रसरंग में मायथोलॉजी:  ‘स्थल-पुराणों’ से श्रद्धालुओं को मिला सांसारिक जीवन जीने का साहस
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रसरंग में मायथोलॉजी: ‘स्थल-पुराणों’ से श्रद्धालुओं को मिला सांसारिक जीवन जीने का साहस

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देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले

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तिरुपति स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर। - Dainik Bhaskar

तिरुपति स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर।

आज का लेख एक कहानी से शुरू करते हैं। एक बार विष्णु और लक्ष्मीजी के बीच झगड़ा हो गया। लक्ष्मी क्रोधित होकर घर छोड़कर चली गईं और विष्णु उन्हें ढूंढने निकले। खोजते-खोजते उन्हें एक इमली के पेड़ के नीचे दीमक का टीला दिखाई दिया और उन्होंने उसमें वास ले लिया। फिर एक ग्वाला आया और उन्हें दूध चढ़ाया। तब से विष्णु ने उस दीमक के टीले को ही अपना घर बना लिया और अपने श्रद्धालुओं को यह आश्वासन देने लगे कि वे उन्हें सांसारिक जीवन की पीड़ाओं में डूबने नहीं देंगे। यह कहानी कहां से आई है?

यदि आप आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के लोगों से पूछें, तो वे कहेंगे कि यह वेंकटचलम के तिरुपति बालाजी की कहानी है, जबकि महाराष्ट्र और कर्नाटक के लोग इसे पंढरपुर के विठ्ठल की कथा बताएंगे। 15वीं सदी के विजयनगर साम्राज्य में ये दोनों देवता अत्यंत महत्वपूर्ण थे। तिरुपति बालाजी राज्य की दक्षिणी सीमा के निकट और विठ्ठल उत्तरी सीमा के निकट पूजे जाते थे। दोनों को विष्णु, विशेषकर कृष्ण का रूप माना जाता है। दोनों के हाथों में कोई हथियार नहीं होते और दोनों अपने हाथ कूल्हों पर रखते हैं, जिससे उनके श्रद्धालुओं को सांसारिक जीवन जीने का साहस मिलता है।

आइए पहले तिरुपति बालाजी की कथा जानते हैं। कहा जाता है कि लक्ष्मी ने भृगु ऋषि को विष्णु के सीने पर लात मारते हुए देखा। विष्णु ऋषि पर क्रोधित होने के बजाय इस भय से कि उन्होंने ऋषि को कुपित कर दिया, उलटे उनसे क्षमा मांग ली। यह देखकर लक्ष्मी क्रोधित हो गईं और वैकुंठ छोड़कर पृथ्वी पर चली आईं। तब विष्णु उन्हें मनाने उनके पीछे आए।

लक्ष्मी को खोजते-खोजते वे वेंकटचलम पहुंचे। वहां के सात पहाड़ों को देखकर उन्हें शेषनाग के सात फनों की याद आई और वे वहीं रहने लगे। दीमक के टीले ने उन्हें कौशल्या और देवकी की तथा इमली के पेड़ ने दशरथ और वासुदेव की याद दिलाई। विष्णु के इस रूप को तिरुपति बालाजी या वेंकटेश कहा जाता है। धन के देवता कुबेर से मिले ऋण से तिरुपति बालाजी ने वहां की राजकुमारी पद्मावती से विवाह किया। पद्मावती लक्ष्मी का ही दूसरा रूप मानी जाती हैं। तिरुपति बालाजी के श्रद्धालु उन्हें भोजन अर्पित करते हैं और कुबेर का ऋण चुकाने में सहायता करते हैं।

अब आइए विठ्ठल की कथा की ओर चलते हैं। एक बार द्वारका में रुक्मिणी ने कृष्ण और राधा को चोरी-छिपे मिलते हुए देख लिया। क्रोधित होकर उन्होंने द्वारका छोड़ दी और कृष्ण विठ्ठल रूप में उनके पीछे आए। रुक्मिणी पंढरपुर के पास एक इमली के वन में रहने लगीं। यहां रुक्मिणी को प्रायः पदूबाई नामक क्रोधित देवी के रूप में पूजा जाता है, जो अपने खुले केशों को फैलाए हुए, मुंह को धरती में छिपाकर बैठी रहती हैं। वेंकटचलम में तिरुपति बालाजी की पत्नी पद्मावती को ही पंढरपुर में पदूबाई कहा जाता है, अर्थात पदूबाई भी लक्ष्मी का ही रूप हैं।

