एन. रघुरामन का कॉलम:  2025 एक स्लोगन के साथ विदा हो रहा है- मोबाइल फोन के परे भी जिंदगी है
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एन. रघुरामन का कॉलम: 2025 एक स्लोगन के साथ विदा हो रहा है- मोबाइल फोन के परे भी जिंदगी है

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

प्रवेश द्वार पर लगे एक बड़े बोर्ड पर लिखा था कि ‘अपना मोबाइल फोन निकालें और मेरी तस्वीर लें’। रविवार ब्रंच के न्योते पर मैंने इन्हीं निर्देशों का पालन किया। वहां जो चल रहा था, उससे कई मेहमान चौंक गए। जी, हां।

जैसे ही आप प्रवेश द्वार पर अभिवादन कर रहे महिला या पुरुष की तस्वीर लेते हैं तो वे बेहद शालीनता से आपके फोन के कैमरा लेंस पर एक छोटा-सा आयताकार स्टिकर चिपका देते हैं। किसी मेहमान ने इसका विरोध नहीं किया। दूसरे बोर्ड पर लिखा था कि ‘हर 20 मेहमानों पर एक फोटोग्राफर है- उनसे जितनी चाहें तस्वीरें खिंचवाइए।’

यह आइडिया बर्लिन, लंदन और न्यूयॉर्क के मशहूर क्लबों से लिया गया है, जो लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि वहां आने वाले मेहमानों के फोन इसी सहज तरीके से कवर्ड होने चाहिए- ताकि वो लोग तस्वीरें लेना छोड़ संगीत की धुनों पर नाचें। पहले इन क्लबों में फोन प्रतिबंधित ही थे, लेकिन अब उन पर स्टिकर लगाया जाता है।

अब यही तरीका निजी और हाई-प्रोफाइल पार्टियों में भी अपनाया जा रहा है, ताकि हर कोई मौजूदा पलों का आनंद ले सके। खासकर, बड़ी कंपनियों में उच्च पदों पर बैठे लोगों को यह डर न रहे कि उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर दिख जाएगी। अगर आप उनके साथ पिक्चर चाहते हैं, तो उनकी इजाजत लेनी होगी। वे पोज देंगे और आप तय फोटोग्राफर को बुलाकर फोटो खिंचवा सकते हैं।

आखिरकार, 2025 एक नए थीम के साथ खत्म हो रहा है- मोबाइल फोन से परे भी एक जिंदगी है। लोग धीरे-धीरे महसूस करने लगे हैं कि पूरी तरह स्क्रीन पर टिकी जिंदगी, असल में जीवन है ही नहीं। रिसर्च के आंकड़े भी यही कहते हैं। सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय 2022 में चरम पर था और 2024 में इसमें 10% की गिरावट आई।

अधिक वास्तविक अनुभवों की यह बढ़ती ललक डिजिटल तकनीक को नकारने या समय को फिर से 1995 में ले जाने का आग्रह नहीं, लेकिन कुछ तो ऐसा है- जो व्यक्तिगत अनुभवों की चाह बढ़ा रहा है। ऐसे अनुभव, जिन्हें भावी पीढ़ी को कहानी के जैसे सुनाया जा सके- जैसे हमारे ग्रैंड पैरेन्ट्स हमें बिना किसी फोटो साक्ष्य के सुनाया करते थे।

आपने लंच में क्या खाया, इसकी तस्वीर पोस्ट करने में आपकी रुचि घट रही है तो ऐसे आप अकेले नहीं हैं। पिछले हफ्ते जयपुर की एक हाई-प्रोफाइल शादी में अच्छे पदों पर बैठे मेरे सैकड़ों दोस्तों ने तस्वीरें लीं, कई ने तो ली भी नहीं- लेकिन कभी पोस्ट नहीं की।

मुंबई लौटते वक्त उन्होंने कुछ वीडियो तो डिलीट कर दिए गए, क्योंकि फोन का स्टोरेज समाप्त हो रहा था और वह क्लाउड स्पेस खरीदने के लिए कहने लगा। दो कारण हैं, जिनसे सभी वीडियोज को सहेजने या बाद में पोस्ट करने के प्रति रुचि घटी है। 1. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बना स्लॉप- भारी मात्रा में बना ऐसा कम गुणवत्ता वाला, जेनरिक और गलत डिजिटल कंटेंट- जिसमें कोई सार्थकता नहीं होती और महज क्लिक के लिए बना होता है।

इसमें न डिजिटल क्वालिटी होती है, न भरोसा। 2. सोशल मीडिया में हाई-प्रोफाइल इंफ्लुएंसर्स का दबदबा, जिससे हम जैसे लोगों के लिए जगह ही नहीं बचती। अब सर्द सुबह में चाय की चुस्की लेते हुए मोबाइल निकाल देखना कि आपने पहले कितने ऐसे वीडियो शूट किए, जो अब अनदेखे और बेमतलब ही फोन में पड़े हुए हैं। अगर आप मुझसे सहमत हैं तो कैमरा पर स्टिकर लगाइए, पार्टियों में जाइए और दूसरों के साथ उन पलों का आनंद फिर से उठाइए। एक ऐसी कहानी, जिसे आप गर्व के साथ बच्चों को सुना सकें।

फंडा यह है कि 2025 ने पर्दा गिरने से पहले हमें एक नई बात सिखाई है कि फोन और उससे जुड़ी आदतें 2026 और उससे आगे परेशानी बन सकती हैं। मोबाइल फोन से परे अनुभवों से भरी एक शानदार जिंदगी है। आप क्या सोचते हैं, मुझे लिखिए।

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