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भारत में धान से जुड़ा सबसे प्राचीन आख्यान ओडिशा में रहने वाली बोंडा जनजाति में पाया जाता है। यह जनजाति 4,000 वर्षों से भी पहले दक्षिण-पूर्वी एशिया से भारत में आए मुंडा तथा ऑस्ट्रो-एशियाई समुदायों से जुड़ी है। धान को उगाने का ज्ञान उनके साथ ही भारत आया। बोंडा जनजाति की एक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में धान न केवल उड़ सकता था, बल्कि वह मनुष्यों को खाता भी था। फिर एक दिन धान और मनुष्यों के बीच हुई प्रतिस्पर्धा में धान हार गया। मनुष्यों को धान की सभी किस्मों के नाम याद थे, पर धान सभी मनुष्यों के नाम याद नहीं रख सका। तब से धान मनुष्यों का खाद्य बन गया। बोंडा जनजाति के महानायक भीमाय ने धान के पंख काट दिए, जिससे वह उड़ न सका और मनुष्यों के लिए उपलब्ध हो गया। संभवतः यह धान का कृषि से संबंधित सबसे प्राचीन आख्यान है। एक अन्य बोंडा आख्यान उस समय की बात करता है, जब चावल के दाने धरती पर सड़ रहे थे। इसे रोकने के लिए बोंडा जनजाति के महाप्रभु ने अपनी धोती का एक हिस्सा फाड़कर दानों को उसमें बांध दिया और वह पोटली एक मोर के सिर पर रख दी। उसी दिन से मोर मुकुट पहनने लगा। वैदिक साहित्य में धान से जुड़े आख्यान नहीं मिलते। पर बौद्ध धर्म के सृष्टि-संबंधी आख्यान के अनुसार, सबसे पवित्र लोक में धान भी एक निवासी था। फिर धान में इच्छा उत्पन्न हुई, जिसके कारण वह भूमि से बंध गया, उस पर छिलका उग आया और उसे पचाना कठिन हो गया। यही कारण है कि धान की खेती से लेकर उससे चावल के दाने प्राप्त करने तक इतना परिश्रम करना पड़ता है। गौतम बुद्ध को चावल इतने प्रिय थे कि उन्होंने अपने भिक्षुओं के वस्त्रों पर चौकोर टुकड़े सिलवाने के लिए कहा, ताकि लोगों को धान के सिंचित और सुव्यवस्थित खेतों के महत्व की याद दिलाई जा सके। दक्षिण-पूर्वी एशिया में धान से जुड़े अनेक आख्यान मिलते हैं। इंडोनेशिया के बाली प्रांत से एक कथा आरंभ करते हैं। उसके अनुसार, देवताओं के राजा बतार गुरु ने सभी देवताओं को अपने लिए महल बनाने का आदेश दिया। अपने फण पर धरती को उठाए हुए अनंतशेष के न हाथ थे, न पैर। इसलिए वे महल-निर्माण में सहभागी नहीं हो सके। उन्होंने बतार गुरु को मणियों से जड़ा एक अंडा भेंट किया। उस अंडे से श्री नामक अत्यंत सुंदर देवी प्रकट हुईं। उन्हें देखते ही सभी देवता उनसे प्रेम करने लगे। देवताओं के बीच झगड़ा न हो, इस आशंका से देवी का वध कर दिया गया और उनके शरीर के टुकड़ों को धरती के नीचे गाड़ दिया गया। कुछ समय बाद प्रत्येक टुकड़े से धान, सुपारी और बांस जैसी नकदी फसलों के पौधे उग आए। थाईलैंड के एक आख्यान के अनुसार, धान की देवी किसानों की पत्नियों द्वारा शापित हुईं, क्योंकि किसान अपना अधिकांश समय धान के खेतों में बिताते थे। इससे देवी आहत हो गईं और अपनी सबसे प्रिय सहेली मीठे पानी की मछली के साथ वन में चली गईं। अंततः वे तभी लौटीं, जब गांववालों ने उनसे क्षमा मांगी और उनकी पूजा करने के लिए तैयार हुए। मीठे पानी की मछली और धान का संबंध कई आख्यानों में दोहराया गया है। अब मणिपुर की एक कथा देखें। वहां के मैतेई लोग मानते हैं कि पाउओयबी नामक धान की देवी के अनेक प्रेमी थे। अन्य आख्यानों की भांति यह देवी भी एक समय चली जाती हैं और उनके सभी प्रेमी निराश हो जाते हैं। एक दिन जब पाउओयबी देवी वन में विचरण कर रही थीं, तब वे एक नदी के तट पर पहुंचीं। उन्हें तैरना नहीं आता था, इसलिए उन्होंने नदी के पार खड़े हिरन से पूछा कि नदी की गहराई कितनी है। हिरन ने उनसे झूठ कहा कि नदी उथली है। इस पर देवी नदी में उतर गईं, पर कुछ ही दूर जाकर डूबने लगीं। तभी एक मछली ने उन्हें सुरक्षित रूप से नदी के पार पहुंचा दिया। प्रसन्न होकर देवी ने उसे वरदान दिया कि उस दिन से मछलियां आईने की तरह चमकेंगी और उनकी प्रशंसा में गीत गाए जाएंगे। साथ ही देवी ने हिरन को शाप दिया कि यदि वह धान खाने का प्रयास करेगा, तो उसके दांत गिर जाएंगे। तभी से हिरन धान के डंठल नहीं खाते।
अंत में, दक्षिण-पूर्वी एशिया में स्थित लाओ देश की एक कथा के बारे में जानते हैं। कई दिनों से भूखे एक किसान ने एक सुनहरी मछली को जाल में फंसा लिया। उसे बचाने के लिए मछलियों के राजा ने मनुष्यों को धान प्रदान किया। कुछ समय बाद एक राजा ने धान की देवी को एक कक्ष में बंद कर दिया और लोग फिर से भूखे रहने लगे। जब एक संन्यासी धान की देवी से मिला, तो उसने देवी को कई भागों में काट दिया। इस प्रकार धान की अनेक किस्में उत्पन्न हुईं। इतनी किस्में हो गईं कि राजा सभी को बंद न कर सका और धान पुनः मनुष्यों को प्राप्त हो गया।
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