राजदीप सरदेसाई का कॉलम:  राजनीति को अभी भी एक स्ट्रीट-फाइटर की जरूरत है
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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: राजनीति को अभी भी एक स्ट्रीट-फाइटर की जरूरत है

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8 मिनट पहले

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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar

राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार

फरवरी 2015 में मेरी एक दोस्त ने आप को वोट दिया था। इससे पहले वे कांग्रेस की कट्टर समर्थक थीं। पहली बार 2014 के आम चुनावों में उन्होंने भाजपा को वोट दिया, क्योंकि वे मनमोहन सरकार की ‘घोटाला’ संस्कृति से नाराज थीं। कुछ महीनों बाद उन्होंने आप को वोट देने का फैसला किया। उन्होंने मुझसे कहा था, मुझे मोदी और केजरीवाल दोनों पसंद हैं, क्योंकि वे सेल्फ-मेड नेता हैं और बदलाव का वादा करते हैं।

यह फरवरी 2025 है और इस बार मेरी उन्हीं दोस्त ने भाजपा को वोट दिया है। दस साल तक वे इस ‘दिल्ली फॉर्मूले’ पर अड़ी रही थीं कि पीएम मोदी और सीएम केजरीवाल। तो इस बार उन्होंने मन क्यों बदला? उन्होंने कहा, क्योंकि मैं निराश हूं। मैं आप की वालंटियर भी रही थी, लेकिन अब वो दूसरी पार्टियों जैसी बन चुकी है और केजरीवाल दूसरे नेताओं सरीखे।

बात केवल उनकी ही नहीं है। उनके वोटिंग-​प्रिफरेंस में दिल्ली के मध्यवर्ग की झलक थी। जब ​​केजरीवाल ने पहली बार राष्ट्रीय मंच पर अपनी छाप छोड़ी, तो उन्हें पारंपरिक नेताओं से अलग माना गया था। वे आईआईटीयन थे, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता थे, मैग्सेसे पुरस्कार जीत चुके थे और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन छेड़े हुए थे।

उस समय नरेंद्र मोदी ‘अच्छे दिन’ का वादा कर रहे थे तो केजरीवाल इससे भी बढ़कर साफ-सुथरी राजनीति की गारंटी दे रहे थे। जब भाजपा को हिंदुत्व पार्टी बताया जाता था और कांग्रेस को कुलीनों की परिवार-केंद्रित पार्टी, तब एक राजनीतिक स्टार्ट-अप के रूप में आप के सिर पर इतिहास का कोई बोझ नहीं था। यही कारण है कि स्वप्नदर्शी, आदर्शवादी मध्यवर्गीय पेशेवर आम आदमी पार्टी की ओर आकर्षित हुए थे।

लेकिन दस साल में ही आप के ‘अलग तरह की पार्टी’ होने का सपना चकनाचूर हो गया है। मध्यवर्ग ने कूड़े के ढेर और ओवरफ्लो हो रहे सीवर से तंग आकर आप से पल्ला झाड़ लिया। 2025 का चुनावी-फैसला अपने अंतिम निष्कर्षों में मध्यवर्ग की ‘लहर’ था, जिसमें मतदाताओं ने आप की कार्यशैली के प्रति गुस्से और बेचैनी को व्यक्त किया।

जब बड़ा-सा मफलर पहने केजरीवाल एक छोटी नीली वैगन-आर में दिल्ली में घूमते थे, तो मध्यवर्ग उनका उत्साहवर्धन करता था, लेकिन मुख्यमंत्री का नया ‘शीश महल’ मध्यवर्ग के प्रति विश्वासघात का प्रतीक बन गया।

जब आप सार्वजनिक जीवन में इस वादे के साथ प्रवेश करते हैं कि सरकारी बंगलों में नहीं रहेंगे और फिर अपनी बात से पलट जाते हैं, तो जनता आपको जज करती है। वादे और हकीकत का अंतर इतना ज्यादा भी नहीं हो सकता।

अपनी नैतिक जमीन डगमगाने के बाद केजरीवाल को अब वापसी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। भाजपा और कांग्रेस के विपरीत, उनके पास इस राजनीतिक उथल-पुथल का सामना करने के लिए टिकाऊ ढांचा नहीं है।

