देवदत्त पट्टनायक22 मिनट पहले
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कर्नाटक के हम्पी स्थित पूर्ववर्ती विजयनगर साम्राज्य के अवशेष आज भी उसकी भव्यता की गवाही देते हैं।
आज के लेख के लिए कुछ रोचक करते हैं और वह है भारत के इतिहास को केवल एक सप्ताह में संक्षिप्त करके देखना। हड़प्पा की सभ्यता से लेकर आधुनिक काल तक भारत का इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना है। इसलिए इस एक सप्ताह का प्रत्येक दिन लगभग 700 वर्षों की अवधि का होगा। आइए देखते हैं प्रत्येक दिन कौन-सी घटनाएं घटीं।
रविवार के दिन भारत के उत्तर पश्चिमी भाग में कृषि की शुरुआत हुई। सिंधु घाटी, गुजरात के समुद्रतट तथा राजस्थान और हरियाणा में हड़प्पा की सभ्यता का उद्गम भी इसी दिन हुआ। कांस्य युग की इस सभ्यता के शहर विश्व की अन्य सभ्यताओं के साथ व्यापार के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने तरह-तरह की वस्तुओं का मध्य पूर्वी एशिया तक निर्यात किया, जैसे तिल, मुर्गियां, मनके और कपास। व्यापार को नियंत्रित करने के लिए मुहरों का प्रयोग किया गया। इन मुहरों पर यूनिकॉर्न और अन्य प्रतिमाएं बनी होती थीं। रविवार को भारत अश्वों से अपरिचित था, क्योंकि अश्व केवल सोमवार को कैस्पियन सागर के निकट पालतू बनाए गए। सोमवार को हड़प्पा के शहरों का धीरे-धीरे पतन हुआ। इसके साथ ही विश्वभर में कांस्य युग का व्यापार नेटवर्क भी कमजोर होने लगा। हालांकि अश्व इसी दिन पालतू बनाए गए, इसलिए रथों पर सवार योद्धा विश्वभर में, फिर वह मिस्र, यूनान, मध्य पूर्वी एशिया, चीन हो या भारत, मंगलवार को नजर आने लगे।
मंगलवार के दिन यूरेशिया के स्टेपी क्षेत्र से अश्वों पर सवार पुरुष पंजाब में प्रवेश कर गए। इससे कुछ पीढ़ियों पहले वे मध्य एशिया की ऑक्सस सभ्यता में रह चुके थे। पंजाब में स्थानीय महिलाओं से विवाह कर वे यहीं बस गए। उनके वंशजों ने संस्कृत भाषा का निर्माण किया, जिसके माध्यम से यूरेशिया, ऑक्सस, सिंधु नदी के मैदानों और हड़प्पा की यादें अभिव्यक्त की गईं। इनकी संतानों ने समय के साथ पंजाब से गंगा तक प्रवास किया। वहां की उपजाऊ मिट्टी और लोहे की उपलब्धता ने उनके खानाबदोश पशुपालक जीवन को कृषि आधारित स्थायी जीवन में बदल दिया। इसी दिन दक्षिण भारत के पशुपालक समुदाय, जो उत्तर भारत के आर्यों से अलग थे, अपने मृतकों को हांडियों में दफन कर रहे थे और उनके सम्मान में विशाल डोलमेन पत्थर तथा राख के ढेर खड़े कर रहे थे।
बुधवार तक वैदिक संस्कृति गंगा के मैदानों में पनपने लगी थी। व्यापारी गजों और कपास का निर्यात फारस तक कर रहे थे। व्यापार के लिए कार्षापण नामक मुद्रा का प्रयोग शुरू हो चुका था। इसी दिन सिद्धार्थ गौतम नामक राजकुमार ने संपत्ति और विलासिता को निरर्थक मानकर बुद्ध का रूप धारण किया। पुनर्जन्म और मुक्ति की धारणाएं भी इसी दिन लोकप्रिय हुईं। सिकंदर ने फारस के साम्राज्य को पराजित किया। उसके पराक्रमों से पाटलिपुत्र के राजाओं को प्रेरणा मिली। बौद्ध और जैन साधु तथा ब्राह्मण पुजारी नर्मदा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियों की घाटियों में बसकर वहां की संस्कृति में योगदान देने लगे। गुरुवार के दिन महाराष्ट्र के सातवाहन राजाओं का वर्चस्व था। उनकी मदद से जैन और बौद्ध व्यापारी मुंबई के पास सोपारा के बंदरगाह से होते हुए आंध्र प्रदेश से रोम तक कपास का निर्यात करते थे। उत्तर भारत के महामार्ग यूनानी, शक, कुषाण और हुण जैसे विदेशियों के नियंत्रण में थे। उन्होंने बौद्ध विहारों और संस्कृत भाषा को भी बढ़ावा दिया। इसी दिन दक्षिण भारत में तमिल और प्राकृत भाषाओं में प्रेमियों और योद्धाओं की विशाल गाथाएं रची जा रही थीं। वैष्णववाद और शैववाद का भी उद्गम इसी दिन हुआ।
शुक्रवार के दिन दक्षिण भारत में चालुक्य, राष्ट्रकूट, चेर, चोल और होयसल तथा पूर्व भारत में पाल और सेन जैसे राज्य पनपे। कन्नड़, मराठी, तेलुगु, ओड़िया और बंगाली भाषाएं भी इसी दिन विकसित हुईं। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और माधवाचार्य इस अवधि में रहे। शुक्रवार तक ब्राह्मण संस्कृति ने वर्चस्व पा लिया था। इसके अलावा भारत में जाति व्यवस्था भी प्रचलित हो चुकी थी। शनिवार दिल्ली और बहामनी सल्तनतों तथा राजपूत और गजपति राजाओं का दिन था। इस दिन विजयनगर, मुगल, मराठा और अंग्रेजी साम्राज्य पनपे और इसी दिन उनका पतन भी हुआ। इसी दिन भक्ति आंदोलन अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा। आजादी की लड़ाई भी इसी दिन लड़ी गई। यह औद्योगीकरण और लोकतंत्र का काल था।








