संजय कुमार का कॉलम:  भाजपा ने धीरे-धीरे अपने जनाधार को कैसे बढ़ाया?
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संजय कुमार का कॉलम: भाजपा ने धीरे-धीरे अपने जनाधार को कैसे बढ़ाया?

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1 घंटे पहले

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संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार

आज की भाजपा को देखें तो इसने आजादी के बाद न सिर्फ अपना नाम बदला, बल्कि अपने सामाजिक आधार में भी बड़ा बदलाव किया है। 1951 से 1977 के बीच इसे जनसंघ के नाम से जानते थे। फिर 1977 से 1980 के बीच यह जनता पार्टी हुई और अंतत: 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने इसे भारतीय जनता पार्टी के तौर पर स्थापित किया।

बीते दशकों में पार्टी का जनाधार बहुत तेजी से बढ़ा है, जिसके चलते कुछ दशकों तक भारतीय राजनीति के हाशिए पर रही भाजपा आज पूर्ण चुनावी प्रभुत्व वाली पार्टी बन गई है। एक जमाने में इसे ब्राह्मण-बनिया पार्टी कहा जाता था। लेकिन तब से अब तक पार्टी के समर्थकों में हुए व्यापक बदलाव के चलते अब भाजपा ग्रामीण, बहुजन, निचले और गरीब तबके के मतदाताओं में गहरी जड़ें जमा चुकी है।

यह सब इसलिए संभव हुआ, क्योंकि पार्टी ने नाम के साथ अपनी विचारधारा, चुनावी-रणनीति और शासन के तौर-तरीकों में भी बदलाव किया। मौजूदा भाजपा की हिन्दुत्व विचारधारा का विपक्ष के पास कोई तोड़ नहीं दिख रहा।

राष्ट्रीय गौरव का आभास देने वाला धुर-राष्ट्रवाद, सरकारी योजनाओं के जरिए बनाया गया बड़ा वोट बैंक और पार्टी की वित्तीय और संगठनात्मक ताकत ने आज इसे दुर्जेय बना दिया है। 1996 के लोकसभा चुनाव से अब तक हुए लोकनीति-सीएसडीएस के विभिन्न चुनाव-उपरांत सर्वेक्षणों से मिले प्रमाण यह इशारा करते हैं कि भाजपा ने उन मतदाता वर्गों में भी गहरी पैठ जमा ली है, जो दशकों तक उसे वोट नहीं देते थे।

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की आबादी को लेकर भले ही अभी विवाद हो, लेकिन इन सर्वेक्षणों के साक्ष्य बताते हैं कि भाजपा ने इस बड़े मतदाता वर्ग में भी व्यापक समर्थन हासिल किया है। 1996 के चुनाव में महज 19% ओबीसी मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया था, लेकिन 2024 के चुनाव में भाजपा को इस वर्ग के 43% वोट मिले। यह ओबीसी वोटरों में भाजपा के व्यापक तौर पर बढ़े जनाधार को बताता है।

इसी प्रकार भाजपा ने दलित, आदिवासी कहे जाने वाले बहुजन समाज भी में भी अपनी पकड़ मजबूत की है। 1996 के चुनाव में पार्टी को दलित समुदाय के सिर्फ 14% वोट मिले, जो 2024 में बढ़ कर 31% हो गए। आदिवासी मतदाताओं में भी पार्टी ने 1996 के 21% मतों की तुलना में 2024 में 48% वोट हासिल किए।

परंपरागत तौर पर भाजपा को ऐसी पार्टी माना जाता था, जो उच्च और मध्यम वर्ग के मतदाताओं के बीच लोकप्रिय थी। गरीब तबके के वोटरों में पार्टी को उतना पसंद नहीं किया जाता था। लेकिन विभिन्न आर्थिक वर्ग के मतदाताओं के दृष्टिकोण से भी पार्टी के जनाधार में जबर्दस्त परिवर्तन हुआ है।

अब पार्टी उच्च और मध्यम आयवर्ग के साथ ही गरीब वर्ग के मतदाताओं में भी समान रूप से लोकप्रिय है। 2014 के लोकसभा चुनाव में गरीब तबके से जुड़े वोटरों के 24% मत भाजपा को मिले थे, जो 2024 में बढ़कर 37% हो गए।

भाजपा शासित राज्यों में लगातार गरीबों को लाभ देने वाली योजनाएं संचालित की गईं और इसी के कारण यह संभव हो पाया। बहुत कम ही सही, लेकिन मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी पार्टी ने समर्थन हासिल किया है। 1996 के चुनाव में 2% मुस्लिम वोट पार्टी को मिले थे, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 8% पहुंच गया।

भाजपा के जनाधार में इस विस्तार को न सिर्फ सामुदायिक, बल्कि भौगोलिक नजरिए से भी देखा जा सकता है। शहरी भारत की पार्टी कही जाने वाली पार्टी बीते दशक में गांवों में भी समान रूप से लोकप्रिय हो गई। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां पार्टी को 30% ग्रामीण मतदाताओं ने मत दिया, वहीं 2024 में उसे गांवों से 36% वोट मिले।

भाजपा के जनाधार में इस विस्तार ने पार्टी को स्पष्ट तौर पर एक ऐसी पार्टी बना दिया, जिस पर जीत हासिल करना बेहद कठिन है। इस विस्तार के दम पर पार्टी ने ना केवल एक के बाद एक कई चुनाव जीते, बल्कि 14 राज्यों में खुद की और सात राज्यों में गठबंधन दलों के साथ सरकारें बनाईं।

यहां यह भी जोड़ना जरूरी है कि भाजपा ने 2014, 2019 और 2024 में लगातार विजय हासिल कर इतिहास भी रच दिया। अटल-आडवाणी के दौर की भाजपा की तुलना में आज की भाजपा के पास तुलनात्मक तौर पर अधिक स्थायी जनाधार है। नई भाजपा टिके रहने के लिए है, क्योंकि आज पार्टी की जड़ें कहीं अधिक गहरी और व्यापक हैं।

एक जमाने में भाजपा को ब्राह्मण-बनिया पार्टी कहा जाता था। लेकिन तब से अब तक पार्टी के समर्थकों में हुए व्यापक बदलाव के चलते वह ग्रामीण, बहुजन, निचले और गरीब तबके के मतदाताओं में भी गहरी जड़ें जमा चुकी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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