रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  जगदीप: ऐसी खुद्दारी कि एक्टिंग से कर दिया था मना
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: जगदीप: ऐसी खुद्दारी कि एक्टिंग से कर दिया था मना

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रूमी जाफरी5 घंटे पहले

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‘शोले’ मूवी के अपने आइकॉनिक ‘सूरमा भोपाली’ के रोल में जगदीप। - Dainik Bhaskar

‘शोले’ मूवी के अपने आइकॉनिक ‘सूरमा भोपाली’ के रोल में जगदीप।

कल फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर कॉमेडियन जगदीप, जिन्हें मैं भाईजान कहकर बुलाता था, की सालगिरह थी। जगदीप भाईजान उन चंद लोगों में से हैं, जिनसे मेरी मुलाकात मुंबई आने के बाद शुरुआत के दिनों में ही हो गई थी। फिल्मों में तो भाईजान कॉमेडी करते थे, मगर निजी जिंदगी में बेहद संजीदा इंसान थे। मैं उनका जो किस्सा सुनाने जा रहा हूं, वो 1993 का है। मेरी फिल्म ‘पहला पहला प्यार’ बन रही थी, जिसमें ऋषि कपूर और तब्बू थे। उसमें एक अखबार के संपादक का रोल था, जिसमें असरानी जी को कास्ट किया हुआ था। नटराज स्टूडियो में रेस्टॉरेंट का सेट लगा था। चूंकि वहां पर संपादक का काम नहीं था, इसलिए असरानी जी की डेट नहीं ली गई थीं। हनी ईरानी जी, जिनकी स्टोरी थी, वो शूटिंग पर आईं और हम लोग बैठकर डिसकस करने लगे। रेस्टॉरेंट का सीन डिसकस करते हुए हनी जी बोली कि रेस्टॉरेंट का सीन वैसे तो बहुत फनी है, मगर अगर इसमें अखबार का संपादक भी शामिल हो जाए तो कॉमेडी और बढ़ जाएगी, कैसा लगेगा? मैंने कहा, अच्छा लगेगा। मैंने डायरेक्टर मनमोहन सिंह को भी बताया तो उन्होंने भी कहा कि अच्छा रहेगा। सबने यही कहा कि संपादक को सीन में लाना चाहिए। प्रोड्यूसर बी. एस. शाद जी ने असरानी जी से संपर्क किया और दो दिन निकालने का अनुरोध किया। असरानी जी बोले कि मैं अगर मुंबई में होता तो कुछ भी करके शूटिंग में आ जाता, लेकिन मैं तो आउटडोर जा रहा हूं। सब लोग परेशान हो गए। डिसकस करने लगे कि अब असरानी जी की जगह पर किसे लिया जाएं, जो एक्टर भी अच्छा हो और उसकी डेट्स भी मिल जाएं, क्योंकि शूटिंग दो दिन बाद ही थी। फिर अचानक से जगदीप भाईजान का खयाल आया। उनका नाम सुनकर सब लोग एक्साइटेड हो गए। शाद साहब ने भी कहा कि मैं जगदीप जी से बात कर लेता हूं। वो जगदीप भाईजान के पास गए। उन्होंने उन्हें बहुत प्यार से बिठाया। मनमोहन सिंह, ऋषि कपूर सबका नाम सुनकर काफी खुश हुए। उसके बाद शाद साहब बोले कि बात बस इतनी-सी है कि शूटिंग आपको कल करनी पड़ेगी। इस पर जगदीप भाईजान बोले, कल? इसका मतलब है कि या तो मैं आपकी पहली पसंद नहीं हूं या ये रोल इतना अहम नहीं है, वरना शूटिंग के एक दिन पहले एक्टर को कास्ट नहीं किया जाता है। शाद साहब ने अब असलियत बता दी। बोले, आपकी बात सही है। हमने पहले असरानी साहब को कास्ट किया था। इत्तेफाक से वो बाहर हैं और हमारी शूटिंग कल है। तो हमने सोचा कि कौन-सा ऐसा एक्टर है जो अच्छा है और इस वक्त फ्री भी है। इस पर जगदीप भाईजान ने जवाब दिया, मुझसे अच्छे एक्टर दिलीप कुमार हैं और वो भी फ्री हैं। जाइए, उनको ले लीजिए। इस तरह जगदीप भाईजान ने मना कर दिया। तो ये तेवर और खुद्दारी थी जगदीप भाईजान की। इसी बात पर मुझे राहत इंदौर का एक शेर याद आ रहा है:

बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए

हमने खैरात भी मांगी है तो खुद्दारी से

दूसरा किस्सा भी उसी दौर का है। मैं होटल होरिजॉन में किसी काम से गया तो वहां शूटिंग चल रही थी। मैंने पूछा तो पता लगा कि वहां जगदीप भाईजान भी हैं। उस समय उनका शॉट नहीं था और वो ऊपर रूम में थे। मैं मिलने के लिए उनके रूम में चला गया। बात ही बात में उन्होंने कहा कि आज मैं तुमको बताता हूं कि मैंने शराब पीनी कैसे छोड़ी। उन्होंने बताया, मैं शूटिंग करने दिल्ली गया था। पैक-अप के बाद होटल में आया, फ्रेश हुआ, टीवी ऑन किया, बोतल निकाली, ग्लास रखा। टीवी पर कोई सिंगर गालिब की गजल गा रहा था। गजल सुनते-सुनते मैं रुक गया और सोचने लगा कि गालिब भी शराब के शौकीन थे और मैं भी हूं, गालिब साहब दिल्ली में दफन हैं और मैं भी दिल्ली में हूं, तो क्यों न गालिब साहब की मजार पर जाकर पी जाए। उसके बाद मैंने बोतल ली और टैक्सी पकड़कर सीधे गालिब साहब की मजार पर पहुंच गया। उस समय कोई बहुत ज्यादा भीड़ नहीं हुआ करती थी। वहां जाकर मैंने मजार को सलाम किया, फातिहा पढ़ी और फिर बोतल निकाल ली। जैसे ही बोतल निकाली, मुझे ऐसा लगा जैसे गैब (अदृश्य शक्ति) से आवाज आई। मुझे ऐसा लगा जैसे गालिब साहब मेरे कानों में अपनी ही मशहूर गजल के दो शेर सुना रहे हो: ये मसाईल-ए-तसव्वुफ ये तेरा बयान गालिब

तुझे हम वली समझते जो न बादा ख्वार होता हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूं न गर्क-ए-दरिया, न कभी जनाजा उठता न कहीं मजार होता

और मेरे हाथ रुक गए, ये सोचकर कि गालिब साहब को शराब पीने का खुद अफसोस था। उन्होंने इन दोनों शेरों के जरिए कहा कि गालिब, अगर तू शराब नहीं पीता तो लोग तुझे वली मतलब अवतार समझ लेते। मर कर तेरी लाश नदी में बह जाती तो अच्छा होता और कहीं भी तेरी मजार नहीं होती। जब तक मजार है तो लोग यही कहेंगे कि ये उस गालिब की मजार है, जो शराब पीता था। मुझे लगा जैसे गालिब साहब खुद मुझसे ये बोल रहे हों। बस फिर मैंने तुरंत बोतल नाली में फेंक दी। उसके बाद जो मैंने शराब छोड़ी तो आज तक नहीं पी। जगदीप भाईजान की याद में आज उन्हीं की फिल्म ‘भाभी’ का ये गीत सुनिए, अपना खयाल रखिए, खुश रहिए।

चली चली रे पतंग मेरी चली रे…



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