लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम:  बांग्लादेश में अराजकता हम सबके लिए चिंता का सबब
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: बांग्लादेश में अराजकता हम सबके लिए चिंता का सबब

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  • Lt. Gen. Syed Ata Hasnain’s Column: The Chaos In Bangladesh Is A Cause For Concern For All Of Us.

3 घंटे पहले

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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर - Dainik Bhaskar

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर

बांग्लादेश अपने हालिया इतिहास के सबसे खतरनाक दौर में से एक से गुजर रहा है। छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या ने उस सड़क-आंदोलन को और भड़का दिया है, जो वहां पहले से ही भीतर ही भीतर सुलग रहा था।

एक हिंसक घटना से शुरू हुआ आक्रोश अब शासन, स्थिरता और देश के क्षेत्रीय संबंधों के लिए एक व्यापक चुनौती में बदल चुका है। आने वाले हफ्तों में लिए जाने वाले फैसले यह तय करेंगे कि बांग्लादेश संतुलन की ओर लौटेगा या लंबे समय तक अनिश्चितता के दौर में फिसल जाएगा।

मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाला अंतरिम प्रशासन आज असाधारण दबाव में काम कर रहा है। और यह दबाव काफी हद तक उसकी अपनी नीतियों का परिणाम है। उसके सामने एक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर अगले वर्ष की शुरुआत में होने वाले चुनावों की जमीन तैयार करने की चुनौती।

उसे अवामी लीग पर प्रतिबंध और उसके शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति के बाद बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य से भी निपटना पड़ रहा है। बांग्लादेशी राजनीति के एक केंद्रीय स्तंभ को हटा तो दिया गया, लेकिन उसके स्थान पर कोई व्यापक रूप से स्वीकार्य वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दी गई। इस खालीपन को सड़कों ने भर दिया है।

बांग्लादेश अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। मौजूदा उथल-पुथल उसे राजनीतिक रूप से उस रास्ते पर ले जा सकती है, जहां असंतोष-आधारित राष्ट्रवाद और टकराव को बढ़ावा मिलता है। लेकिन इस मुल्क ने हाल के सालों में जो तरक्की की थी, वह व्यावहारिकता की जमीन पर टिकी थी- राजनीतिक स्थिरता, बाहरी दुनिया से जुड़ाव और विकास पर ध्यान।

जबकि जमीनी विरोध-प्रदर्शनों के साथ लगातार तालमेल बिठाकर शासन चलाना न तो टिकाऊ है और न ही समझदारी भरा। जनआंदोलनों को अंततः किसी निष्कर्ष पर पहुंचना होता है, और जितनी देर इस क्षण को टाला जाता है, संस्थागत सत्ता को बहाल करना उतना ही कठिन हो जाता है। नेतृत्व का अर्थ है जनभावनाओं को समझना, उनमें बह जाना नहीं।

आज बांग्लादेश की सड़कों पर भारत-विरोधी नारे नजर आ रहे हैं। कूटनीतिक परिसरों के सामने प्रदर्शन हो रहे हैं। हालांकि अगस्त 2024 से अब तक नई दिल्ली ने संयम बरता है, बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति पर सार्वजनिक टिप्पणी से परहेज किया है और शांत कूटनीतिक संवाद पर भरोसा किया है। लेकिन यह हमारी उदासीनता नहीं, बल्कि रणनीतिक धैर्य है। वैसे भी हमारी ओर से किसी भी तरह की अति-प्रतिक्रिया हस्तक्षेप के आरोपों को ही मजबूत करेगी।

किसी भी देश में राजनीतिक अस्थिरता के दौर ऐसे बाहरी तत्वों को आकर्षित करते हैं, जो अव्यवस्था में ही फलते-फूलते हैं। पाकिस्तान का खुफिया तंत्र ऐतिहासिक रूप से ऐसे अवसरों का लाभ उठाता रहा है। इसीलिए एक अधिक गंभीर खतरा यह है कि बांग्लादेश की धरती से भारत के खिलाफ उग्रवादी या आतंकवादी गतिविधियां उभरें।

दशकों तक भारत और बांग्लादेश के बीच घनिष्ठ सहयोग ने ऐसे खतरों को पनपने नहीं दिया था। लेकिन यदि अब ऐसा हुआ तो सुरक्षा संबंधी धारणाएं नाटकीय रूप से बदल जाएंगी और कठोर प्रतिक्रिया से जुड़े जटिल प्रश्न खड़े हो जाएंगे।

इसी संदर्भ में सीमा प्रबंधन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत-बांग्लादेश सीमा को एक स्थिरता पैदा करने वाले संपर्क-बिंदु के रूप में काम करना चाहिए, न कि गलतफहमियां बढ़ाने वाले क्षेत्र के रूप में।

शांत रवैया, सीमा सुरक्षा बलों के बीच प्रभावी समन्वय और उकसावे वाले संकेतों से परहेज अनिवार्य है। एक संस्था जो आने वाले समय में विशेष रूप से ध्यान के केंद्र में आएगी, वह है बांग्लादेश की सेना। परंपरागत रूप से उसने स्वयं को पेशेवर बनाए रखने और रोजमर्रा की राजनीति से अलग रखने की कोशिश की है, अपने मुल्क के सैन्य हस्तक्षेप के कठिन इतिहास से वह भली-भांति परिचित है, लेकिन लंबे समय तक जारी अस्थिरता सभी संस्थानों पर दबाव डालती है।

जब नागरिक सत्ता की परीक्षा होती है, तो व्यवस्था के संरक्षक के रूप में सेना से अपेक्षाएं बढ़ने लगती हैं। ऐसी अपेक्षाएं स्वस्थ नहीं हैं। इससे उस संस्था के राजनीतिकरण का खतरा पैदा होता है, जिसकी विश्वसनीयता उसकी तटस्थता पर टिकी है।

फिलहाल तो बांग्लादेश के नेतृत्व के लिए सबक साफ हैं। सड़कों पर होने वाले आंदोलन फौरी बदलाव तो ला सकते हैं, लेकिन दीर्घकालीन सुप्रशासन नहीं दे सकते। बांग्लादेश जितनी देर तक ठोस राजनीतिक नेतृत्व से दूर रहेगा, वहां पर स्थायित्व लाना उतना ही मुश्किल होता चला जाएगा।

गंभीर खतरा यह है कि बांग्लादेश की धरती से भारत के खिलाफ उग्रवादी या आतंकवादी गतिविधियां उभरें। दशकों तक ऐसा नहीं होने दिया गया था। अगर अब ऐसा हुआ तो सुरक्षा संबंधी धारणाएं नाटकीय रूप से बदल जाएंगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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