- Hindi News
- Opinion
- Indian Textile Industry Revival: From British Raj To Global Powerhouse 2026
3 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक
18वीं सदी में भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 25% हिस्सा हुआ करता था। वस्त्र उद्योग उसकी समृद्धि का केंद्रीय आधार था। भारतीय कपास पूरी दुनिया पर छाई हुई थी। सूती वस्त्रों का निर्यात यूरोप, अमेरिका और एशिया के बाजारों में होता था। फिर ब्रिटिश आए।
उन्होंने सूरत में व्यापारिक बंदरगाह स्थापित किए और छोटी-छोटी फैक्ट्रियां बनाईं। 1757 के बाद, जब रॉबर्ट क्लाइव ने प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पराजित किया, ब्रिटिशों ने भारत के वस्त्र उद्योग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। कुछ ही वर्षों में कपास व्यापार का विनाश शुरू हो गया।
अंग्रेज लंबे समय से सूती वस्त्रों की लोकप्रियता को लेकर चिंतित थे। 1700 तक यूके एक देश के रूप में अस्तित्व में नहीं था। उस समय इंग्लैंड और स्कॉटलैंड दो स्वतंत्र स्टेट थे, जिनके अपने अलग कानून थे। 1707 में जाकर ही ये दोनों एकजुट होकर यूनाइटेड किंगडम बने। उससे बहुत पहले ही इंग्लैंड ने कैलिको एक्ट (1700) पारित कर दिया था।
इस कानून के तहत भारत से आने वाले मुद्रित या रंगे हुए सूती वस्त्रों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ये वस्त्र इंग्लैंड में इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि अंग्रेजों के वस्त्र उद्योग को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। 1757 में बंगाल पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद ब्रिटिशों ने भारत को क्रमशः गैर-औद्योगीकृत करना शुरू किया, जिसकी शुरुआत भारत के फलते-फूलते वस्त्र उद्योग से हुई।
ब्रिटेन ने भारत से होने वाले निर्यात पर 70 प्रतिशत से अधिक शुल्क लगा दिया। यह स्थिति कुछ हद तक ट्रम्प के टैरिफ की याद दिलाती है। लेकिन लगभग 300 वर्ष पहले अमेरिका स्वयं ब्रिटेन का उपनिवेश था। ब्रिटेन ने अपने पुराने अमेरिकी उपनिवेश का उपयोग अपने नए भारतीय उपनिवेश के शोषण के लिए किया।
अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में होने वाली कपास की खेती से भारत में होने वाले शुल्क-मुक्त आयात ने कृषि को केवल कच्चे कपास के उत्पादन की ओर धकेल दिया। उसी समय ब्रिटिश कारखानों में निर्मित तैयार वस्त्र बड़ी मात्रा में भारत में आने लगे। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने आयात शुल्क को शून्य कर दिया। भारतीय बुनकर प्रतिस्पर्धा में पिछड़े और दिवालिया हो गए।
अपने भारतीय उपनिवेश से प्राप्त सस्ते कच्चे माल के बल पर 1760 के दशक में ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति ने गति पकड़ी। भारतीय किसानों, जमींदारों और श्रमिकों से वसूले गए कर-राजस्व ने इंग्लैंड में नई मशीनों के विकास को वित्तपोषित किया। औद्योगिक क्रांति ने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को भी मजबूत बनाया। भारत में इसका ठीक उलटा हुआ। रोजगार समाप्त होने लगे। वस्त्र-उद्योग के पारम्परिक केंद्र- सूरत, ढाका और मुर्शिदाबाद कठिनाइयों, जनसंख्या-ह्रास और समय-समय पर आने वाले अकालों के शिकार बने, जिनमें लाखों लोगों की मृत्यु हुई।
अब 2026 पर आइए। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के लगभग 79 वर्ष बाद स्थिति पूरी तरह उलट चुकी है। भारत एक बार फिर दुनिया के अग्रणी वस्त्र और परिधान निर्माताओं में शामिल है। भारतीय वस्त्र बाजार अब 250 अरब डॉलर (24 लाख करोड़ रुपये) से अधिक की बिक्री का प्रतिनिधित्व करता है।
भारत एक बार फिर दुनिया का सबसे बड़ा कपास और जूट उत्पादक भी है, जिसकी वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी 35 प्रतिशत है। कपास उद्योग प्रत्यक्ष रूप से 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 10 करोड़ अन्य लोगों को रोजगार देता है।
औपनिवेशिक बेड़ियों से मुक्त होने के बाद भारतीय टेक्स्टाइल्स सेक्टर आने वाले वर्षों में एक उभरते हुए निर्णायक उद्योग के रूप में दिखाई देता है। ईयू और यूके के साथ मुक्त व्यापार समझौते निर्यात को नई गति दे सकते हैं, क्योंकि शुल्क लगभग शून्य तक घट सकते हैं- यह पूर्ववर्ती सदियों की स्थिति का उलटा होगा।
लेकिन एक टेक्स्टाइल्स-पावरहाउस के रूप में भारत की प्रगति के बावजूद वह वस्त्रों के निर्यात में अभी पीछे है। चीन 300 अरब डॉलर से अधिक के साथ दुनिया का सबसे बड़ा वस्त्र निर्यातक है। फिर बांग्लादेश (49 अरब डॉलर), वियतनाम (42 अरब डॉलर), तुर्किये (39 अरब डॉलर) और भारत (38 अरब डॉलर) हैं।
सरकार की उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना ने घरेलू उत्पादकों की मदद की है। वर्तमान में दुनिया के पांचवें सबसे बड़े वस्त्र निर्यातक के रूप में भारत उस स्थिति में पहुंच चुका है, जहां वह उचित नीतियों के साथ 2030 तक चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा वस्त्र निर्यातक बनकर उभर सकता है। तीन सौ वर्षों बाद वस्त्र उद्योग की धारा एक बार फिर भारत के पक्ष में मुड़ती दिखाई दे रही है।
ब्रिटिश राज ने भारत के कपड़ा उद्योग को ध्वस्त कर दिया था, लेकिन आज फिर हम दुनिया का सबसे बड़ा कपास और जूट उत्पादक बन चुके हैं। कपास उद्योग करोड़ों लोगों को रोजगार देता है। पर हम इससे भी बेहतर कर सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)









