रूमी जाफरी5 घंटे पहले
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‘सीआईडी’ के गीत ‘कहीं पे निगाहें…’ के एक दृश्य में वहीदा रहमान।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की लीजेंडरी हीरोइन वहीदा रेहमान जी के बारे में कौन नहीं जानता। मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला है। उनसे मेरी खूब गपशप भी होती रही है। तो आज इस कॉलम में बात उनसे जुड़े कुछ किस्सों की।
वहीदा जी का जन्म चेंगलपट्टू में हुआ था, जो तब के मद्रास (आज के चेन्नई) के पास स्थित एक छोटा-सा शहर है। उस वक्त तो वह गांव ही हुआ करता होगा। उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। चार बहनें थीं और सभी पढ़ाई में अच्छी थीं। लेकिन वहीदा जी को भरतनाट्यम का बहुत शौक था। उनके अब्बा-अम्मी ने कभी उन्हें हतोत्साहित नहीं किया, बल्कि हमेशा उनका हौसला ही बढ़ाया। महज 12 साल की उम्र में वहीदा जी मंच पर भरतनाट्यम परफॉर्म करने लगी थीं।
समय बीतता गया। उनकी तीनों बहनों की शादी हो गई और इस बीच उनके अब्बा का इंतकाल हो गया। एक बार उनका एक कार्यक्रम देखकर एक फिल्म निर्माता उनके घर पहुंचे और उनकी अम्मी से कहा, “मैं वहीदा को अपनी फिल्म में लेना चाहता हूं। इसमें एक रोल है, जिसमें भरतनाट्यम करना है।’ लेकिन उनकी अम्मी ने यह कहकर मना कर दिया कि “जब तक इसके अब्बा जिंदा थे, तब तक बात अलग थी। अब मैं अकेली हूं। मैं इसे कहां-कहां शूटिंग पर लेकर जाऊंगी?’ फिल्म निर्माता ने कहा, “मैं इनके अब्बा साहब का दोस्त हूं। वह हमेशा चाहते थे कि वहीदा खूब तरक्की करें, भरतनाट्यम करें और एक अच्छी कलाकार बनें। इनकी पूरी जिम्मेदारी मेरी होगी।’ यह बात वहीदा जी ने भी सुन ली। उन्होंने भी बहुत जिद की और आखिरकार उनकी अम्मी मान गईं।
फिल्म रिलीज हुई और वहीदा जी पर फिल्माया गया गीत सुपरहिट हो गया। वहीदा जी बताती हैं कि वही गीत गुरु दत्त जी ने देखा और मैं उन्हें पसंद आ गई। उस समय वे ‘सीआईडी’ बना रहे थे। उन्होंने मुझसे संपर्क किया और मैं अपनी अम्मी के साथ बंबई आ गई। उन्होंने हमें रोल सुनाया। अम्मी ने कहा कि हम आपको अच्छी तरह जानते नहीं हैं और मुझे हिंदी फिल्मों की ज्यादा जानकारी भी नहीं है। इस पर गुरु दत्त जी ने कहा, “ठीक है। मेरी पिछली फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ अभी थिएटर में लगी है। आप दो टिकट लीजिए और पहले जाकर फिल्म देख आइए।’ मैं अपनी अम्मी के साथ फिल्म देखने गई। फिल्म मुझे बहुत पसंद आई। हमने आपस में चर्चा की और फिल्म के लिए हां कर दी। हालांकि रोल एक वैम्प का था, यानी विलेन की रखैल का। मुझे और मेरी अम्मी को यह चिंता थी कि पता नहीं मुझे किस तरह के कपड़े पहनाए जाएंगे। इसलिए मैंने एक शर्त रख दी कि मैं वही कपड़े पहनूंगी, जो मुझे पसंद होंगे। मैं पहली ऐसी अभिनेत्री हूं, जिसने अपने एग्रीमेंट में यह लिखवाया कि जिन कपड़ों को पहनने से मैं मना कर दूं, उनके लिए मुझे मजबूर नहीं किया जाएगा। कपड़ों का अंतिम फैसला मेरा होगा। गुरु दत्त जी ने यह शर्त भी मान ली और मैंने फिल्म कर ली।
सोचिए, कितना आत्मसम्मान और कितनी खुद्दारी थी वहीदा जी में। इसी बात पर वसीम बरेलवी का यह शेर याद आता है :
उसूलों पर जहां आंच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है
खैर, सीआईडी रिलीज होने के बाद बहुत से लोगों ने मुझसे कहा, “तुमने पहली ही फिल्म में वैम्प का रोल क्यों किया? तुम्हें तो हीरोइन के रूप में फिल्मों में आना चाहिए था।’ लेकिन भरतनाट्यम सीखने का मुझे एक बड़ा फायदा मिला था। भरतनाट्यम में नृत्य के साथ-साथ भाव-भंगिमाओं पर बहुत जोर दिया जाता है। पूरे नवरस चेहरे के जरिए बयान किए जाते हैं। इसलिए मेरे चेहरे के भावों और मेरे एक्सप्रेशन की सभी समीक्षाओं में बहुत तारीफ हुई। कई समीक्षाओं में तो यह भी लिखा गया कि वहीदा रहमान हीरोइन बनने का पूरा माद्दा रखती हैं। उन्हें हीरोइन के रूप में ही फिल्मों में आना चाहिए था। लेकिन अगर मैं सीआईडी नहीं करती और गुरु दत्त जी मेरी अभिनय क्षमता से प्रभावित नहीं होते तो शायद वे मुझे ‘प्यासा’ में मौका नहीं देते। उसके बाद उन्होंने ‘चौदहवीं का चांद’ में भी मुझे नायिका का किरदार दिया था। आज सिर्फ दर्शक ही नहीं, बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री वहीदा जी की प्रशंसक है। लगभग हर निर्देशक और निर्माता उनके साथ काम करना चाहता था और आज भी करना चाहता है। लेकिन वहीदा जी फिल्मों के मामले में हमेशा बहुत सिलेक्टिव रही हैं। उन्होंने कम फिल्में कीं, लेकिन जो भी कीं, यादगार कीं।
मैं खुद को उन खुशनसीब लेखकों में मानता हूं, जिन्हें वहीदा जी के साथ काम करने का मौका मिला। मेरी फिल्म ‘ओम जय जगदीश’ में उन्होंने अनिल कपूर, फरदीन खान और अभिषेक बच्चन की मां की भूमिका निभाई थी। उनसे मेरी मुलाकातें होती रहती हैं। कभी किसी अवॉर्ड समारोह में, जहां हम साथ में ज्यूरी रहे, कभी किसी फिल्म के ट्रायल में और खासकर सलीम साहब के घर पर, क्योंकि वहीदा जी उनकी पड़ोसन हैं। उनके साथ बैठकर बातें करना, पुराने किस्से सुनना मुझे हमेशा अच्छा लगता है। मैं उनसे बातचीत करने का अवसर कभी नहीं गंवाता।
आज वहीदा जी के सम्मान में उनकी पहली फिल्म ‘सीआईडी’ का वह मशहूर गीत सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए:
कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना…