स्थल-पुराणों की इन कथाओं के माध्यम से देशज देवताओं को विस्तृत हिंदू धर्म के शिव और विष्णु जैसे पौराणिक देवताओं से जोड़ा गया। आर. सी. ढेरे जैसे विद्वानों ने कई स्थल-पुराण संकलित किए हैं और उनमें अनेक समानताएं पाई हैं। इन स्थल-पुराणों से यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण संस्कृति, बौद्ध धर्म और जैन धर्म भारतभर में किस प्रकार फैले। इन तीनों का लगभग 2,500 वर्ष पूर्व गंगा के मैदानों में उद्गम हुआ और ये कथाएं लगभग 1,000 वर्ष पहले प्रचलित हुईं।

ओडिशा के जगन्नाथ के उदाहरण को देखते हैं। उनका पहला उल्लेख 14वीं सदी में सरलादास द्वारा लिखित ओड़िया महाभारत में मिलता है। वहां उन्हें कृष्ण के रूप में देखा गया। फिर थोड़े ही समय में, ओड़िया रामायण में उन्हें राम के साथ जोड़ा गया। वहां का स्थल-पुराण स्पष्ट करता है कि जगन्नाथ एक जनजातीय देवता थे। वहां के राजा इंद्रद्युम्न के मंत्री विद्यापति इस देवता तक पहुंचे, जिनका नाम था नील माधव। उनकी पूजा जनजातीय रीति-रिवाजों से होती थी।

लेकिन फिर जगन्नाथ का यह आदिम रूप, नील माधव, अदृश्य हो गया। आज उसकी जगह लकड़ी के डिब्बे में एक गुप्त तत्व ने ले ली है। संभवतः ये कृष्ण के अवशेष हैं। बौद्ध धर्मीय भी बुद्ध के अवशेष कुछ यूं ही सुरक्षित रखते थे। विठ्ठल और वेंकटेश की तरह जगन्नाथ भी अपनी पत्नी के साथ लड़ते हैं। हर वर्ष रथ-यात्रा से लौटने पर लक्ष्मी उन्हें मंदिर में प्रवेश करने नहीं देतीं। आखिरकार वे लक्ष्मी को पीछे छोड़ अपनी बहन सुभद्रा के साथ रथ यात्रा पर चले जाते हैं। फिर उन्हें लक्ष्मी को रसगुल्ले जैसी मिठाइयां देकर मनाना पड़ता है।

देवियों को मनाने की इन कथाओं में केवल स्थानीय जनजातियों और पशुपालक समाजों को ही नहीं, बल्कि सामान्य श्रद्धालुओं को भी देवताओं के प्रेम और सुरक्षा का आश्वासन दिया गया। समय के साथ ये स्थानीय देशज देवता व्यापक और सर्वव्यापी ‘मार्गी’ आख्यान परंपराओं में समाहित हो गए। वे भी अब कर्म, धर्म, आत्मा, माया, संसार और मोक्ष जैसी गूढ़ धारणाओं के प्रतीक बन गए। इसी प्रक्रिया के माध्यम से हिंदू धर्म जनसाधारण तक पहुंचा।इस परिवर्तन के साथ मंदिरों की परंपरा जन्मी, जो आज हिंदू धर्म की प्रमुख पहचान बन चुकी है। यह नया स्वरूप पुराने वैदिक हिंदू धर्म से अलग है, जो रहस्यमय मंत्रोच्चारणों और यज्ञों पर आधारित था। उस समय बौद्ध और जैन धर्म पहले ही लोगों को सांसारिक पीड़ा से मुक्ति का स्पष्ट मार्ग दिखा रहे थे। वैदिक परंपरा के अनुयायी समझ गए थे कि यदि उनका धर्म भी अपने स्वरूप में बदलाव नहीं लाया, तो उसकी प्रासंगिकता अन्य धर्मों की तुलना में घट सकती थी।

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