- Hindi News
- Magazine
- We Do Not Have The Ability To Understand The Infinite Favors Of The River!
गुणवंत शाह3 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

मेरा लालन-पालन तापी नदी के किनारे हुआ है। मैं घर की खिड़की से तापी को निहारता था। उसी तापी में मछली की तरह तैरना हुआ, तट पर खेलना भी हुआ, ठीक वैसे ही जैसे मां की गोद में खेलता था। तापी पर जब लहरें आतीं तो हम सब बहुत ही खुश होते। तापी घर की दहलीज तक आ जाती। तब उसमें स्नान करने का आनंद ही कुछ और होता। मेरे भीतर अभी भी हूक उठती है- मैं तापी पुत्र हूं। इस बात का मुझे गर्व भी है। अगर कहें कि वह “अनुपमा’ है, तो गलत नहीं होगा। काका साहब कालेलकर ने उन्हें “लोकमाता’ कहा है। पानी की प्यास पवित्र है, इसीलिए गंगा पवित्र है। गंगा में डुबकी लगाने से पापों का नाश होता है, ऐसा कई लोग मानते हैं। हमारे देश में लाखों-करोड़ों लोग केवल श्रद्धा और अंधश्रद्धा के आधार पर ही जीवित हैं। वे गंगा को माता और हिमालय को शिवालय मानते हैं।
मेरा कोरिया जाना हुआ तो पता चला कि वहां ‘किम’ नाम इतना अधिक प्रचलित है कि एक कंकड़ उठाकर फेंको तो वह किसी न किसी ‘किम’ को ही लगेगा। वहां के हर तीसरे व्यक्ति का नाम किम है। यह नाम ‘किम’ इसलिए याद आया क्योंकि वडोदरा से कुछ ही दूर बहने वाली एक नदी का नाम “गाभणी’ है। इसके पास ही “सुखी’ नाम की नदी भी बहती है। कोसंबा से उमरपाड़ा जाते हुए “किम’ नदी आती है, जिसमें स्नान करने का आनंद ही कुछ और है।
दक्षिण भारत में कावेरी नदी के आगे सभी नतमस्तक हैं, पर गुजरात के बिलिमोरा के पास “छोटी कावेरी’ बहती है। नवसारी के पास “पूर्णा’ बहती है और बारडोली के पास “मिंढोला’। 1928 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जो सत्याग्रह आंदोलन चलाया था, उसकी छोटी सी छोटी जानकारी इसी “मिंढोला’ के पास है। दक्षिण पंथ के पूर्ण पुरातन वालोड गांव के पास वाल्मीकि (झांझरी) बहती है। उसी के थोड़ा-सा आगे बहेज के पास “पूर्णा’ और “वाल्मीकि’ का संगम होता है। इसी तरह एक नदी का नाम है “करा’। वडोदरा और दाहोद के बीच बहती है करड, गोमा और हडब।
मानव जीवन, प्राणी जीवन और वनस्पति जीवन को प्राण देने वाली प्रत्येक नदी को हम लोकमाता मानते हैं। मां चाहे कितनी भी नाटी हो, दुबली-पतली हो, इससे बच्चे को कोई फर्क नहीं पड़ता। मां जीवनदायिनी है, इसलिए वह महान है और यही कारण है कि वह पवित्र भी है। नदी का मूल्यांकन उसकी विपुल जलराशि से नहीं, बल्कि वह कितने हजार हेक्टेयर क्षेत्र को पानी की आपूर्ति करती है, कितने खेतों की प्यास बुझाती है, कितने खेतों को सिंचित करती है, कितने वाट बिजली पैदा करती है, यह महत्वपूर्ण है। सहारा के रेतीले मैदान के लिए “नाइलमाता’ जीवन का पर्याय बनी हुई है। नदी के अनंत उपकारों को समझने का माद्दा हममें से कितनों के पास है?
पर्वत का पितृत्व और नदी का मातृत्व एक-दूसरे से ओतप्रोत होते हैं, तब नदी बहना शुरू करती है। पंजाब का नाम ही पांच नदियों के मेल से बना है। इस पर कुछ और जानकारी है: शत से सतलुज हुआ। चंद्रभागा से चिनाब। विपासा से व्यास हुआ और इरावती से रावी।
किसकी बुझाएगी प्यास? नदी की बूंदों को बहते-बहते यह पता नहीं होता कि वे किसकी प्यास बुझाएंगी? जल पर उछलने वाले अक्षरों को कौन पढ़ सकता है भला? नदी का अर्थ समझने के लिए शब्दकोश काम नहीं आएंगे। उसके लिए इंसान का सयानापन ही काम आएगा। इसे सयानापनकोश भी कहा जा सकता है। स्वर्गलोक से पृथ्वी पर गंगा को लाने वाले भगीरथ को नदी का महत्व अच्छी तरह से समझ में आया ही होगा। कालदेवता की लीला नदी के किनारे फैली संस्कृतियों के कारण बहती रहती है।
गीता के अध्याय 2 में कृष्ण द्वारा रचित कविता में नदी का महत्व समझ में आता है। गीता में नदी के समर्पण को पूरी आध्यात्मिकता के साथ कहा गया है- जो व्यक्ति इच्छाओं और इंद्रियों के विषय के निरंतर प्रवाह से विचलित नहीं होता, वह शांति प्राप्त करता है। ऐसा ही समुद्र नदियों से भरा रहता है, लेकिन हमेशा शांत रहता है। वह व्यक्ति शांति प्राप्त नहीं करता, जो ऐसी निरंतर इच्छाओं को संतुष्ट करने का प्रयास करता है। गीता के इस श्लोक में गीता और जीवन का सार आ गया है।
समर्पण ही सच्ची प्रार्थना है और समर्पण यानी धर्म। इसकी सुरक्षा नहीं करनी पड़ती। इसे पाने के जुनून को ही हम भक्ति कह सकते हैं। मंदिर की चौकीदारी की जा सकती है, भगवान की नहीं। कवि जब थोड़ी देर के लिए विश्राम करता है, तब कविता प्रवाहित होती है।








