पर्णश्री देवी6 घंटे पहले
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अरुणाचल प्रदेश की तवांग घाटी में भारत का एक अत्यंत मनमोहक लेकिन जरा कम चर्चित आध्यात्मिक स्थल स्थित है। इसका नाम है तवांग मठ। बादलों में लिपटा और तिब्बती बौद्ध परंपराओं में आच्छादित यह मठ केवल एक पूजा स्थल ही नहीं है, बल्कि शांति, संस्कृति और हिमालय के रहस्यों से भरा एक आकर्षक पर्यटन स्थल भी है। भारत के इस सबसे बड़े बौद्ध मठ में लगभग 500 भिक्षु रहते हैं। इसकी आध्यात्मिक आभा के कारण यह दुनिया भर से पर्यटकों को आकर्षित करता है। तवांग मठ की यात्रा आत्मा को छू लेने वाली और अविस्मरणीय होती है।
10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित तवांग मठ को स्थानीय स्तर पर ‘गलदेन नामग्याल ल्हात्से’ कहा जाता है। इसकी स्थापना 5वें दलाई लामा के निर्देशन में वर्ष 1680 में मेरक लामा लोड्रे ग्यात्सो द्वारा की गई थी। यह करीब 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह भारत का सबसे बड़ा और ल्हासा के पोताला पैलेस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मठ है। महायान बौद्ध धर्म की गेलुग्पा परंपरा से जुड़ा यह मठ पिछली तीन सदियों से तिब्बती अध्ययन और ध्यान का केंद्र रहा है। यहां आज भी सैकड़ों भिक्षु शिक्षा और साधना के लिए आते हैं।
25 फीट ऊंची बुद्ध की प्रतिमा तवांग शहर के सबसे ऊपरी हिस्से में एक किले जैसे बसे इस मठ परिसर में 65 से अधिक भवन बने हुए हैं जिनमें आवासीय कक्ष, पुस्तकालय और मंदिर शामिल हैं। इसका प्रवेश द्वार प्रार्थना चक्कियों और नक्काशीदार गेट से होकर एक ऐसे संसार में ले जाता है, जो समय में ठहरा हुआ लगता है। मठ के केंद्र में ‘दुखांग’ या मुख्य प्रार्थना हॉल बना है। यह एक विशाल कक्ष है, जिसमें अगरबत्तियों की सुगंध और भिक्षुओं के मंत्रों की गूंज समाई होती है। इसका प्रमुख आकर्षण 25 फीट ऊंची स्वर्णिम बुद्ध प्रतिमा है। दीवारों पर जातक कथाओं और तिब्बती ब्रह्मांड विज्ञान के दृश्य चित्रित हैं।
प्रात:कालीन प्रार्थना सत्र यह मठ मोनपा समुदाय के लिए धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र भी है। प्रातःकालीन प्रार्थना सत्रों में शामिल होना सबसे अस्मरणीय अनुभव होता है। प्रार्थना हॉल की आभा, तिब्बती वाद्ययंत्रों की ध्वनियां और बौद्ध मंत्रोच्चारण एक गहन आध्यात्मिक वातावरण रचते हैं। मठ का पुस्तकालय भी देखने लायक है, जहां हस्तलिखित बौद्ध ग्रंथों, प्राचीन पांडुलिपियों और पूजन ग्रंथों का बेशकीमती संग्रह है।
तवांग के त्योहार यहां कई खास तरह के त्योहार भी मनाए जाते हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध त्योहार ‘तोरग्या उत्सव’ है, जो हर साल जनवरी माह में होता है। तीन दिनों तक भिक्षु रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर ‘चाम नृत्य’ करते हैं, जो बुराइयों को दूर करने और समृद्धि लाने के लिए किया जाता है। इस समय मठ का प्रांगण एक जीवंत रंगमंच बन जाता है जिसमें लहराते परिधान, तालबद्ध ढोल और प्राचीन प्रतीक गूंजते हैं। एक अन्य देखने लायक उत्सव ‘लोसार है। यह तिब्बती नववर्ष होता है। ये त्योहार दर्शाते हैं कि मठ केवल एक पूजा स्थल भर नहीं है, बल्कि परंपरा, कला और सामुदायिक आत्मा को जीवित रखने वाले केंद्र भी हैं।
एक हिमालयी रोमांच तवांग पहुंचना भारत के सबसे मनोहारी दृश्यों से होकर गुजरने के समान है। निकटतम हवाई अड्डा तेजपुर या गुवाहाटी (असम) में हैं। वहां से 13-15 घंटे की सड़क यात्रा आपको देवदार के जंगलों, गर्जना करती नदियों और कोहरे में डूबे दर्रों से होते हुए ले जाती है। यह मार्ग प्रसिद्ध सेला दर्रे (13,700 फीट) से होकर गुजरता है, जो अक्सर बर्फ से ढका रहता है। यह यात्रा धैर्य की परीक्षा भी है। मार्ग में बोमडिला और डिरांग जैसे ठिकाने भी आते हैं, जहां कुछ छोटे मठ, गरम पानी के झरने और सेब के बागान मिलते हैं।
सफर करते समय ये याद रखें – मार्च से जून तक का समय सबसे अच्छा होता है। इस समय मौसम साफ रहता है। सितंबर से नवंबर के बीच काफी ज्यादा हरियाली रहती है। • – भारतीय नागरिकों को इनर लाइन परमिट (ILP) और विदेशी पर्यटकों को प्रोटेक्टेड एरिया परमिट (PAP) की आवश्यकता होती है। – स्थानीय परंपराओं का सम्मान करें। मर्यादित वस्त्र पहनें, धार्मिक स्थलों पर शोर न करें और भिक्षुओं या अनुष्ठानों की फोटो लेने से पहले अनुमति जरूर लें।