जो केवल सत्ता के लिए आप में शामिल हुए थे, वे पार्टी छोड़ने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। अगले कुछ महीनों में इस बात की बहुत संभावना है कि पार्टी विभाजन और दलबदल से कमजोर हो जाए और कुछ लोग केजरीवाल के नेतृत्व को चुनौती भी दे सकते हैं।

और फिर भी, 54 वर्षीय केजरीवाल को खारिज करना जल्दबाजी होगी। दिल्ली में जहां मध्यवर्ग ने ब्रांड-केजरीवाल को खारिज किया है, वहीं निम्न आय वर्ग ने हमेशा की तरह आप की झाड़ू का उतना ही जोरदार समर्थन किया है।

केजरीवाल द्वारा गरीबों को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के प्रयास अनदेखे नहीं किए जा सकते। न ही स्थानीय स्तर पर स्कूलों और स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों में व्याप्त संकट को दूर करने की उनकी कोशिशों को नजरअंदाज किया जा सकता है। यही कारण है कि भाजपा को अब केजरीवाल को निशाना बनाने के तरीके में सावधानी बरतनी चाहिए। उनसे बदला लेने की मानसिकता उन्हें फिर से सड़कों पर उतरने का मौका दे सकती है।

भारतीय राजनीति में अभी भी एक ऐसे मजबूत स्ट्रीट-फाइटर के लिए स्पेस है, जो लगातार और ठोस तरीके से सार्वजनिक सरोकार के मुद्दों को उठाता हो। विपक्ष ज्यादातर बिखरा हुआ और प्रेरणाहीन है। ऐसे में केजरीवाल आप की छवि बदलकर उसे फिर से खड़ा करने के लिए रणनीतिक समझ और जमीनी स्तर पर संपर्क का परिचय दे सकते हैं। चुनावी हार उनके लिए एक जरूरी वेक-अप कॉल साबित हो सकती है।

पुनश्च : मेरी जिन दोस्त ने इस बार भाजपा को वोट दिया, उन्होंने अभी भी आप से उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं। वे कहती हैं, अगर भाजपा अपने वादे पूरे नहीं कर पाती तो मैं पांच साल में फिर से अपना मन बदल सकती हूं। भारतीय राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है!

फरवरी 2015 में मेरी एक दोस्त ने आप को वोट दिया था। इससे पहले वे कांग्रेस की कट्टर समर्थक थीं। पहली बार 2014 के आम चुनावों में उन्होंने भाजपा को वोट दिया, क्योंकि वे मनमोहन सरकार की ‘घोटाला’ संस्कृति से नाराज थीं। कुछ महीनों बाद उन्होंने आप को वोट देने का फैसला किया। उन्होंने मुझसे कहा था, मुझे मोदी और केजरीवाल दोनों पसंद हैं, क्योंकि वे सेल्फ-मेड नेता हैं और बदलाव का वादा करते हैं।

यह फरवरी 2025 है और इस बार मेरी उन्हीं दोस्त ने भाजपा को वोट दिया है। दस साल तक वे इस ‘दिल्ली फॉर्मूले’ पर अड़ी रही थीं कि पीएम मोदी और सीएम केजरीवाल। तो इस बार उन्होंने मन क्यों बदला? उन्होंने कहा, क्योंकि मैं निराश हूं। मैं आप की वालंटियर भी रही थी, लेकिन अब वो दूसरी पार्टियों जैसी बन चुकी है और केजरीवाल दूसरे नेताओं सरीखे।

बात केवल उनकी ही नहीं है। उनके वोटिंग-​प्रिफरेंस में दिल्ली के मध्यवर्ग की झलक थी। जब ​​केजरीवाल ने पहली बार राष्ट्रीय मंच पर अपनी छाप छोड़ी, तो उन्हें पारंपरिक नेताओं से अलग माना गया था। वे आईआईटीयन थे, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता थे, मैग्सेसे पुरस्कार जीत चुके थे और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन छेड़े हुए थे।

