विराग गुप्ता का कॉलम:  गेमिंग कम्पनियों पर लगाम के लिए कठोर दंड क्यों नहीं?
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विराग गुप्ता का कॉलम: गेमिंग कम्पनियों पर लगाम के लिए कठोर दंड क्यों नहीं?

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दिल्ली में आईआरएस अधिकारी की बेटी के साथ दुष्कर्म और हत्या का आरोपी नौकर ऑनलाइन गेमिंग की लत की वजह से 7 लाख रुपये के कर्ज के जाल में फंस गया था। एम्स और इहबास के डॉक्टरों के अनुसार गेमिंग डिसऑर्डर और नशे के कॉम्बो से अवसाद, चोरी, धोखाधड़ी, पोर्नोग्राफी और दूसरे अपराध बढ़ रहे हैं। ऑनलाइन गेमिंग की महामारी से लोगों को बचाने के लिए पिछले साल संसद से कानून बना था। उसके अनुसार 1 मई से नए नियम लागू होंगे। लेकिन इनसे भी ऑनलाइन जुए और सट्टेबाजी का मर्ज खत्म नहीं होगा। इससे जुड़े 5 पहलुओं को समझना जरूरी है : 1. संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार सट्टेबाजी और जुए को रोकने हेतु कानून बनाने के लिए केंद्र के पास अधिकार ही नहीं हैं। केंद्र सरकार ने अगस्त 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट में कहा था कि इस बारे में कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है। तेलंगाना, तमिलनाडु, कनार्टक, छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने इस मर्ज पर लगाम कसने के लिए कानून बनाने की पहल की थी। राज्यों के साथ मिलकर युवाओं को गेमिंग के मर्ज से निजात दिलाने के बजाय आईटी रूल्स में बदलाव और एडवाइजरी के बहाने केंद्र सरकार उलटे गेमिंग कम्पनियों के कारोबार को बढ़ावा दे रही है। 2. 2022 में एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया ने 18 से कम उम्र के बच्चों के संबंध में एडवाइजरी जारी की थी। लेकिन नए नियमों में बच्चों को पैसे के लेन-देन वाले गेम्स से दूर रखने के बारे में स्पष्ट प्रावधान नही हैं। 2023 में संसद से पारित डीपीडीपी कानून के अनुसार गेमिंग कम्पनियां बच्चों के डेटा का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। लेकिन उन्हें लागू करने के लिए नए नियमों में कोई व्यवस्था नहीं है। 3. डेटा को विदेश जाने से रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ाने के लिए 2020 में टिकटॉक और पबजी जैसे 177 चीनी एप्स पर सरकार ने प्रतिबंध लगाया था। ईडी जांच में चीनी गेमिंग एप के म्यूल खातों से साइबर अपराधों को बढ़ावा देने और क्रिप्टो के जरिये खरबों के हवाला लेन-देन का खुलासा हुआ था। गेमिंग चैट से युवाओं को कट्टरपंथ और आतंकवाद से जोड़ा जा रहा है। गेमिंग कम्पनियों के आपराधिक तंत्र पर लगाम के लिए इन नियमों में कठोर दंड का प्रावधान नहीं है। 4. विदेशों से संचालित हो रही गेमिंग कम्पनियां खरबों का गैर-कानूनी कारोबार करने के साथ बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी कर रही हैं। प्राइज मनी पर 58 हजार करोड़ की आयकर चोरी और 2.50 लाख करोड़ की जीएसटी चोरी के मामले अदालतों में लम्बित हैं। कौशल आधारित खेलों के पुराने वर्गीकरण को समाप्त करके ई-स्पोर्ट्स की आड़ में मनी गेमिंग एप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन विरोधाभासों और कानूनी बारीकियों का लाभ उठाकर गेमिंग कम्पनियां खरबों के टैक्स भुगतान से बचने का यत्न कर सकती हैं। 5. सरकार के पीआईबी नोट में ऑनलाइन सट्टेबाजी, जुआ, लॉटरी, फैंटसी स्पोर्ट्स, पोकर और रमी जैसे कार्ड गेम पर रोक लगाने का दावा किया गया था। नए नियमों में रियल मनी गेमिंग पर प्रतिबंध की गोल-मोल बात की गई है। सवाल यह है कि नए नियमों से ऑनलाइन सट्टेबाजी और गैम्बलिंग पर प्रतिबंध लगा है या नहीं? अगर प्रतिबंध नहीं लगा तो सरकार राज्यों के साथ मिलकर प्रभावी कानून क्यों नहीं बनाती? अगर लगा है तो बताना चाहिए कि राज्यों से जुड़े विषय पर केंद्र ने किस संवैधानिक हक से कानून बनाया है? विधि आयोग ने कहा था कि अगर सख्त कानून होता तो युधिष्ठिर भी अपने भाइयों और पत्नी को दांव पर नहीं लगाते। सोशल गेम और ई-स्पोर्ट्स की आड़ में मनी गेमिंग और सट्टेबाजी के मर्ज को कानूनी बढ़ावा देने से बच्चों का भविष्य दांव पर लगने के साथ अर्थव्यवस्था की नींव कमजोर हो सकती है। सट्टेबाजी और जुए को रोकने हेतु कानून बनाने के लिए केंद्र सरकार के पास अधिकार ही नहीं हैं। केंद्र सरकार ने अगस्त 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट में कहा था कि इस बारे में कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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