शेखर गुप्ता का कॉलम:  चीन एनर्जी-संकट से क्यों नहीं जूझ रहा?
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शेखर गुप्ता का कॉलम: चीन एनर्जी-संकट से क्यों नहीं जूझ रहा?

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एलपीजी और प्राकृतिक गैसों की कमी भारत में घरों से लेकर मझोले तथा लघु उद्योगों और खाद उत्पादन तक को जिस तरह से परेशान कर रही है, इसका जायजा लेते हुए मुझे उत्सुकता हुई कि चीन इतना शांत क्यों है। नतीजा यह निकला कि उसने बुद्धिमानी बरती। चीन के पास भी हमारी तरह तेल और गैस का बड़ा भंडार नहीं है और वह भी इनका काफी आयात करता है। लेकिन वह हमारी तरह दहशत में नहीं है। कैसे? हमें मालूम है कि चीन को भारी मात्रा में कच्चा तेल और थोड़ी गैस रूस से जमीनी पाइपलाइन से मिलती है। लेकिन क्या यह उसके लिए पर्याप्त है? यहां हम खाद को लेकर परेशान हैं, क्योंकि खरीफ फसल की बुआई शुरू होने वाली है। लेकिन चीन बेफिक्र है- न केवल अपनी जरूरतों, बल्कि निर्यात के अपने सौदों को लेकर भी। हम खाद के लिए चीन से आयात पर भी निर्भर हैं। जब पूर्वी लद्दाख और गलवान में संकट की स्थिति बनी थी तब हमें खाद की कमी से जूझना पड़ा था। लेकिन चीन ने अभी अप्रत्याशित स्थिति को कारण बताकर खाद के अपने निर्यात से इनकार नहीं किया है। वास्तविकता ने मुझे सदमे में डाल दिया। सदमा चीन की कामयाबी को लेकर भी था और हमारे चलताऊ रवैये को लेकर भी। चीन के पास गैस फील्ड कम ही हैं लेकिन गैस पर्याप्त है। इसकी वजह यह है कि चीन ने कोयले से गैस बनाने में पूंजी, हुनर और टेक्नोलॉजी का धैर्य के साथ निवेश किया। इस आइडिया पर भारत और चीन ने एक ही साथ विचार शुरू किया था, लेकिन आज चीन 80 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष (एमएमटीपीए) गैस का उत्पादन कर रहा है और हम इसका मात्र 3-5 फीसदी ही कर रहे हैं। चीन गैस उत्पादन के लिए 340 एमएमटीपीए कोयले का इस्तेमाल कर रहा है, जबकि भारत इसका मात्र 1.4 प्रतिशत कोयला इस्तेमाल कर रहा है। यूपीए सरकार ने 2007 में कोयले से मीथेन गैस बनाने की बड़ी-बड़ी बातें की थीं और रानीगंज में एक छोटा-सा पायलट संयंत्र भी बनवाया था। उसके बाद इस आइडिया को भुला दिया गया। वैसे भी, यूपीए सरकार के दौरान कोयला काफी बदनाम हुआ था। कोविड के बाद सुधारों की जो झड़ी लगी, उसमें 2020 में मोदी सरकार ने नेशनल कोल गैसीफिकेशन मिशन का शुभारंभ किया। उस योजना के तहत 2030 तक 100 एमएमटीपीए कोयले के इस्तेमाल से गैस उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया था। इस योजना में चार लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जाना था। 100 एमएमटीपीए पर हमारा कोयला गैस (जिसे सिंथेटिक या सिनगैस भी कहा जाता है) उत्पादन चीन के उत्पादन से 25 फीसदी ज्यादा होता। आज हम इस दस वर्षीय योजना के छठे साल में हैं और कुल उत्पादन 5 एमएमटीपीए ही है (अच्छे उत्पादन वाले साल में)। इसमें से 1.8 एमएमटीपीए का उत्पादन ओडिशा के अंगुल में जिंदल स्टील एंड पावर प्लांट में होता है, जिसमें नई आधुनिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जा रहा है और यह ज्यादातर आंतरिक खपत के लिए है। इसके अलावा, कोयला मंत्रालय और नीति आयोग की वेबसाइटें बताती हैं कि कोयले से गैस उत्पादन की सात परियोजनाओं के लिए 64,000 करोड़ के निवेश की मंजूरी दी जा चुकी है। लगभग ये सारी परियोजनाएं