विराग गुप्ता का कॉलम:  एआई की मदद से मुकदमों का बोझ क्यों नहीं घटाते हम?
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विराग गुप्ता का कॉलम: एआई की मदद से मुकदमों का बोझ क्यों नहीं घटाते हम?

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5 घंटे पहले

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और 'डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत' के लेखक - Dainik Bhaskar

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक

देश में एआई की आंधी चल रही है। यह एक समस्या साबित होगी या विकसित भारत का शंखनाद, इसकी तस्वीर जल्द साफ हो जाएगी। फिलहाल 4 बिंदुओं के जरिए न्यायिक व्यवस्था में एआई से जुड़ी चुनौतियों व विरोधाभासों का मूल्यांकन किया जा सकता है :

1. ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट के तीसरे चरण में एआई और ब्लॉकचेन के इस्तेमाल के लिए सिर्फ 53.57 करोड़ दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में शोध और अनुवाद के लिए कई एआई टूल बनाए गए हैं। लेकिन 99 फीसदी से ज्यादा मुकदमे हाईकोर्ट और जिला अदालतों में लंबित हैं। वहां एआई के माध्यम से पुलिस, अदालत, जेल, अभियोजन और वादकारों को जोड़कर जमानत से जुड़े लाखों मामलों में जल्द फैसला हो सकता है। एआई के इस्तेमाल से चेक बाउंसिंग और ट्रैफिक चालान जैसे करोड़ों मुकदमों के त्वरित निस्तारण से अदालतों में मुकदमों का भारी बोझ कम हो सकता है। अदालतों में एआई टूल के इस्तेमाल से मुकदमों की कार्रवाई की ट्रांसस्क्रिप्ट बने तो तारीख पे तारीख का गोरखधंधा कम हो सकता है। लेकिन आम जनता के लिए जल्द और सही न्याय के अधिकार को सुनिश्चित करने में एआई का व्यावहारिक इस्तेमाल नहीं होना चिंताजनक है।

2. विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने कहा कि फैसले पर पहुंचने की प्रक्रिया में मदद और केस मैनेजमेंट के माध्यम से एआई न्याय की रफ्तार बढ़ा सकता है। लेकिन यह जजों के विवेक और मानवीय भावनाओं की जगह नहीं ले सकता। न्यूजीलैंड में क्राइस्टचर्च की जिला अदालत के जज ने एआई के माध्यम से लिखे माफीनामा को अस्वीकार करते हुए कहा कि उसमें संवेदना और मानवीय भावों का अभाव है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस गवई ने कहा था कि चैटजीपीटी के इस्तेमाल से संवैधानिक व्यवस्था के सामने बड़े संकट आ रहे हैं। पिछले महीने बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी एआई से बनाए गए काल्पनिक मुकदमे के उल्लेख पर 50 हजार का जुर्माना लगाया था। अब चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने नए सिरे से इस मर्ज पर चिंता जाहिर की है। वकीलों की ड्राफ्टिंग और जजों के फैसलों में एआई के गलत इस्तेमाल से मुकदमेबाजी को जटिल बनाया जा रहा है।

3. लोकसभा में कानून मंत्री ने दिसंबर 2025 में कहा था कि न्यायपालिका में एआई के इस्तेमाल से एल्गोरिदम बायस, अनुवाद की समस्या और डेटा सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर ई-कमेटी विचार कर रही है। उसके पहले मार्च 2025 में मंत्री ने संसद में कहा था कि नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर के माध्यम से फैसलों का 18 भाषाओं में अनुवाद हो रहा है। पिछले दिसंबर में जनहित याचिका में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा था कि एआई के गलत इस्तेमाल से न्यायिक प्रशासन में गतिरोध नहीं होना चाहिए। उसके बावजूद सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी को वैध ठहराने के लिए सबूत के तौर पर सरकार ने तीन मिनट के भाषण का आठ मिनट में अनुवाद पेश किया है। जस्टिस अरविंद कुमार और वराले की पीठ ने कहा कि एआई के दौर में अनुवाद के मामलों में कम से कम 98 फीसदी सटीकता जरूरी है। जजों के अनुसार सरकार किसी ऐसी चीज पर भरोसा कर रही है, जो वास्तविक नहीं है।

4. सुनवाई और प्रसारण में वॉट्सएप और जूम जैसे एप्स का इस्तेमाल होना गैरकानूनी होने के साथ न्यायिक व्यवस्था में विदेशी हस्तक्षेप भी है। गृह मंत्रालय के नवीनतम आदेश के अनुसार वर्गीकृत जानकारी को मीडिया से साझा करने वाले अधिकारियों के खिलाफ गोपनीयता कानून के तहत सख्त आपराधिक कार्रवाई होगी। लेकिन डिजिटल और एआई कंपनियों के साथ जनता और सरकार के डेटा को गैरकानूनी और संगठित तरीके से साझा करने के खिलाफ कारवाई नहीं हो रही। निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के नौ साल पुराने फैसले को लागू करवाने के बजाय ठंडे बस्ते में कैद डेटा सुरक्षा कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अदालतों में सुनवाई होना एक अलग ही प्रहसन है। एआई के माध्यम से ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ का लक्ष्य सधे तो अच्छा है। लेकिन एआई क्रांति की आड़ में विदेशी कंपनियों का आधिपत्य हो गया तो संविधान की सार्वभौमिकता और आत्मनिर्भर भारत के सामने खतरों की सुनामी आ सकती है।

अदालतों में एआई टूल के इस्तेमाल से मुकदमों की कार्रवाई की ट्रांसस्क्रिप्ट बने तो तारीख पे तारीख का गोरखधंधा कम हो सकता है। लेकिन आम जनता के हित में एआई का व्यावहारिक इस्तेमाल नहीं किया जाना चिंताजनक है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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