गौरव पाठक6 घंटे पहले
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गर्मियों की शुरुआत के साथ ही देशभर में स्विमिंग पूल खोले जा रहे हैं। स्विमिंग पूल मनोरंजन का साधन जरूर हैं, लेकिन इसके साथ गंभीर जोखिम भी जुड़े होते हैं, जिनका उचित प्रबंधन जरूरी है। हाल ही में अदालतों और उपभोक्ता आयोगों के फैसलों ने उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के तहत पूल संचालकों की जिम्मेदारी से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित किए हैं।
सावधानी बरतने का दायित्व
स्विमिंग पूल संचालकों पर सभी यूजर्स या इस्तेमालकर्ताओं के प्रति बुनियादी सावधानी बरतने का दायित्व होता है। केरल टूरिज्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम दीप्ति सिंह (2019) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि ‘ड्यूटी ऑफ केयर’ (सावधानी बरतने का दायित्व) इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि यदि पूल का उचित रूप से मेंटनेंस नहीं किया जाता है और उस पर निगरानी के लिए प्रशिक्षित कर्मियों को तैनात नहीं किया जाता है तो यह संभावित खतरों और जोखिमों का स्रोत बन सकता है। यह दायित्व सभी यूजर्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने तक विस्तारित है, भले ही वे तैराकी में निपुण हों या न हों। कृष्ण सेठ बनाम विशाल इंटरनेशनल होटल मामले में राष्ट्रीय आयोग ने पाया कि पूल पर अटेंडेंट की अनुपस्थिति यह दर्शाती है कि होटल के अंदर एक अतिथि को स्विमिंग पूल में अकेला छोड़ दिया गया और इस तरह यह लापरवाही का मामला बनता है। इसके आधार पर आयोग ने मुआवजा प्रदान किया, भले ही दुर्घटना पूल के बंद होने के बाद हुई थी।
प्रशिक्षित कर्मियों की तैनाती जरूरी
पूल पर सुरक्षा के लिए योग्य और सतर्क लाइफगार्ड की उपस्थिति बेहद जरूरी है। केरल टूरिज्म केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक लाइफगार्ड को बारटेंडर के कार्य में लगाना “सावधानी बरतने के दायित्व से स्पष्ट रूप से विचलन’ था। के. एम. इंदोरिया बनाम जिला क्रीड़ा परिषद (2010) मामले में राजस्थान राज्य आयोग ने जब यह पाया कि “लाइफगार्ड अपनी ड्यूटी निर्धारित मानकों के अनुसार निभाने में असफल रहा’, तो वादी को 4 लाख रु. का मुआवजा देने का आदेश दिया गया। इसी प्रकार, एस. अब्दुल अजीज बनाम म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ हैदराबाद (2004) मामले में राज्य आयोग ने कहा कि पूल संचालकों को “तैराकी सीखने वालों और कुशल तैराकों दोनों के लिए अनुभवी और सतर्क कोच तथा लाइफगार्ड उपलब्ध कराने चाहिए।’
डिस्क्लेमर का सहारा नहीं ले सकते
स्विमिंग पूल संचालक अपने दायित्व से बचने के लिए डिस्क्लेमर का सहारा नहीं ले सकते। अब्दुल अजीज केस में आयोग ने यह निर्णय दिया कि “यदि शुल्क लिया गया है और पहचान-पत्र जारी किए गए हैं, तो संचालक यह नहीं कह सकते कि तैराक अपने जोखिम पर तैराकी करें।’
शैक्षणिक संस्थान उपभोक्ता कानून में नहीं
राजेंद्र कुमार गुप्ता बनाम वीरेंद्र स्वरूप पब्लिक स्कूल (2021) मामले में राष्ट्रीय आयोग ने स्पष्ट किया कि जो शैक्षणिक संस्थान तैराकी को पाठ्येतर गतिविधियों का हिस्सा बनाते हैं, वे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत नहीं आते हैं। हालांकि, यह छूट व्यावसायिक रूप से संचालित स्विमिंग पूलों पर लागू नहीं होती।
दुर्घटना के बाद का रिस्पॉन्स
निरंजन नाथ शर्मा (2015) मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने उचित आपातकालीन प्रोटोकॉल की महत्ता को रेखांकित किया। आयोग ने पाया कि “हादसे के बाद अगर बचाव का किसी तरह का प्रयास नहीं किया गया और न कोई चिकित्सा सहायता दी गई, तो यह सेवा में कमी का मामला था।’
मुआवजे का निर्धारण
न्यायालय मुआवजा प्रदान करते समय कई कारकों पर विचार करते हैं। ममता अजमानी बनाम न्यू दिल्ली यंग मेन्स क्रिश्चियन एसोसिएशन (2010) मामले में राष्ट्रीय आयोग ने 5 लाख रुपए का मुआवजा दिया, जिसमें पीड़ित की उम्र, आय और परिवार द्वारा झेले गए मानसिक कष्ट को ध्यान में रखा गया। इसी तरह, अन्य मामलों में भी मुआवजा दिया गया है।
(लेखक सीएएससी के सचिव भी हैं।)








