लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम:  युद्ध छेड़ा, पर उसे खत्म करने का रास्ता नहीं सूझ रहा है
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: युद्ध छेड़ा, पर उसे खत्म करने का रास्ता नहीं सूझ रहा है

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6 घंटे पहले

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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर - Dainik Bhaskar

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर

ईरान और इजराइल की लड़ाई में अमेरिका के प्रवेश के बाद अब यह एक खतरनाक तीन-तरफा टकराव बन गया है। इससे दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरण खासे बदल जाएंगे। यह अमेरिकी भागीदारी का पीक है या सिर्फ शुरुआत, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा।

यदि अमेरिका इतने भर से संतुष्ट है कि टारगेटेड ईरानी परमाणु और मिसाइल फे​सिलिटीज़ को निष्प्रभावी कर दिया गया है, तो आगामी प्रहारों पर विराम लग सकता है। अगर नहीं, तो हालात बेकाबू होने वाले हैं। ईरान अमेरिका की किसी भी अनिर्णायकता को जवाबी कार्रवाई करने या संघर्ष का विस्तार करने के अवसर के रूप में देख सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह युद्ध एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकता है, जिससे न सिर्फ पश्चिम एशिया बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को भी खतरा हो सकता है।

इस बीच, इजराइल खुद को एक अनिश्चित स्थिति में पाता है। अपनी बड़ी सैन्य ताकत के बावजूद उसे कई मोर्चों पर भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। उसकी आयरन डोम वायु रक्षा प्रणाली ईरान की ओर से आने वाले ड्रोन और मिसाइलों की भरमार से हांफने लगी है।

उसका गोला-बारूद का भंडार कम होता बताया जा रहा है। अमेरिका के समर्थन के बावजूद, खबरें हैं कि इजराइल ने आपातकालीन पूर्ति के लिए चुपचाप भारत से संपर्क किया है- यह बताता है कि उसके लिए स्थिति कितनी गंभीर हो गई है।

ईरान का अगला कदम महत्वपूर्ण होगा। उसकी हुकूमत दबाव में है, लेकिन उसके टूटकर बिखरने के कोई संकेत फिलहाल तो नहीं दिख रहे हैं। ईरानी नेतृत्व या कमांडरों को टारगेट करना वहां पर शासन परिवर्तन को गति देने के लिए काफी नहीं होगा।

आंतरिक सहयोग से ईरानी नेतृत्व की ताकत और बढ़ेगी। अब वह होर्मूज ट्रैट को टारगेट कर रहा है और उसका यह कदम न केवल खाड़ी देशों को प्रभावित करेगा, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति को भी खतरे में डालेगा और भारत जैसे देशों पर इसका गंभीर असर होगा।

ट्रम्प पर अब इस युद्ध की जवाबदेही आ गई है। अमेरिकी जनमत सीमित सैन्य कार्रवाई को तो बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन मध्य-पूर्व में एक और लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में घसीटे जाने को पसंद नहीं करने वाला है। अमेरिका का मकसद शुरू से ही सीमित रहा है- ईरान को परमाणु क्षमता हासिल करने से रोकना और इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करना।

वह ईरान से फुल-स्केल युद्ध या वहां पर शासन-परिवर्तन कराने पर आमादा नहीं है। लेकिन सीमित युद्धों में भी बहुत जोखिम होता है। और जैसा कि इतिहास बताता है, एक बार सैन्य-कार्रवाई शुरू होने के बाद घटनाएं अपने आप गति पकड़ सकती हैं।

किसी स्पष्ट कूटनीतिक एग्जिट-प्लान का अभाव इस संघर्ष को विशेष रूप से खतरनाक बनाता है। भारत के भी हित इससे जुड़े हैं। खाड़ी में 80 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं और क्षेत्रीय स्थिरता में उनकी खासी आर्थिक हिस्सेदारी है। तेल की बढ़ती कीमतों का खतरा तो खैर है ही।

इस युद्ध की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक स्पष्ट एंड-गेम की कमी है। यदि इजराइल ईरान की परमाणु क्षमताओं को कम करने में सफल होता है, तो भी तेहरान बहुत आसानी से उनका पुनर्निर्माण कर सकता है। यदि ईरान में सत्ताबदल लक्ष्य है, तो यह एक और इराक या लीबिया बनाने के जोखिम से भरा है।

यदि अमेरिका हमला करने के बाद इस संघर्ष से बाहर निकलने की उम्मीद करता है, तो यह केवल ईरान और उसके सहयोगियों को प्रोत्साहित ही करेगा। और अगर ईरान को लगता है कि वह राजनीतिक और सैन्य रूप से इस दौर से होकर गुजर सकता है तो लड़ाई रुकने का नाम नहीं लेगी।

इसमें कूटनीति की अब कोई भूमिका नहीं रह गई है। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद लगभग पंगु है, अरब-मुल्क विभाजित हैं, और रूस और चीन जैसी वैश्विक ताकतें आलोचना भले चाहे जितनी करें, वे कोई समाधान नहीं देती हैं।

भारत इजराइल के साथ मजबूत रक्षा संबंध रखता है, जिसमें खुफिया सहयोग भी शामिल है। चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा गलियारों के माध्यम से ईरान तक उसकी रणनीतिक पहुंच बनी हुई है। इजराइल द्वारा भारत से सैन्य आपूर्ति मांगने की रिपोर्ट यह बताती है कि भारत को वह विश्वसनीय मानता है। फिर भी भारत को इसे सावधानीपूर्वक संतुलित करना चाहिए। किसी भी पक्ष के अलगाव से बचना चाहिए और अपने प्रवासियों और ऊर्जा हितों की सुरक्षा करनी चाहिए।

मध्य-पूर्व में चल रहा संघर्ष अब गम्भीर स्थिति में आ गया है। युद्ध में अमेरिका का प्रवेश, इजराइल की निरंतर कमजोर होती सुरक्षा और ईरान की अनिश्चित आंतरिक राजनीति- ये सब मिलाकर एक विस्फोटक स्थिति बनाते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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