शहरों में छात्रों के रहने का नया मॉडल:  हॉस्टल-पीजी नहीं, अब को-लिविंग स्पेस पसंद; यहां पिक-ड्रॉप, डॉक्टर, स्नैक्स सब
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शहरों में छात्रों के रहने का नया मॉडल: हॉस्टल-पीजी नहीं, अब को-लिविंग स्पेस पसंद; यहां पिक-ड्रॉप, डॉक्टर, स्नैक्स सब

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एक समय था, जब बच्चा घर से बाहर किसी दूसरे शहर में पढ़ने या नौकरी के लिए जाता था तो माता-पिता की कोशिश रहती थी कि उस शहर में कोई रिश्तेदार या परिचित खोजा जाए, जिसके घर पर बच्चा रह सके। रिश्तेदार परिचित न हों तो संबंधित संस्थान के हॉस्टल में व्यवस्था खोजी जाती थी। वहां जगह न मिलने पर प्राइवेट हॉस्टल और पीजी बच्चों या सिंगल नौकरीपेशा लोगों के लिए रहने की जगह थे। मगर अब परिदृश्य बदल चुका है। अब को-लिविंग स्पेस ने इसकी जगह ले ली है। सिर्फ महानगर नहीं जयपुर, इंदौर, विशाखापट्टनम, अहमदाबाद जैसे शहरों में भी ये विस्तार कर चुके हैं। इनमें वे सभी सुविधाएं हैं, जो एक दशक पहले तक विदेशों में मिलती थीं। पेशेवर सफाई, धुले कपड़े, एसी कमरे, स्नैक वेंडिंग मशीनें, ड्रॉप-पिकअप सुविधा, ऑन-कॉल डॉक्टर और प्रॉपर्टी मैनेजर जैसी सहूलियतें किराये में शामिल होती हैं। बड़े कारण, जो ट्रेंड को बढ़ा रहे – डिमांड सप्लाई गैप; इंडिया ब्रांड इक्विटी का अनुमान है कि कैंपस में आवास क्षमता और छात्र संख्या में 80% का अंतर है, जिसे निजी छात्र आवास बाजार पाटने का लक्ष्य रखता है। – बढ़ती आमदनी; कोफाइंड के एक सर्वे के मुताबिक 51% युवा इन सुविधाओं पर अपनी आय का 25% से ज्यादा खर्च करने को तैयार। – अनुभव आधारित जीवनशैली; नई पीढ़ी के लिए अब सिर्फ कमरा नहीं, बल्कि जकूजी, जूस बार, को-वर्किंग स्पेस और कम्युनिटी इवेंट्स जैसे ‘एक्सपीरियंस’ भी मायने रखते हैं। इन्हीं कारणों से को-लिविंग स्पेस बढ़ रहे हैं। -शहरी माइग्रेशन; हर साल लाखों छात्र व प्रोफेशनल काम और पढ़ाई के लिए शहर बदलते हैं; उन्हें एक सुरक्षित विकल्प चाहिए। बड़ी कंपनियां, जो इस क्षेत्र में काम कर रही हैं बेन कैपिटल जैसे निवेशक भारी निवेश कर रहे हैं। कंपनी के पार्टनर सरित चोपड़ा कहते हैं, ‘भारत में छात्र आवास संबंधी प्राथमिकताओं में मौलिक बदलाव हो रहा है। इनकी मांग कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है।’ – स्टैंजा लिविंग : देश का सबसे बड़ा ऑर्गनाइज्ड ऑपरेटर बन चुका है। – जोलो स्टेज : कई मेट्रो और टियर-1 शहरों में अपनी सुविधाएं पहुंचा रही है। – कोलिव : बेंगलुरु बेस्ड नेटवर्क है। -हैलोवर्ल्ड : छात्रों और युवाओं के लिए सुविधाएं मुहैया कराने में एक्सपर्ट है। -नेस्टअवे : लिविंग, को-लिविंग कॉम्बो इसके अलावा, सेटलस, कोहो, कोवी, येलो लिविंग, ऑलिव लिविंग जैसे कई उभरते ब्रांड देश में प्रीमियम होस्टल सेगमेंट में काम कर रहे हैं। भारत का को-लिविंग मार्केट 2025 में लगभग ₹4,000 करोड़ रु. का था, जिसके 2030 तक पांच गुना बढ़कर ₹20,000 करोड़ रु. से भी ऊपर जाने का अनुमान है। चुनौतियां, जिनका हल जरूरी है – महंगा किराया: पारंपरिक पीजी की तुलना में को-लिविंग 20-30% महंगा हो सकता है। – गोपनीयता: साझा सुविधाएं होने से लोगों को प्राइवेसी की कमी महसूस हो सकती है। – गुणवत्ता में अंतर: मांग बढ़ने के कारण कई छोटे प्लेयर्स भी बाजार में आए हैं, जहां सुविधाओं की गुणवत्ता में भारी अंतर होता है। – रखरखाव की लागत: हाई-स्पीड इंटरनेट, 24 घंटे पावर बैकअप, जिम और हाउसकीपिंग जैसी सुविधाओं को बनाए रखने की लागत बहुत अधिक होती है। जरा सी भी लापरवाही से ग्राहक तेजी से दूसरी जगह शिफ्ट हो जाते हैं। – सांस्कृतिक बाधाएं: छोटे शहरों में अभी भी ‘साझा घर’ या अजनबियों के साथ रहने के विचार को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। एक्सपर्ट: प्रीमियम अनुभव ये को-लिविंग स्पेस छात्रों और नौकरीपेशा युवाओं को अलग अनुभव देते हैं। प्रीमियम रेसिडेंस स्टूडेंट हाउसिंग/होस्टल का सबसे नया सेगमेंट है। इसमें ट्रिपल शेयरिंग रूम के एक बेड का किराया 50 हजार रु. महीने तक हो सकता है। लेकिन इसमें पूल, पिकलबॉल कोर्ट, स्विमिंग पूल, ब्रेकफास्ट जैसी कई सुविधाएं शामिल हैं।’ – गौरव भाथेना, स्टूडेंट हाउसिंग इंडिया फायदा, अकेलेपन में कमी आ रही है कम्युनिटी-इवेंट्स, गेम नाइट्स, फिटनेस क्लासेस से नए शहर में सोशल सर्कल बनाना आसान हुआ है। छात्रों और युवा प्रोफेशनल्स के अकेलेपन में कमी आ रही है। बेहतर और आसान रहने की सुविधा से छात्र और युवा मेट्रो शहरों में आने के लिए ज्यादा तैयार हैं।



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