डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम:  काम का अधिकार कम न हो, उलटे इसे बढ़ाया जाना चाहिए
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डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम: काम का अधिकार कम न हो, उलटे इसे बढ़ाया जाना चाहिए

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  • Dr. Aruna Sharma’s Column The Right To Work Should Not Be Diminished, But Rather, It Should Be Enhanced.

5 घंटे पहले

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डॉ. अरुणा शर्मा प्रैक्टिशनर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट और इस्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव - Dainik Bhaskar

डॉ. अरुणा शर्मा प्रैक्टिशनर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट और इस्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव

मनरेगा का विचार ‘राइट टु वर्क’ से प्रेरित था। यूएन ने काम के अधिकार को बुनियादी मानवीय हक माना था। इसे मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र में भी सम्मिलित किया गया है। श्रम कानून और उचित मजदूरी भी बुनियादी सिद्धांत हैं। इस परिप्रेक्ष्य में मनरेगा में किए गए बदलावों को समझना जरूरी है।

काम के अधिकार के तहत स्थानीय निकायों, विशेषकर पंचायतों, को जिम्मेदारी दी गई थी कि वे स्थानीय स्तर पर चिह्नित परियोजनाओं की सूची से काम उपलब्ध कराएं और उनका क्रियान्वयन करें। मनरेगा ने इसे संस्थागत रूप दिया था। अनेक वर्षों के दौरान डिजिटलीकरण, जीपीएस टैगिंग और मजदूरी के सीधे बैंक खातों में भुगतान से इसमें पारदर्शिता और जवाबदेही मजबूत हुई। वहीं राज्यों ने मनरेगा को अन्य बुनियादी ढांचा योजनाओं के साथ जोड़ा, जिससे टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण हुआ।

लेकिन नई योजना के तहत किए गए बदलाव इस मॉडल से हटने का संकेत देते हैं। चयनित क्षेत्रों और सीमित कार्यों को एक केंद्रीकृत ढांचे में सीमित कर देने से स्थानीय जरूरतों की पहचान कमजोर होगी। खेती के मौसम के दौरान वाले कार्यों को बंद करने से खेत-मजदूर की मोलभाव की क्षमता कमजोर होगी। जबकि पुरानी योजना के तहत मनरेगा ने कृषि मजदूरी को बेहतर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई थी।

नई व्यवस्था में चिंता का विषय केवल यही नहीं है कि राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाकर 40% कर दी गई है- जो पहले सामग्री की लागत का केवल 10% थी। चिंता का विषय यह भी है कि इससे राज्यों के संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

जीएसटी के बाद कर-संग्रह मुख्यतया केंद्र के हाथ में चला गया है (ईंधन पर वैट और शराब पर उत्पाद शुल्क को छोड़कर)। सीमित संसाधनों वाले राज्य 40% हिस्सेदारी को वहन करने में असमर्थ रहेंगे, जिसका नतीजा मजदूरी के भुगतान में देरी या काम न मिलने के रूप में सामने आ सकता है।

एक और समस्या उस शर्त से जुड़ी है, जिसमें कहा गया है कि काम ‘फंड की उपलब्धता’ के अनुसार दिया जाएगा। इसका अर्थ है कि काम पर सीमा तय कर दी गई है, जो ‘काम के अधिकार’ की मूल भावना के विपरीत है। अब काम तभी मिलेगा, जब पैसा होगा।

नई व्यवस्था में जिन क्षेत्रों को कार्य के लिए चिह्नित किया गया है, वे भी श्रम की तुलना में अधिक सामग्री-आधारित हैं। उदाहरण के लिए जल परियोजनाओं में अधिकतम खर्च पाइप और टैंक निर्माण पर होता है, यही स्थिति टॉयलेट्स के निर्माण में भी है।

इससे श्रम आधारित रोजगार सृजन की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं। इसके विपरीत, पहले की व्यवस्था के तहत सड़क निर्माण में मिट्टी के काम, कृषि भूमि में कार्य, कुओं का निर्माण जैसे श्रम-प्रधान कार्य संभव हो पाते थे, जिससे अधिक रोजगार सृजित होते थे।

जरूरत इस बात की है कि नई योजना के स्ट्रक्चर को दुरुस्त किया जाए और कार्यों की उपलब्धता पूरे साल सुनिश्चित की जाए। ‘काम के अधिकार’ की मूल भावना यह है कि परियोजनाओं की उपलब्ध सूची से, निर्धारित न्यूनतम मजदूरी पर, मांग के अनुसार रोजगार उपलब्ध कराया जाए और परिसंपत्तियों का निर्माण भी हो। निस्संदेह, इस व्यवस्था में समय-समय पर सुधार की आवश्यकता रही है और आगे भी रहेगी, विशेष रूप से समय पर धन का प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए।

कार्य क्षेत्रों को सीमित करने की अवधारणा केवल पिछड़े और आदिवासी जिलों तक ही उचित हो सकती है। लेकिन निर्णय लेने का अधिकार विकेंद्रीकृत होना चाहिए। कई बार आपदा की स्थिति में बड़े पैमाने पर काम लेना अनिवार्य हो जाता है- जैसा कि महामारी के दौरान हुआ था।

तब प्रवासी मजदूरों के लिए मनरेगा जीवनरेखा साबित हुई थी। मनरेगा पहली ऐसी योजना थी, जिसने मजबूत घरेलू डेटा आधार पर डीबीटी को लागू किया और वित्तीय-समावेश की दिशा में महत्वपूर्ण शुरुआत की।

शून्य-बैलेंस खाते खोले गए, जो बाद में बचत खातों में बदले और जमा तथा अन्य बचत लाभों को प्रोत्साहित किया। मनरेगा किसी भी तरह के खाद्यान्न वितरण की तुलना में कहीं अधिक समावेशी योजना साबित हुई थी और मजदूरी के माध्यम से भुगतान ने लाभार्थियों की गरिमा भी बनाए रखी थी।

मनरेगा किसी भी तरह के खाद्यान्न वितरण की तुलना में कहीं अधिक समावेशी योजना साबित हुई थी और मजदूरी के माध्यम से भुगतान ने लाभार्थियों की गरिमा भी बनाए रखी थी। इसकी मूल भावना यथावत रहनी चाहिए। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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