सार्वजनिक क्षेत्र में कोल इंडिया लिमिटेड के साथ संयुक्त उपक्रम के रूप में लागू होंगी, लेकिन फिलहाल ये नियमन वाले चक्र में चक्कर लगा रही हैं। मैंने झारखंड के जामताड़ा के कस्टा में ‘ईस्टर्न कोलफील्ड्स’ (कोल इंडिया की सहायक कंपनी) की भूमिगत कोल गैसीफिकेशन परियोजना के बारे में पढ़ा। इसे अब तक उत्पादन शुरू कर देना चाहिए था। लेकिन यह कोयला और पर्यावरण मंत्रालयों के बीच विवाद में उलझकर रह गई है। पर्यावरण मंत्रालय जोर दे रहा है कि परियोजना को जमीन के 300 मीटर नीचे होना चाहिए। कोयला मंत्रालय 150-160 मीटर नीचे लगाना चाहता है। नतीजा वही पुरानी कहानी। हमने कोयला निकासी भी खुली खदानों तक सीमित कर रखी है। हमारा पूरा भूमिगत कोयला यूं ही पड़ा हुआ है, जबकि चीन जमीन के अंदर तीन किमी तक जाकर कोयले की निकासी कर रहा है। कोयला मंत्रालय की वेबसाइट पर दो अच्छी चीजें पढ़ने को मिलीं, जो निजी कंपनी समूहों अदाणी और जिंदल की ओर से डाली गई थीं। वे याद दिलाती हैं कि भारत के पास दुनिया में कोयले का पांचवां सबसे बड़ा भंडार है। वे फ्लो-चार्टों के जरिए टेक्निकल प्रक्रिया को स्पष्ट करती हैं और बताती हैं कि क्या सुधार किए जा सकते हैं और क्या संसाधन चाहिए। वे इन दिनों प्रचलित ‘एनर्जी आत्मनिर्भरता’ समेत दूसरे लाभ भी गिनाती हैं। दूरदर्शिता के मामले में हम चीन से पीछे नहीं हैं। लेकिन चीन के विपरीत हम कथनी को करनी में बदलने में पीछे रह जाते हैं। यह हमारी ही फितरत नहीं है। दुनिया में कोयले के सातवें सबसे बड़े और उच्च स्तर वाले भंडार वाला इंडोनेशिया भी फिसड्डी रहा है। वह भी कोयले से गैस बनाने की दिशा में बढ़ ही रहा है। चीन ने काफी पहले समझ लिया था कि तेल के मामले में झटके लगते रहेंगे। अमेरिका अपने फायदे के लिए प्रतिबंधों का इस्तेमाल करता रहेगा। इसलिए उसने उस चीज में निवेश करने का फैसला किया, जो उसके कब्जे में है और उसने बाजार की उथल-पुथल की परवाह न करते हुए उस राह पर चलना जारी रखा। हाइड्रोकार्बन में गिरावट के दौरान भी उसने अपना रास्ता नहीं छोड़ा। उसे कोयले को राष्ट्रीय रणनीतिक लक्ष्य बनाना एनर्जी के मामले में आजादी हासिल करने का मंत्र लगा और उसने यह किया। हम मीनमेख में उलझे रहे। डाइअमोनियम फास्फेट के लिए अमोनिया जरूरी है। भारत इसका अधिकांश भाग आयात करता है। इसकी इतनी कमी है कि हताश किसान इसके लिए दंगा और लूटपाट न कर बैठें, इससे बचने के लिए कई राज्यों ने इसकी सप्लाई को पुलिस थानों में जमा करना शुरू किया है। इसे किसानों की भूमि के रिकॉर्ड और आधार कार्ड पर आधारित रजिस्ट्रेशन के हिसाब से आवंटित किया जाता है। चीन पूरी दुनिया की जरूरत के यूरिया का 40 फीसदी हिस्सा कोयले से हासिल की जाने वाली सिंथेटिक गैस से उत्पादित करता है। इसके अलावा वह पूरी दुनिया की जरूरत के मिथानोल का 54 फीसदी हिस्सा उत्पादित करता है, जिसका करीब 70 फीसदी भाग कोयले से हासिल किया जाता है। इस सबमें हम कहां खड़े हैं? उस चीज में निवेश किया, जो चीन के पास मौजूद थी…
चीन ने काफी पहले ही समझ लिया था कि तेल के मामले में झटके लगते रहेंगे। अमेरिका अपने फायदे के लिए प्रतिबंधों का इस्तेमाल करता रहेगा। इसलिए उसने उस चीज में निवेश करने का फैसला किया, जो उसके कब्जे में है और बाजार की उथल-पुथल की परवाह नहीं की।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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