहीं है।

2. प्लानिंग करना: पहले से अपनी गतिविधियां तय करें कि त्योहार के दिन आप क्या करेंगे। जैसे किसी दोस्त से मिलने जाएंगे, किसी NGO के लिए कुछ करेंगे, होमलेस बच्चों के साथ त्योहार मनाएंगे और अपने लिए एक छोटा सा गिफ्ट खरीदेंगे।

3. नई याद बनाना: हर साल त्योहार के लिए कोई एक नई पॉजिटिव याद गढ़ें। पुरानी नकारात्मक यादें धीरे-धीरे अपने आप धुंधली होती जाएंगी।

अतीत की जंजीरों से मुक्त होना

● रिएलिटी चेक: “क्या यह सच है कि हर त्योहार केवल दुख ही लाता है?”

→ अक्सर इसका जवाब होगा- “नहीं।”

● नया विश्वास: “त्योहारों का वक्त मेरे लिए कठिन रहा है, लेकिन अब मेरे पास उसे बदलने की ताकत है।”

● एजेंसी और कंट्रोल: मैं कमजोर, असहाय बच्चा नहीं हूं। मैं एडल्ट हूं, जो अपना जीवन खुद तय करता है। अब मैं खुद तय करूंगा कि त्योहार का मतलब मेरे लिए क्या है।

CBT आधारित 4 सप्ताह का फेस्टिव ब्लूज मैनेजमेंट प्रोग्राम

सप्ताह 1:

अवेयरनेस:

  • त्योहार और पुरानी यादों के लिंक को समझना।
  • मूड डायरी बनाना।
  • डायरी में लिखना– त्योहार आते ही कौन-से विचार आते हैं।
  • जैसे- “दूसरे खुश हैं, मैं अकेला हूं।”

सप्ताह 2:

सोच को बदलना

  • अपने नकारात्मक विचारों को चुनौती देना।
  • हर नकारात्मक विचार के लिए एक तर्क लिखना।
  • जैसे उदासी होती है, लेकिन अब एजेंसी मेरे हाथ में है।
  • मैं इस उदासी को खुशी में बदल सकता हूं।

सप्ताह 3:

त्योहार को नया अर्थ देना

  • त्योहार के दिन की 2–3 पॉजिटिव एक्टिविटी पहले से तय करना।
  • दोस्तों के घर जाना। दोस्तों को घर पर बुलाना। घर को डेकोरेट करना।

सप्ताह 4

रीइन्फोर्समेंट

  • खुद को रोज याद दिलाना, मैं अपने जीवन के लिए जिम्मेदार हूं।
  • मैं अपने लिए नई सुंदर यादें गढ़ रहा हूं।
  • त्योहार की नई यादों को डायरी में लिखना।
  • हर छोटी सफलता पर खुद को रिवॉर्ड देना।
  • दिवाली पर खुद को गिफ्ट देना।

शराब से उदासी को दबाने के खतरे

त्योहारों पर अकेलेपन और उदासी को अस्थायी रूप से दबाने के लिए कई लोग शराब का सहारा लेते हैं। पहली नजर में यह एक आसान समाधान लगता है, कुछ देर के लिए दर्द कम हो जाता है, नींद आ जाती है। लेकिन रिसर्च और क्लिनिकल अनुभव बताते हैं कि यह तरीका उल्टा नुकसान पहुंचाता है।

निष्कर्ष

आपको यह याद रखना जरूरी है कि अब आप उस बच्चे जैसे असहाय नहीं हैं। अब आप अपने त्योहारों को नए अर्थ और अनुभवों से भर सकते हैं। और याद रखें, शराब से दर्द दबाने की कोशिश केवल अस्थायी राहत देती है। सही रणनीतियां, जैसे CBT आधारित सोच, नई यादें बनाना और हेल्दी कोपिंग स्किल्स ही आपको स्थायी राहत और आत्मविश्वास दे सकते हैं।

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