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- Column By Lt Gen Syed Ata Hasnain Iran’s Conflict Is Not Limited To US Israel
6 मिनट पहले
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
ईरान और इजराइल के बीच आज जो तनातनी चल रही है, उसकी जड़ें 1979 की ईरानी क्रांति में हैं, जिसने शिया धर्मतंत्र को जन्म दिया। इस नए इस्लामी गणराज्य ने न केवल ईरान को नया रूप देने की कोशिश की, इसकी महत्वाकांक्षा इस्लामी दुनिया का नेतृत्व करने की भी रही।
इसने प्रतिद्वंद्विता को जन्म दिया और सऊदी अरब जैसी सुन्नी ताकतें ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को चुनौती देने के लिए एकजुट होने लगीं। उसी समय, अरब राज्यों ने इजराइल के हाथों बार-बार सैन्य पराजय झेलने के बाद अपने कट्टरपंथी एंटी-जायोनिस्ट रुख में नरमी लाना शुरू की।
ईरान ने उग्र इजराइल विरोधी रुख के साथ उस वैचारिक शून्य में कदम रखा। समय के साथ इसने अपनी सीमाओं से परे जाकर ताकत दिखाने के लिए हिजबुल्ला, हमास, हूतियों जैसे सशस्त्र प्रॉक्सी को समर्थन दिया। आज ईरान अरब देशों की तुलना में कहीं आक्रामक रूप से इजराइल विरोधी हो गया है।
इस टकराव ने ईरान के तीन उद्देश्यों को पूरा किया है : घरेलू शासन को मजबूत करना, क्षेत्रीय वर्चस्व का दावा करना और खाड़ी के पश्चिम की तरफ रुझान रखने वाले सुन्नी राजतंत्रों के समक्ष एक रैडिकल विकल्प पेश करना। परमाणु हथियारों के एंगल ने इन तनावों को और बढ़ाया है।
ईरान का परमाणु-कार्यक्रम केवल न्यूक्लियर-डिटरेंट के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, यह इजराइल की अघोषित परमाणु क्षमता के खिलाफ एक रणनीतिक बचाव भी है। आज ईरान का घोषित शत्रु भले ही इजराइल हो, लेकिन अगर ईरान ने एटम बम बना लिया तो यह पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में दूसरे शक्ति-संतुलनों को भी बदल देगा।
ईरान के परमाणु और सैन्य बुनियादी ढांचे पर इजराइल के नवीनतम हमलों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इजराइली खुफिया एजेंसियों ने संभवतः यह आकलन किया था कि ईरान परमाणु हथियार क्षमता से कुछ सप्ताह दूर है।
इस तरह की पिछली चेतावनियां हमेशा सटीक साबित नहीं हुई हैं, जैसा कि दो दशक पहले इराक में हुआ था। फिर भी, तेल अवीव ने जिस तरह की तत्परता का परिचय दिया, वह बहुत कुछ बताता है। कुछ लोगों का मानना है कि इसके पीछे घरेलू राजनीति का गणित भी है, क्योंकि नेतन्याहू गम्भीर कानूनी और राजनीतिक दबावों का सामना कर रहे हैं।
इजराइल के हमलों में संदिग्ध परमाणु स्थलों, ड्रोन फेसिलिटीज और मिसाइल डिपो के खिलाफ हवाई और लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। ईरान को नतांज में जरूर कुछ नुकसान हुआ है, लेकिन पहाड़ों के नीचे दबी हुई फोर्दो साइट को केवल हवाई ताकत से नहीं भेदा जा सकेगा।
फिर भी, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को आंशिक क्षति भी इजराइल के द्वारा एक रणनीतिक लाभ के रूप में देखी जाएगी। ईरान के अधिकांश प्रॉक्सी नेटवर्क- चाहे वो हिजबुल्ला हो, हूती हों या इराक-सीरिया में मिलिशिया हों- पहले ही कमजोर हो चुके हैं, इसलिए अब इजराइल ईरान की पारंपरिक सैन्य संपत्तियों को व्यवस्थित रूप से निशाना बना रहा है।
इनमें एयरबेस, राडार सिस्टम, ड्रोन कारखाने, मिसाइल लॉन्चर और लॉजिस्टिक्स नोड्स- सब शामिल हो सकते हैं। इजराइली खुफिया महकमा यह सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करेगा कि ये प्रॉक्सी जल्दी से फिर न उभर पाएं।
हालांकि अमेरिका ने इस सबसे से अभी तक अपने को दूर रखा है, लेकिन इजराइल के प्रति उसका समर्थन स्पष्ट और मजबूत है। दुनिया ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंतित है। होर्मुज स्ट्रैट में या उसके आस-पास कोई भी अस्थिरता वित्तीय बाजारों को हिला सकती है। यदि लड़ाई लंबी खिंच गई तो भारत और चीन जैसे ऊर्जा का आयात करने वाले देश इसका प्रभाव महसूस करेंगे।
तीन सप्ताह से अधिक समय तक चलने वाला युद्ध वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को गंभीर रूप से बाधित कर सकता है और व्यापक ऊर्जा संकट को जन्म दे सकता है। यूक्रेन के साथ युद्ध में फंसा रूस इस लड़ाई में किसी भी प्रत्यक्ष भागीदारी से बचना चाहेगा।
ईरान और सऊदी अरब के बीच कूटनीतिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए मध्यस्थता करने वाला चीन स्वार्थ के चलते संयम बरतने का आह्वान करेगा। तुर्किये फिलिस्तीन-समर्थक बयानबाजी करता रहेगा। इस पूरे मामले में अरब देश मुश्किल स्थिति में हैं।
सऊदी अरब, यूएई और बहरीन- जो अब्राहम समझौते के जरिए इजराइल से जुड़े हैं- तटस्थ रहना पसंद करते हैं। लेकिन उन्हें अंदरूनी अशांति का खतरा है। मिस्र और जॉर्डन भी सुरक्षा खतरों से ज्यादा अपनी जनता के विरोध के बारे में चिंतित हैं। ऐसी स्थितियों में इस्लामी पहचान निर्णायक भूमिका निभाती जरूर है, लेकिन गाजा के मामले में अरब दुनिया से पर्याप्त मदद नहीं मिली है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








