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इस सदी की शुरुआत तक हिंसक माओवादी विद्रोह की चुनौती काफी गहरा गई थी। ‘रेड कॉरिडोर’ फैलता जा रहा था। नतीजा यह हुआ कि डॉ. मनमोहन सिंह के शब्दों में, यह भारत के सामने सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बन गया। लेकिन भारत इस चुनौती से निपटने में सक्षम साबित हुआ है। रेड कॉरिडोर 2013 में 126 जिलों में फैल गया था, जो अब सिमटकर 11 जिलों तक रह गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की है कि नक्सलवादी विद्रोह आने वाले कुछ महीनों में पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। लेकिन यह उस तरह की विनाशकारी हिंसा के चलते नहीं हुआ, जैसी श्रीलंका ने 2009 में तमिल टाइगर्स को हराने के लिए अपनाई थी। न ही भारत ने उन क्रूर तौर-तरीकों का सहारा लिया, जिनका इस्तेमाल पेरू में अल्बेर्तो फुजीमोरी ने 1990 के दशक में ‘सेंदेरो लुमिनोसो’ गुरिल्लाओं को कुचलने के लिए किया था। भारत ने एक परिष्कृत रणनीति बनाई, जिसमें विद्रोह के कारणों और परिणामों- दोनों को ध्यान में रखा गया। कहानी की शुरुआत भूमिहीनता, आर्थिक वंचना और हाशिये पर पड़े समुदायों- खासकर दूरदराज के, संसाधन-समृद्ध वनों में रहने वाली आदिवासी आबादी की सरकारी सेवाओं तक पहुंच के अभाव की विरासत से होती है। इसने जमींदारों के खिलाफ किसान विद्रोह को जन्म दिया। विद्रोहियों ने माओवादी सैन्य रणनीति यानी जनयुद्ध को अपनाया। 2004 में, विद्रोह के विभिन्न धड़े एकजुट होकर सीपीआई (माओवादी) बने, जिसका उद्देश्य भारतीय लोकतंत्र को उखाड़ फेंकना और एक नया जनवादी राज्य स्थापित करना था। दूरस्थ इलाकों में प्रशासनिक और सुरक्षागत शून्यों का लाभ उठाते हुए सीपीआई (माओवादी) ने इन जिलों में समानांतर शासन का आभास दिया और स्वयं को पूंजीवादी शोषण के खिलाफ उत्पीड़ितों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया। उसे नए रंगरूट मिलते रहे। लेकिन संरक्षण का यह एजेंडा अकसर हिंसा के जरिये आगे बढ़ाया गया और इसकी वित्तीय व्यवस्था लूट तथा उगाही से की गई। जून 2009 में सरकार ने सीपीआई (माओवादी) और उसके सहयोगी संगठनों को आतंकवादी घोषित किया और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया। माओवादियों ने जवाब में हिंसा और तेज कर दी। 2010 में उन्होंने भारतीय अर्द्धसैनिक बलों पर सबसे घातक हमला किया, जिसमें छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के 74 जवान और दो पुलिसकर्मी मारे गए। तीन साल बाद एक और हमले में उसी राज्य के कांग्रेस पार्टी नेतृत्व को ले जा रहे काफिले को निशाना बनाया गया और उसे तबाह कर दिया गया। तत्कालीन यूपीए सरकार को एहसास था कि केवल दमन से काम नहीं चलेगा और एक ऐसे नए दृष्टिकोण की जरूरत है, जो सुरक्षा चुनौती के साथ-साथ उन आर्थिक शिकायतों का भी सामना करे, जो विद्रोह को पोषित कर रही थीं। यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गई कार्रवाई को 2014 के बाद गति मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई सरकार ने सुरक्षा और विकास- दोनों को ध्यान में रखते हुए एक व्यापक, बहु-स्तरीय रणनीति लागू की। सरकार ने पुलिस की क्षमताओं को मजबूत करने में भारी निवेश किया- आधुनिक हथियार, बेहतर संचार उपकरण और उग्रवाद-विरोधी अभियानों के लिए विशेष प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया। इसके अलावा, पहले से दुर्गम रहे इलाकों में सैकड़ों नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस स्थापित किए गए, जिससे माओवादियों के तथाकथित सुरक्षित क्षेत्र सिमटे और उनकी आवाजाही बाधित हुई। सरकार ने उगाही के नेटवर्क और अन्य अवैध आय स्रोतों पर भी प्रहार किया और केंद्रीय तथा क्षेत्रीय नेतृत्व को पकड़ने या निष्क्रिय करने के प्रयास तेज किए। साथ ही गरीबी-उन्मूलन और विकास के प्रयास भी किए गए। लेकिन स्थायी समाधान के लिए प्रणालीगत बदलाव भी अनिवार्य हैं। सरकार को जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। आर्थिक विकास की परिभाषा को इस तरह से गढ़ना होगा कि वह पारंपरिक अधिकारों का सम्मान करे। साथ ही, नए सिरे से अशांति के चक्र को जन्म देने से बचने के लिए शोषणकारी उपक्रमों को आदिवासी इलाकों को रिमोट-कंट्रोल से संचालित करने की कोशिशों से भी बाज आना चाहिए।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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