ट्रॉमा बॉन्डिंग:  अपनों का दिया दर्द भी अच्छा लगने लगे तो सजग होने की जरूरत
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ट्रॉमा बॉन्डिंग: अपनों का दिया दर्द भी अच्छा लगने लगे तो सजग होने की जरूरत

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द न्यूयॉर्क टाइम्स.ऑस्टिन8 मिनट पहले

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'ट्रॉमा बॉन्डिंग' एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है जहां पीड़ित अपने ही उत्पीड़क से गहराई से जुड़ जाता है। - प्रतीकात्मक फोटो - Dainik Bhaskar

‘ट्रॉमा बॉन्डिंग’ एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है जहां पीड़ित अपने ही उत्पीड़क से गहराई से जुड़ जाता है। – प्रतीकात्मक फोटो

लिली कोरेल (55) के लिए उनकी यां किसी पहेली जैसी थीं। अच्छे दिनों में दोनों हंसते लेकिन अचानक यही मां हिंसक हो उठती। लिली को याद है कि कैसे एक बार मां ने उन्हें दीवार पर दे मारा और जान से मारने की धमकी दी। ताज्जुब यह कि इस हिंसा के बावजूद लिली बार-बार अपनी मां की ओर ही खिंची चली जातीं। बाद में यही सिलसिला उनकी शादी में भी दोहराया गया। इसे ‘ट्रॉमा बॉन्डिंग’ कहते हैं। लोग इसे समान दुख झेलने वाले दो दोस्तों की दोस्ती के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन असलियत इससे अलग है। यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है जहां पीड़ित अपने ही उत्पीड़क से गहराई से जुड़ जाता है।

मेंटल हेल्थ अमेरिका के डॉ. पियरलुइगी मैनसिनी बताते हैं,’ प्रताड़ना के बाद अचानक प्यार या दयालुता का व्यवहार मिलता है, तो बंधन और मजबूत हो जाता है। इसे रुक-रुक कर मिलने वाला प्रोत्साहन कहते हैं। यह इतना असरदार होता है कि पीड़ित सारे जख्म भूलकर इसी उम्मीद में टिका रहता है कि साथी बुरा नहीं है, बस कभी-कभी आपा खो देता है। डॉ. मैनसिनी के अनुसार, जब अपराधी माफी मांगता है या प्यार दिखाता है, तो पीड़ित के मस्तिष्क में डोपामाइन और ऑक्सीटोसिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज होते हैं, जो खुशी और जुड़ाव का अहसास कराते हैं। यही पल पीड़ित को ‘पंगु’ कर देते हैं और वह रिश्ता छोड़ नहीं पाता।

ट्रॉमा एक्सपर्ट जनिना फिशर कहती हैं, ‘यही सबसे बड़ी गलती है। अगर प्रताड़ना को सही ठहरा रहे हैं। सामाजिक रूप से दूर होते जा रहे हैं… यानी दोस्तों और परिवार से कट रहे हैं। या फिर लगता है कि उस व्यक्ति के बिना जीवित नहीं रह पाएगा, भले ही वह चोट पहुंचा रहा हो… तो सजग होने की जरूरत है।

मनोवैज्ञानिक मेगन कटर कहती हैं कि कई बार पीड़ित को यह जानकर ही राहत मिलती है कि वह अकेला नहीं है और यह एक जटिल मनोवैज्ञानिक स्थिति है। इस भ्रमजाल से तत्काल निकलना जरूरी है। क्योंकि इस तरह का जुड़ाव जिंदगी कभी सामान्य नहीं होने देता।

पहले अपनी सुरक्षा को महत्व दें, थेरेपी भी होगी मददगार

अगर ऐसे रिश्ते में फंसे हैं जिसे छोड़ना मुश्किल लग रहा है, तो यह आपकी गलती नहीं है। या आपके दिमाग और उत्पीड़क के बीच का जटिल मनोवैज्ञानिक खेल है। सही मदद और समर्थन से इस बंधन को तोड़ा जा सकता है। डॉ. मैनरिसन कहते हैं, सबसे पहले अपनी शारीरिक और भावनात्मक सुरक्षा को प्राथमिकता दें। इसके बाद ऐसे थेरेपिस्ट से जुड़ना मददगार होता है जो इस स्थिति को समझते हों। वे अपराधबोध जैसे भावनाओं को कम करने और नर्वस सिस्टम को नियंत्रित करने की तकनीक सिखा सकते हैं मेगन कहती हैं, अगर थेरेपी के लिए तैयार नहीं हैं, तो गुमनाम रहकर हेल्पलाइन या सपोर्ट ग्रुप्स से संपर्क कर सकते हैं। ये संस्थान बिना नाम बताए भी मार्गदर्शन और सहयोग देते हैं।



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