लोकलसर्किल्स का दावा- 20% लोग सिलेंडर ब्लैक में खरीद रहे:  ₹4,000 तक ज्यादा देना पड़ रहा, 68% घरों में समय पर नहीं पहुंच रही गैस
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लोकलसर्किल्स का दावा- 20% लोग सिलेंडर ब्लैक में खरीद रहे: ₹4,000 तक ज्यादा देना पड़ रहा, 68% घरों में समय पर नहीं पहुंच रही गैस

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नई दिल्ली42 मिनट पहले

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देशभर में एजेसियों पर अब भी सिलेंडर के लिए लाइनें देखी जा रही है। - Dainik Bhaskar

देशभर में एजेसियों पर अब भी सिलेंडर के लिए लाइनें देखी जा रही है।

रसोई गैस की कमी के कारण देश में सिलेंडर की कालाबाजारी बढ़ गई है। गैस की कमी और डिलीवरी में देरी की वजह से देश के करीब 20% परिवारों को ब्लैक में सिलेंडर खरीदना पड़ रहा है। इसके लिए लोगों को एक घरेलू सिलेंडर के 4000 रुपए तक देने पड़ रहे हैं।

यह दावा इंडियन सर्वे और रिसर्च फर्म लोकलसर्किल्स की ओर से जारी सर्वे रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ब्लैक में सिलेंडर लेने वालों की संख्या पिछले हफ्ते के मुकाबले 6% बढ़ गई है। सर्वे में सामने आया कि इस हफ्ते 68% भारतीय घरों को गैस डिलीवरी में देरी का सामना करना पड़ा, जबकि पिछले हफ्ते यह आंकड़ा 57% था।

ईरान की अमेरिका-इजराइल से चल रही जंग और होर्मुज रूट बंद होने से भारत में गैस का आयात प्रभावित हुआ है। हालांकि, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि अब पैनिक बुकिंग में कमी आई है, लेकिन हालात अभी भी चिंता वाले बने हुए हैं।

ग्राहकों को ₹4,000 तक ज्यादा देने पड़ रहे

सर्वे के मुताबिक, गैस की किल्लत की वजह से पिछले हफ्ते के मुकाबले ब्लैक में सिलेंडर लेने वाले 14% से बढ़कर 20% हो गए हैं। लोग तय रेट से ₹300 से ₹4,000 तक ज्यादा दे रहे हैं। एक मामले में तो रिटायर्ड अधिकारी की हाउसिंग सोसाइटी को कम्युनिटी इवेंट के लिए एक सिलेंडर के ₹5,000 तक देने पड़े।

बिना सिलेंडर मिले ही डिलीवरी का मैसेज आ रहा

सरकार ने गैस सप्लाई को पारदर्शी बनाने के लिए जो डिजिटल सिस्टम बनाया था, अब उसी का गलत इस्तेमाल हो रहा है। करीब 12% उपभोक्ताओं ने धोखाधड़ी वाले SMS मिलने की शिकायत की है। इन मैसेज में दावा किया जा रहा है कि उनका सिलेंडर डिलीवर हो गया है, जबकि उनके घर गैस पहुंची ही नहीं। इस ‘फैंटम डिलीवरी’ यानी कागजों पर होने वाली डिलीवरी ने ऑफिशियल बुकिंग प्लेटफॉर्म्स पर लोगों का भरोसा कम कर दिया है।

सिर्फ 28% परिवारो को ही समय पर मिल रहा सिलेंडर

देश के 328 जिलों के 57,000 लोगों पर हुए सर्वे में सामने आया कि केवल 28% परिवारों को ही समय पर गैस मिल पा रही है। इस सर्वे में शहर और गांव के 61% पुरुष और 39% महिलाएं शामिल थीं, जिनमें से ज्यादातर ने गैस सप्लाई में परेशानी की बात कही।

शहरों में PNG और गांवों में लकड़ी पर लौट रहे लोग

गैस सप्लाई की कमी को देखते हुए शहरी उपभोक्ता अब पाइप वाली प्राकृतिक गैस (PNG) की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। वहीं, ग्रामीण भारत की स्थिति और भी खराब है। सर्वे बताता है कि सप्लाई न होने के कारण 40% से ज्यादा ग्रामीण आबादी अब भी पारंपरिक बायोमास (लकड़ी और उपले) पर निर्भर है।

सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग

लोकलसर्किल्स अब इस सर्वे की रिपोर्ट केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों को सौंपने की तैयारी में है। संस्था ने मांग की है कि गैस की जमाखोरी करने वाले डीलरों और धोखाधड़ी करने वाली एजेंसियों के खिलाफ तत्काल सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही, डिजिटल सिस्टम में आ रही खामियों को दूर करने की भी अपील की गई है ताकि आम आदमी को ब्लैक में सिलेंडर न खरीदना पड़े।

कालाबाजारी रोकने के लिए 4500 छाप मारे

पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया कि सरकार ने निगरानी बढ़ाने के लिए 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कंट्रोल रूम और जिला स्तर पर मॉनिटरिंग कमेटियां बनाई हैं। जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए देशभर में 4500 छापे मारे गए। इनमें से 1100 छापे उत्तर प्रदेश में हुए। वहीं ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने 1800 सरप्राइज इंस्पेक्शन भी किए।

सुजाता शर्मा ने कहा कि पिछले एक हफ्ते में करीब 11,300 टन कमर्शियल LPG उपभोक्ताओं को दी गई है और 18 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में इसका आवंटन किया गया है।

क्रूड और गैस के दाम बढ़ने की 2 वजहें

1. कतर का रास लफ्फान प्लांट बंद

ईरान के ड्रोन हमलों में कतर के रास लफ्फान को काफी नुकसान पहुंचा है। यह दुनिया का सबसे बड़ा LNG हब है और ग्लोबल सप्लाई का करीब पांचवां हिस्सा (20%) यहीं से आता है। हमले के बाद इस प्लांट को फिलहाल बंद कर दिया गया है। इससे सप्लाई रुक गई है।

2. ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का लगभग बंद होना

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का बंद होना है। ये करीब 167 किमी लंबा जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। ईरान जंग के कारण यह रूट अब सुरक्षित नहीं रहा है। खतरे को देखते हुए कोई भी तेल टैंकर वहां से नहीं गुजर रहा।

दुनिया के कुल पेट्रोलियम का 20% हिस्सा यहीं से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देश भी अपने निर्यात के लिए इसी पर निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का 50% कच्चा तेल और 54% एलएनजी इसी रास्ते से मंगाता है। ईरान खुद इसी रूट से एक्सपोर्ट करता है।

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