देवदत्त पट्टनायक7 घंटे पहले
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पिछले महीने नेपाल के युवाओं के विद्रोह की खबर भारत और विश्वभर में चर्चा का विषय बनी। लेकिन भारतवासियों के दैनिक जीवन में नेपाल का जिक्र सामान्यतः कम ही होता है, सिवाय माउंट एवरेस्ट या फिर गोरखा समुदाय की वीरता को छोड़कर। आइए, अगले दो लेखों में हम नेपाल के इतिहास, खासकर धार्मिक इतिहास पर एक विस्तृत दृष्टि डालते हैं। 18वीं सदी में जब नेपाल की कई छोटी-छोटी जागीरों और राज्यों को मिलाकर एक विशाल राज्य की नींव रखी जा रही थी, तब नेपाल के राजा ने अपने राज्य को ‘असल हिंदुस्तान’ घोषित कर दिया था। उनका मानना था कि भारत उस समय मुगलों के धर्म के अधीन था। तभी से नेपाल को विश्व का एकमात्र हिंदू राज्य माना जाने लगा। 2008 में राजतंत्र की समाप्ति के बाद नेपाल धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बन गया। इसके बावजूद, आज भी उसके झंडे पर लाल पृष्ठभूमि के साथ सूर्य और चंद्र के प्रतीक बने हैं, जो उन हिंदू राजवंशों की याद दिलाते हैं जिन्होंने कभी इस भूभाग की अनेक छोटी जागीरों पर शासन किया था। प्राचीन काल में इस क्षेत्र की जनजातियां ‘किरात’ कहलाती थीं। समय के साथ काठमांडू घाटी में किसानों की और पश्चिम के पहाड़ी इलाकों में पशुपालकों की आबादी बढ़ती गई। नेपाल के प्रारंभिक शासक ग्वाला समुदाय से थे, इसलिए राजाओं की वंशावली में ‘गोपाल-राजा’ का उल्लेख मिलता है। आगे चलकर काठमांडू घाटी में नेवार समुदाय और पहाड़ों में गोरखा समुदाय का प्रभुत्व स्थापित हुआ। इस पूरे क्षेत्र पर उत्तर के तिब्बती-बर्मी और दक्षिण के गंगा के मैदानों की आर्य परंपराओं, दोनों का गहरा प्रभाव रहा।

नेपाल के आरंभिक इतिहास में बौद्ध धर्म प्रमुख था, लेकिन धीरे-धीरे वहां हिंदू धर्म का वर्चस्व बढ़ता गया। दोनों धर्मों पर तांत्रिक विचारधारा का गहरा असर रहा है। यही कारण है कि यहां लोग ग्राम देवियों को प्रसन्न करने के लिए बलि की परंपरा निभाते आए हैं। यहां बौद्ध धर्म में वज्रयोगिनी और हिंदू धर्म में स्वस्थानी माता जैसी देवियां विशेष रूप से पूजनीय रही हैं। नेपाल में जीवित देवियों की परंपरा सबसे लोकप्रिय रही है। नेवारी समुदाय की ये कुमारियां स्थानीय राजाओं को आशीर्वाद देकर उनके शासन को वैध ठहराती थीं। 2008 में नेपाल के गणतंत्र बनने के बावजूद यह ‘कुमारी परंपरा’ अब भी जीवित है।
‘नेपाल’ नाम ‘नेमि’ से जुड़ा हुआ माना जाता है। बौद्ध और हिंदू आख्यानों में वर्णित है कि नेमि मिथिला (उत्तर बिहार) के राजा थे। यही क्षेत्र राजा जनक और गौतम बुद्ध से भी जुड़ा है। मान्यता यह भी है कि बौद्ध धर्म नेपाल में स्वयं गौतम बुद्ध के समय से बहुत पहले आया था। बौद्ध धर्म के स्वयंभू पुराण के अनुसार, ‘आदि बुद्ध’ नेपाल में अग्नि-स्तंभ से प्रकट हुए थे, ठीक वैसे ही जैसे हिंदू मान्यताओं के अनुसार शिव बारह ज्योतिर्लिंगों के रूप में अग्नि-स्तंभ से प्रकट हुए थे। आदि बुद्ध के बाद सात बुद्ध आए, जिनमें शाक्यमुनि बुद्ध अंतिम और ऐतिहासिक बुद्ध थे। उनका जन्म आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व नेपाल के लुम्बिनी में वज्जि और मल्ल महाजनपदों के काल में हुआ था। आख्यानों के अनुसार, गौतम बुद्ध अपने शिष्यों को नेपाल में उस स्थान पर लेकर गए थे, जहां अपने किसी पूर्वजन्म में उन्होंने अपना शरीर एक बाघ को प्रस्तुत कर दिया था ताकि वह बाघ भूखा न रहे। बौद्ध मठों के वृत्तांत बताते हैं कि नेपाल यात्रा के दौरान बुद्ध के शिष्य आनंद को शीतदंश (फ्रॉस्टबाइट) हो गया था। तभी से बौद्ध साधुओं को ठंडी जगहों पर पादुका पहनने की अनुमति दी गई। लुम्बिनी में आज भी सम्राट अशोक द्वारा स्थापित 2300 वर्ष पुराना अशोक-स्तंभ मौजूद है। एक आख्यान के अनुसार अशोक की पुत्री ने नेपाल के राजकुमार से विवाह किया था। एक अन्य कथा कहती है कि बोधिसत्त्व मंजुश्री ने अपनी अग्निमय तलवार से एक विशाल झील को सुखाकर जो भूमि बनाई, वहीं आगे चलकर काठमांडू नगर बसा। 5वीं सदी ईस्वी तक लिच्छवि राजवंश के उदय के साथ नेपाल में महायान बौद्ध धर्म का बोलबाला हो गया और अवलोकितेश्वर सहित अनेक बोधिसत्त्वों की व्यापक उपासना होने लगी। बौद्ध मठवासी संघ (भिक्षु संघ और भिक्षुणी संघ) सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। मंदिरों में मिले शिलालेखों से पता चलता है कि बौद्ध पुण्यस्थलों के लिए दी गई दान-भूमि का उपयोग यज्ञों में भी किया जाता था। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि नेपाल में बौद्ध और हिंदू परंपराएं बहुत पहले से एक-दूसरे के साथ घुल-मिलकर विकसित हुई हैं। अगले लेख में हम यह जानेंगे कि समय के साथ नेपाल में बौद्ध धर्म का प्रभाव क्यों और कैसे घटा और हिंदू धर्म वहां अधिक प्रचलित कैसे हुआ।








