वैशाख अमावस्या 17 अप्रैल को:  सुबह सूर्य को चढ़ाएं अर्घ्य, दोपहर में करें पिंडदान और शाम को तुलसी के पास जलाएं दीपक
जीवन शैली/फैशन लाइफस्टाइल

वैशाख अमावस्या 17 अप्रैल को: सुबह सूर्य को चढ़ाएं अर्घ्य, दोपहर में करें पिंडदान और शाम को तुलसी के पास जलाएं दीपक

Spread the love




कल (17 अप्रैल) वैशाख माह की अमावस्या है। मान्यता है कि इस तिथि की शाम यानी प्रदोष काल में तुलसी के पास और मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसके अलावा अमावस्या तिथि पर पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों को तृप्ति मिलती है। घर-परिवार के मृत सदस्यों को पितर देव माना जाता है। वैशाख अमावस्या पर शनिदेव की विशेष पूजा करने की भी परंपरा है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, वैशाख अमावस्या पर व्रत करना चाहिए। इससे पितरों की कृपा मिलती है और घर-परिवार की परेशानियां दूर होती हैं। इस दिन पानी में काले तिल डालकर स्नान करने से कुंडली के शनि के दोष दूर होते हैं, ऐसी मान्यता है। स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल भरें और जल में कुमकुम, लाल फूल, चावल डालें, इसके बाद ऊँ सूर्याय नम: मंत्र का जप करते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाएं। इस दिन पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म खासतौर पर करना चाहिए। इसके लिए दोपहर में करीब 12 बजे गाय के गोबर से बने कंडे जलाएं और जब कंडों से धुआं निकलना बंद हो जाए, तब कंडों के अंगारों पर गुड़-घी अर्पित करें, पितरों का ध्यान करें। हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर पितरों को अर्पित करें। अमावस्या पर पितरों के नाम से जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं। अनाज, जूते-चप्पल, खाना, छाता, पानी, मटका, धन का दान भी करें। वैशाख अमावस्या पर पीपल को जल चढ़ाएं, परिक्रमा करें और पेड़ के नीचे दीपक जलाएं। पीपल की कम से कम 7 परिक्रमा करनी चाहिए। अमावस्या पर मांसाहार और नशा नहीं करना चाहिए। वैसे तो घर-परिवार में क्लेश नहीं करना चाहिए, लेकिन अमावस्या पर इस बात विशेष ध्यान रखना चाहिए। अगर घर में क्लेश होगा, तो पूजा-पाठ, श्राद्ध कर्म में ध्यान नहीं लग पाएगा और पूजा का पूरा फल नहीं मिलेगा। शुक्रवार और अमावस्या के योग में शुक्र देव की पूजा करें। शुक्र की पूजा शिवलिंग रूप में कर सकते हैं। शिवलिंग को बिल्व पत्र, धतूरा, आंकड़े के फूल, चावल चढ़ाएं। चंदन का लेप करें। ऊँ नम: शिवाय और ऊँ शुक्राय नम: मंत्र का जप करें। धूप-दीप जलाएं, आरती करें। मिठाई का भोग लगाएं। वैशाख अमावस्या से जुड़ी पौराणिक कथा कथा के मुताबिक, पुराने समय में धर्मवर्ण नाम का एक ब्राह्मण था। एक बार धर्मवर्ण ने किसी संत से सुना कि भगवान विष्णु का नाम स्मरण से ज्यादा पुण्य किसी दूसरे काम से नहीं मिलता है। इसके बाद धर्मवर्ण ने सांसारिक जीवन छोड़ दिया और संन्यास ले लिया। एक दिन घूमते हुए वह पितृलोक पहुंचा। वहां उसके पितर बहुत कष्ट में थे। पितरों ने बताया कि ऐसी हालत तुम्हारे संन्यास लेने की वजह से हुई है, क्योंकि उनके लिए पिंडदान करने वाला कोई नहीं है। पितरों ने कहा अगर तुम वापस जाकर गृहस्थ जीवन की शुरुआत करो, संतान उत्पन्न करो और वैशाख अमावस्या पर विधि-विधान से पिंडदान करो, तो हमें मुक्ति मिल सकती है। धर्मवर्ण ने पितरों को वचन दिया कि मैं आपकी ये इच्छा पूरी करूंगा। इसके बाद धर्मवर्ण ने संन्यास छोड़कर फिर से सांसारिक जीवन अपनाया, विवाह किया और वैशाख अमावस्या पर विधि विधान से पिंडदान कर अपने पितरों को मुक्ति दिलाई।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *