रसरंग में चिंतन:  संवेदनहीनता के जूतों तले मरने को विवश इंसानियत
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रसरंग में चिंतन: संवेदनहीनता के जूतों तले मरने को विवश इंसानियत

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गुणवंत शाह2 घंटे पहले

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जब हम छोटे थे, तब पंडित नेहरू के यादगार शब्द कानों में पड़े थे। वे आज भी याद हैं। भगवान बुद्ध की 2500 वीं जयंती पूरे देश में मनाई जा रही थी। नेहरू जी ने किसी सार्वजनिक सभा में भारत और विश्व के लोगों को बड़ी सहजता से एक बड़ा संदेश दे दिया था: ‘अब हमें बुद्ध और युद्ध में से किसी एक को चुनना होगा।’

इसी समय डॉ. भीमराव आंबेडकर ‘बुद्ध एंड हीज धम्म’ नामक एक ग्रंथ लिख रहे थे। उन्होंने पंडितजी को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि यदि सरकार इस ऐतिहासिक वर्ष में देश-विदेश के मेहमानों को इस ग्रंथ की प्रतियां उपहारस्वरूप दें तो खर्च का बोझ हल्का हो जाएगा। डॉ. आंबेडकर की यह विनती उचित ही थी, लेकिन इसके बाद भी सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। इससे डॉ. आंबेडकर कुछ नाराज भी हुए थे।

आज हमारी प्यारी पृथ्वी युद्ध के कारण बेचैन है। युद्ध की सबसे भयावह विशेषता यह है कि इसमें इंसान ही नहीं मरता है, संवेदनशीलता भी मर जाती है। रोज सैकड़ों लोग मरते हैं, पर भय की कमी चारों ओर दिखाई देती है।

किसी ने एक बार कहा था, “जब कोई व्यक्ति बिस्तर पर मरता है, तो परिवार रोता है, लेकिन युद्ध में हजारों लोग मरते हैं, तो वे केवल आंकड़े होते हैं।’ दूसरे विश्वयुद्ध में लाखों लोग मारे गए। यह विशाल संख्या आज इतिहास में जमी हुई एक निर्जीव संख्या मात्र है।

युद्ध में अनाथ बच्चों का दर्द : युद्ध के कारण कितने बच्चे अनाथ हुए? कितनों के माता-पिता मारे गए। इसके बाद वे बच्चे किस तरह से बड़े हुए? उन असहाय मासूमों के दर्द को किसने महसूस किया? उन्हें कौन समझाएं कि कौन-था हिटलर! तैमूर लंग ने करीब चार-पांच लाख लोगों का कत्ल किया था। उन परिवारों पर क्या बीती होगी? कई लोगों से चर्चा के बाद पता चला कि मुसलमानों में शायद ही कोई अपने बेटे का नाम औरंगजेब रखता है। आंध्र प्रदेश के एक नेता ने अपने बेटे का नाम स्टालिन रखा। स्टालिन ने स्वयं चर्चिल से कहा था- बोल्शेविक क्रांति के दौरान एक करोड़ लोगों को मारना पड़ा। ऐसे व्यक्ति का नाम अपने बेटे को कैसे दिया जा सकता है? भारत के कतिपय साम्यवादी नेताओं के घर पर स्टालिन की तस्वीर आज भी लटकती मिलती है।

यही तो समस्या है। संवेदनशीलता मर जाती है और मनुष्य दो पैरों वाला जानवर बनकर रह जाता है। अनाथ बच्चों की दयनीय स्थिति राजकपूर की फिल्म ‘बूटपालिश’ में दिखाई गई है। जब बच्चे अपने करुण स्वर में गाते हैं तो आंखें भर जाती हैं। गाने की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं… “तुम्हारे हैं तुमसे दया मांगते हैं / तेरे लाड़लों की दुआ मांगते हैं / यतीमों की दुनिया में हरदम अंधेरा / इधर भूल कर भी न आया सवेरा / इसी शाम को एक पल भर जले जो, हम आशा का ऐसा दिया मांगते हैं…।’

इन पंक्तियों में जो पीड़ा है, वह हमारी पीड़ा बन जाती है।

एक महायुद्ध लाखों मासूमों को अनाथ कर जाता है। जब भी ये गीत गुनगुनाता हूं, अपने आंसुओं को नहीं रोक पाता हूं। फिल्म उद्योग ने हमें न जाने कितने गीत दिए हैं, पर यह गीत हमेशा मेरी आंखें भिगो जाता है। आखिर अनाथ होना क्या है? अनाथ होने का मतलब है- असहाय होना, बिना छत के होना, अपनेपन से वंचित होना, अकेले ही रोना और अकेले ही हंसना, ऐसे युद्ध को गांधी के सिवाय और कौन ललकार सकता था?

महान कवि शेक्सपियर ने एक महापुरुष के बारे में जो काव्यांजलि दी थी, वह हमें गांधी के संदर्भ में भी याद आती है… ‘उसका जीवन इतना उत्कृष्ट था और उसमें कुछ ऐसे तत्वों का समावेश हुआ था कि प्रकृति स्वयं उपस्थित होकर दुनिया से कह सकती थी- यह था मनुष्य! हे! महात्मा, धन्य जीवन-धन्य मृत्यु!’

मौन का संगीत बासु भट्‌टाचार्य ने एक बार अपने दोस्त को बताया था कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को संगीत की समझ यदुराय नामक व्यक्ति से मिली थी। लेकिन यदुराय को अपने ज्ञान से संतोष नहीं था। एक सच्चे कलाकार की पूंजी यही दिव्य असंतोष होता है। यदुराज को लगा कि हिमालय की शांति और प्रकृति की गोद में जाकर संगीत को आत्मसात करना चाहिए। उनकी इसी सोच ने उन्हें पूरे छह माह तक हिमालय की गोद में बिताने में सहायता की। इसके बाद उन्हें समझ में आया कि मौन में एक अनोखा संगीत समाया हुआ है। मुंह से एक शब्द का भी उच्चारण न किया जाए तो चित्त की गहराई में शांति का आभास होता है। इस समय प्रकृति से जो स्वर फूटते हैं, वही होता है मौन का संगीत।



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