रसरंग में मायथोलॉजी:  गणेशजी का मूषक हाथ में रखा मोदक क्यों नहीं खाता है?
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रसरंग में मायथोलॉजी: गणेशजी का मूषक हाथ में रखा मोदक क्यों नहीं खाता है?

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देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले

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कर्नाटक के बदामी में छठवीं सदी में निर्मित गुफाओं में स्थित गणेशजी की प्रतिमा। इसे प्राचीनतम प्रतिमाओं में से एक माना जाता है। - Dainik Bhaskar

कर्नाटक के बदामी में छठवीं सदी में निर्मित गुफाओं में स्थित गणेशजी की प्रतिमा। इसे प्राचीनतम प्रतिमाओं में से एक माना जाता है।

गणेशजी की एक उपाधि लम्बोदर है। उनका उदर समृद्धि और प्रचुरता का प्रतीक है। उनका गजमुख हमें शक्ति की भावना प्रदान करता है। उनका वाहन मूषक है, जो बाधाओं को पार करके गोदामों तक पहुंचने और अनाज जमा करने के लिए प्रसिद्ध है। मूषक को पकड़ना कठिन होता है। रोचक बात यह है कि गणेशजी के उदर के चारों ओर नाग लिपटा हुआ है। सामान्यतः नाग मूषकों का शिकार करते हैं। इसके बावजूद गणेशजी निश्चिंत दिखाई देते हैं। उनके हाथ में सिक्कों की थैली जैसे आकार का मोदक है, किंतु गणेशजी का मूषक उस मोदक में कोई रुचि नहीं दिखाता।

यहां गजमुख और उदर, शक्ति तथा प्रचुरता का प्रतीक हैं। दूसरी ओर, नाग मूषक को और मूषक मोदक को नहीं खा रहा है, जो संतुष्टि का संकेत है। ऐसा प्रतीत होता है कि गणेशजी अपने एक हाथ से श्रद्धालुओं को सिक्कों की थैली जैसा मोदक प्रदान कर रहे हैं और दूसरा हाथ ऊपर की ओर अभय मुद्रा में है। इस प्रकार, गणेशजी न केवल समृद्ध, शक्तिशाली और संतुष्ट हैं, बल्कि अपने श्रद्धालुओं को सुरक्षा और पोषण भी प्रदान करते हैं। उनमें एक आदर्श यजमान के सभी गुण मौजूद हैं।

शिवजी और उनके परिवार की प्रतिमाओं में भी यही विचार दोहराया जाता है। शिवजी, उनकी पत्नी पार्वती और उनके दोनों पुत्र गणेश तथा कार्तिकेय, कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं। चारों के अपने-अपने वाहन हैं: शिवजी का नंदी बैल, पार्वती का बाघ, गणेशजी का मूषक और कार्तिकेय का मोर। शिवजी के गले में भी नाग लिपटा हुआ है।

कैलाश पर्वत पथरीला और बर्फीला स्थान है, जहां घास तक नहीं उगती। तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि नंदी बैल क्या खाता है? और नंदी बैल पार्वती के बाघ को देखकर भयभीत क्यों नहीं होता? कार्तिकेय का मोर शिवजी के नाग पर आक्रमण क्यों नहीं करता? और नाग गणेशजी के मूषक का शिकार क्यों नहीं करता? इस प्रतिमा में भी सभी संतुष्ट दिखाई देते हैं। गणेशजी का उदर हमें याद दिलाता है कि यहां समृद्धि विद्यमान है। कार्तिकेय का भाला शक्ति का प्रतीक है। भस्म से लिप्त शिवजी के शरीर से स्पष्ट होता है कि उनके पास कोई भौतिक संपत्ति नहीं है, बावजूद इसके कि उनकी पत्नी पार्वती पर्वतराज की कन्या हैं।

दोनों ही प्रतिमाओं से एक सरल विचार संप्रेषित होता है: हिंसा भय उत्पन्न करती है और हिंसा का मूल कारण भूख होती है। भूख मिटाने के लिए हिंसा अनिवार्य प्रतीत होती है। किंतु शिवजी की उपस्थिति में कोई भूखा नहीं रहता। इसलिए बाघ नंदी बैल का शिकार नहीं करता और नंदी बैल को घास की आवश्यकता नहीं पड़ती। मोर नाग का शिकार नहीं करता और नाग मूषक को नहीं खाता। मूषक भी गणेशजी के हाथ में रखा मोदक नहीं खाता। फलस्वरूप, कार्तिकेय को अपने भाले का प्रयोग न तो गणेशजी के मोदक, न उनके मूषक और न ही शिवजी के नाग की रक्षा के लिए करना पड़ता है।

यह प्रतिमा धार्मिक प्रतीक अवश्य है, लेकिन वास्तव में यह हमें भूख, अन्न और हिंसा पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। जीवन में भूख महत्वाकांक्षा का रूप ले लेती है और अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हम हिंसक, लड़ाकू और प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं।

संस्कृति में हिंसा प्रकृति की हिंसा से अलग होती है, क्योंकि मनुष्यों में केवल शारीरिक भूख नहीं होती, बल्कि मानसिक और सामाजिक भूख भी होती है। अन्य जीवों की तरह हम जीवित रहने के लिए भोजन चाहते हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त हमारी मानसिक भूख भी है। हम चाहते हैं कि लोग हम पर ध्यान दें, हमारा आदर करें और हमारी प्रशंसा करें। इस मानसिक भूख को मिटाने के लिए हममें सामाजिक भूख जन्म लेती है। हम धनवान, शक्तिशाली और ज्ञानी बनना चाहते हैं।

अन्य जीवों की भूख के विपरीत मनुष्यों की भूख कल्पनाशक्ति से संचालित होती है और इसलिए वह कभी समाप्त नहीं होती। यही कारण है कि धनवान, शक्तिशाली और ज्ञानी व्यक्ति अपनी सफलताओं से कभी संतुष्ट नहीं होते। समाज में भी यह धारणा दोहराई जाती है कि केवल आलसी लोग संतुष्ट होते हैं। और इसी कारण विश्व में हिंसा और प्रतिद्वंद्विता बनी रहती है।



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