मेघना पंत का कॉलम:  आज दुनिया भर में महिलाओं के अधिकार एक-दूसरे से जुड़ गए हैं
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मेघना पंत का कॉलम: आज दुनिया भर में महिलाओं के अधिकार एक-दूसरे से जुड़ गए हैं

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युद्ध विरले ही कभी अपनी सीमाओं के भीतर सिमटे रहते हैं। वे शक्ति, स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों को लेकर वैश्विक विमर्श को भी बदलते हैं। ईरान में जारी संघर्ष भी भारत की महिलाओं के लिए कोई दूर की खबर नहीं हो सकती- बल्कि यह एक आईना है, एक चेतावनी है और कई मायनों में सजग रहने का आह्वान भी। ईरान में महिलाएं दशकों से सार्वजनिक जीवन में पहनावे और व्यवहार से जुड़े सख्त नियमों के तहत जी रही हैं। वहां की सरकार महिलाओं के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य करती है और दैनिक जीवन में उन पर अनेक पाबंदियां लादती है। इन नियमों के खिलाफ आवाज उठाने वाली महिलाओं को अकसर सजा, गिरफ्तारी या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। राजनीतिक तनाव या युद्ध के समय तो सरकारें नियंत्रण और कड़ा कर देती हैं। ऐसे में महिलाओं की स्वतंत्रता तेजी से सिमट जाती है। हाल के वर्षों में ईरान में महिलाओं ने कठोर कानूनों के खिलाफ बड़ी संख्या में विरोध-प्रदर्शन किया। उनके आंदोलन को दुनिया भर में “वुमन, लाइफ, फ्रीडम’ के नाम से जाना गया। वैश्विक स्तर पर इस पर चर्चा हुई। महिलाएं सड़कों पर उतरीं, खुलकर अपनी बात रखी और विरोध में हिजाब उतार दिए। उनमें से कई ने असाधारण साहस दिखाया, जबकि उन्हें इस बात का पूरा अंदाजा था कि इसके क्या खतरे हो सकते हैं। कई महिलाओं को गिरफ्तार किया गया, कुछ को धमकियां मिलीं, कुछ को देश छोड़ना पड़ा और कुछ को केवल स्वतंत्रता की मांग करने के कारण अपनी जान तक गंवानी पड़ी। भारत की महिलाओं को ये घटनाएं चौंकाने वाली लग सकती हैं। हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, जहां महिलाओं को अनेक कानूनी अधिकार प्राप्त हैं। महिलाएं मतदान करती हैं, काम करती हैं, कारोबार चलाती हैं, राजनीति में आती हैं और सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी राय व्यक्त करती हैं। कई अन्य देशों की तुलना में भारतीय महिलाओं को अधिक स्वतंत्रता हासिल है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संघर्ष समाप्त हो गया है। भारत में आज भी दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, दहेज, भ्रूण-हत्या, असमान वेतन और महिलाओं की चॉइसेस पर सामाजिक दबाव जैसी समस्याएं मौजूद हैं। कई महिलाएं अब भी आर्थिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा और घर तथा कार्यस्थल दोनों जगह समान सम्मान के लिए संघर्ष कर रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि हम किन स्वतंत्रताओं को स्वाभाविक मानकर चल रहे हैं? अगर संस्थाएं कमजोर पड़ें तो ये अधिकार कितनी जल्दी कमजोर हो सकते हैं, जैसा कि 1979 के बाद ईरान में हुआ था? और सीमाओं के परे एकजुटता किस तरह लैंगिक समानता की लड़ाई को मजबूत कर सकती है? सच्चाई यह है कि आज दुनिया भर में महिलाओं के अधिकार एक-दूसरे से अधिक जुड़ते जा रहे हैं। सोशल मीडिया, माइग्रेशन और वैश्विक एक्टिविज्म के कारण तेहरान में उठने वाली आवाजें दिल्ली और मुम्बई तक गूंजती हैं। जब ईरानी महिलाएं विरोध में अपना हिजाब उतारने के लिए जान जोखिम में डालती हैं, तो वे केवल अपनी सरकार को ही चुनौती नहीं दे रही होतीं; वे स्वतंत्रता की वैश्विक कल्पना को भी विस्तृत कर रही होती हैं। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि महिलाओं के अधिकार कितने निष्कवच हो सकते हैं- यानी आज जो स्वतंत्रताएं मौजूद हैं, वे कल समाप्त भी हो सकती हैं- यदि समाज उनकी रक्षा करना बंद कर दे। भारतीय महिलाओं के लिए सबक यह है कि जागरूक बनें और अपने अधिकारों को कभी भी हल्के में ना लें। उन्हें मजबूत कानूनों, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक सहयोग के माध्यम से लगातार सुरक्षित रखना पड़ता है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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