मृदुला द्विवेदी35 मिनट पहले
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ओरछा मध्य प्रदेश का एक ऐतिहासिक और मनोहारी नगर है, जो बेतवा नदी के किनारे बसा हुआ है। इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की अस्थाई सूची में शामिल किया गया है और उम्मीद है कि वर्ष 2027-28 तक इसे पूर्ण दर्जा मिल जाएगा। यहां 16वीं सदी के कई अद्भुत स्मारक और इमारतें देखने को मिलती हैं। इस नगर की स्थापना 1501 ईस्वी में बुंदेला नरेश रुद्र प्रताप सिंह ने की थी और यह बुंदेलखंड की राजधानी रहा। अपनी स्थापत्य कला, धार्मिक महत्व और प्राकृतिक सुंदरता के कारण ओरछा पर्यटकों के लिए बेहद आकर्षक स्थल बन गया है। यहां आने वाला हर यात्री इतिहास और संस्कृति का जीवंत अनुभव कर सकता है।
ओरछा फोर्ट ओरछा का भव्य किला तीन प्रमुख भवनों से मिलकर बना है- राजा महल, जहांगीर महल और शीश महल। इस किले का आरम्भिक निर्माण संस्थापक रुद्र प्रताप सिंह ने किया था और बाद के शासक यहां कुछ न कुछ निर्माण कार्य करवाते रहे। राजा महल का निर्माण राजपूत शैली में हुआ, जबकि जहांगीर महल में मुगल और राजपूत वास्तुकला का अद्भुत संगम दिखाई देता है। इन महलों की ऊंची मंजिलों से पूरे नगर का विहंगम दृश्य नजर आता है। शीश महल आज मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा संचालित एक होटल में बदल दिया गया है।
लाइट एंड साउंड शो ओरछा किले में शाम के समय लाइट एंड साउंड शो आयोजित किया जाता है, जो यहां का विशेष आकर्षण है। इस कार्यक्रम के लिए प्रवेश शुल्क निर्धारित है। शो हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओ में प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि दोनों भाषाओ के लिए समय अलग-अलग रखा जाता है। इस प्रस्तुति में प्रकाश और ध्वनि के माध्यम से ओरछा का गौरवशाली इतिहास जीवंत हो उठता है और दर्शक ऐसा अनुभव करते हैं, मानो वे उस युग का स्वयं एक हिस्सा हों।
राजा राम मंदिर ओरछा के राजा राम मंदिर से कई रोचक कथाएं जुड़ी हुई हैं। यह मंदिर वास्तव में एक राजमहल था, जिसे बाद में भगवान राम को समर्पित कर दिया गया। मान्यता है कि भगवान राम की मूर्ति पहले यहां अस्थाई रूप से रखी गई थी, परंतु बाद में वह मूर्ति हटाई नहीं जा सकी। इसके परिणामस्वरूप उस महल को ही मंदिर का स्वरूप दे दिया गया। यहां भगवान राम की पूजा ‘राजा’ के रूप में की जाती है, जो इसे भारत के अन्य राम मंदिरों से विशिष्ट बनाती है। प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु यहां आकर भगवान राम को न केवल ईश्वर, बल्कि राजा के रूप में प्रणाम करते हैं।
चतुर्भुज मंदिर अपनी ऊंची मीनारों और बहुमंजिली संरचना के कारण यह स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। इसका निर्माण 16वीं सदी में बुंदेला राजाओं द्वारा किया गया था। मूल रूप से यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था, किंतु वर्तमान में यहां भगवान कृष्ण की आराधना होती है। कहा जाता है कि इसके निर्माण में उस युग की श्रेष्ठ कला और शिल्प का प्रयोग हुआ था। आज भी यह मंदिर अपनी भव्यता और शांत वातावरण के कारण श्रद्धालुओं और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करता है। बेतवा रिवर साइड कुछ समय बेतवा नदी के िकनारे भी बिताया जा सकता है। विशेष रूप से सूर्यास्त के समय यहां बैठना बेहद सुखद अनुभव देता है। डूबते सूरज की रोशनी में नदी के जल पर शाही छतरियों का प्रतिबिम्ब मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है। सतधारा नामक स्थान पर बेतवा सात धाराओं में बंट जाती है जो इसे और भी आकर्षक बना देती है। पक्षी प्रेमियों के लिए यहां बर्ड वॉचिंग का भी अवसर मिलता है।
अगले माह से शुरू होगा सीजन कैसे पहुंचें?: ओरछा पहुंचने के लिए झांसी सबसे नजदीकी बड़ा शहर है, जो भारतीय रेलवे नेटवर्क से देश के प्रमुख नगरों से सीधा जुड़ा हुआ है। झांसी से ओरछा की दूरी मात्र 16 किलोमीटर है, जिसे टैक्सी या लोकल परिवहन से आसानी से तय किया जा सकता है। निकटतम हवाई अड्डा ग्वालियर है, जो यहां से लगभग 120 किलोमीटर दूर स्थित है।
कब जाएं? : ओरछा घूमने का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से फरवरी तक का माना जाता है। इस अवधि में मौसम सुहावना और यात्रा के लिए आदर्श होता है। सितम्बर को ‘शोल्डर सीजन’ कहा जा सकता है, क्योंकि इस समय मौसम भी संतुलित रहता है और खर्च भी अपेक्षाकृत कम होता है।
कहां ठहरें? : यहां हर बजट के अनुरूप ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। यदि कोई लग्जरी सुविधा चाहता है तो यहां हेरिटेज होटल और नदी किनारे बने शानदार रिसॉर्ट्स मिलते हैं। वहीं कम बजट वाले यात्रियों के लिए कई गेस्ट हाउस और साधारण लॉज भी आसानी से उपलब्ध हैं।