उस समय नरेंद्र मोदी ‘अच्छे दिन’ का वादा कर रहे थे तो केजरीवाल इससे भी बढ़कर साफ-सुथरी राजनीति की गारंटी दे रहे थे। जब भाजपा को हिंदुत्व पार्टी बताया जाता था और कांग्रेस को कुलीनों की परिवार-केंद्रित पार्टी, तब एक राजनीतिक स्टार्ट-अप के रूप में आप के सिर पर इतिहास का कोई बोझ नहीं था। यही कारण है कि स्वप्नदर्शी, आदर्शवादी मध्यवर्गीय पेशेवर आम आदमी पार्टी की ओर आकर्षित हुए थे।

लेकिन दस साल में ही आप के ‘अलग तरह की पार्टी’ होने का सपना चकनाचूर हो गया है। मध्यवर्ग ने कूड़े के ढेर और ओवरफ्लो हो रहे सीवर से तंग आकर आप से पल्ला झाड़ लिया। 2025 का चुनावी-फैसला अपने अंतिम निष्कर्षों में मध्यवर्ग की ‘लहर’ था, जिसमें मतदाताओं ने आप की कार्यशैली के प्रति गुस्से और बेचैनी को व्यक्त किया।

जब बड़ा-सा मफलर पहने केजरीवाल एक छोटी नीली वैगन-आर में दिल्ली में घूमते थे, तो मध्यवर्ग उनका उत्साहवर्धन करता था, लेकिन मुख्यमंत्री का नया ‘शीश महल’ मध्यवर्ग के प्रति विश्वासघात का प्रतीक बन गया।

जब आप सार्वजनिक जीवन में इस वादे के साथ प्रवेश करते हैं कि सरकारी बंगलों में नहीं रहेंगे और फिर अपनी बात से पलट जाते हैं, तो जनता आपको जज करती है। वादे और हकीकत का अंतर इतना ज्यादा भी नहीं हो सकता।

अपनी नैतिक जमीन डगमगाने के बाद केजरीवाल को अब वापसी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। भाजपा और कांग्रेस के विपरीत, उनके पास इस राजनीतिक उथल-पुथल का सामना करने के लिए टिकाऊ ढांचा नहीं है।

जो केवल सत्ता के लिए आप में शामिल हुए थे, वे पार्टी छोड़ने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। अगले कुछ महीनों में इस बात की बहुत संभावना है कि पार्टी विभाजन और दलबदल से कमजोर हो जाए और कुछ लोग केजरीवाल के नेतृत्व को चुनौती भी दे सकते हैं।

और फिर भी, 54 वर्षीय केजरीवाल को खारिज करना जल्दबाजी होगी। दिल्ली में जहां मध्यवर्ग ने ब्रांड-केजरीवाल को खारिज किया है, वहीं निम्न आय वर्ग ने हमेशा की तरह आप की झाड़ू का उतना ही जोरदार समर्थन किया है।

केजरीवाल द्वारा गरीबों को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के प्रयास अनदेखे नहीं किए जा सकते। न ही स्थानीय स्तर पर स्कूलों और स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों में व्याप्त संकट को दूर करने की उनकी कोशिशों को नजरअंदाज किया जा सकता है। यही कारण है कि भाजपा को अब केजरीवाल को निशाना बनाने के तरीके में सावधानी बरतनी चाहिए। उनसे बदला लेने की मानसिकता उन्हें फिर से सड़कों पर उतरने का मौका दे सकती है।

भारतीय राजनीति में अभी भी एक ऐसे मजबूत स्ट्रीट-फाइटर के लिए स्पेस है, जो लगातार और ठोस तरीके से सार्वजनिक सरोकार के मुद्दों को उठाता हो। विपक्ष ज्यादातर बिखरा हुआ और प्रेरणाहीन है। ऐसे में केजरीवाल आप की छवि बदलकर उसे फिर से खड़ा करने के लिए रणनीतिक समझ और जमीनी स्तर पर संपर्क का परिचय दे सकते हैं। चुनावी हार उनके लिए एक जरूरी वेक-अप कॉल साबित हो सकती है।

पुनश्च : मेरी जिन दोस्त ने इस बार भाजपा को वोट दिया, उन्होंने अभी भी आप से उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं। वे कहती हैं, अगर भाजपा अपने वादे पूरे नहीं कर पाती तो मैं पांच साल में फिर से अपना मन बदल सकती हूं। भारतीय राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं है! (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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