सुनीता नारायण का कॉलम:  ‘यूज-एंड-थ्रो’ की संस्कृति से कचरा और बढ़ता जा रहा है
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सुनीता नारायण का कॉलम: ‘यूज-एंड-थ्रो’ की संस्कृति से कचरा और बढ़ता जा रहा है

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9 घंटे पहले

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सुनीता नारायण पर्यावरणविद् - Dainik Bhaskar

सुनीता नारायण पर्यावरणविद्

बीते करीब 50 सालों में दुनिया ने दीर्घजीवी और कभी ना नष्ट होने वाली ऐसी चीजों की भयावह समस्या के बारे में जाना है, जो कभी चमत्कारिक मानी जाती थीं। डीडीटी को ही ले लीजिए, जो पर्यावरण में इतने लंबे समय तक बना रहता है कि वह मनुष्य के रक्त और पक्षियों के अंडों तक में भी इकट्ठा होने लगता है। या फिर क्लोराफ्यूरोकार्बन जैसे रसायन, जिन्होंने सच में ही ओजोन पर्त में छेद कर दिया है।

इनसे भी बदतर कार्बन डाइ ऑक्साइड है, जो 150 से 200 वर्षों तक पर्यावरण में बनी रहती है और जलवायु परिवर्तन के तौर पर इसके विनाशकारी परिणाम सामने आ रहे हैं। प्लास्टिक को भी इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

यह हमारे रोजमर्रा के जीवन का अनिवार्य अंग बन गया है, लेकिन अब वह हमारे पर्यावरण के लिए एक बड़ी मुसीबत बन चुका है। प्लास्टिक-कचरा समुद्रों को प्रदूषित कर रहा है और मछलियों के जरिए खाद्य शृंखला में भी प्रवेश कर गया है।

भारत में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने सिंगल यूज प्लास्टिक के तौर पर चिह्नित 19 वस्तुओं को प्रतिबंधित किया है। पैकेजिंग मैटेरियल समेत अन्य प्लास्टिक कचरे को एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पांसिबिलिटी (ईपीआर) नियमों के अधीन लाया गया है, जिसके तहत कंपनियों को उनके द्वारा नि​र्मित प्लास्टिक कचरे की एक नियत मात्रा को वापस लेना होता है। हर कंपनी इसे या तो री-प्रोसेस करती है या इसे सुरक्षित तरीके से नष्ट करती है। इसके जरिए यह आशा की जाती है कि हमारी नदियों, सड़कों पर भर रहे इस प्लास्टिक का प्रबंधन बेहतर हो पाएगा।

लेकिन नियम-कायदे उस तरह से कारगर नहीं हो रहे, जैसे उनको होना चाहिए। सिंगल यूज प्लास्टिक अब भी उपलब्ध है। प्रतिबंधित कैरी-बैग्स की मोटाई को लेकर भारी असमंजस है। अधिकतर सिंगल यूज प्लास्टिक आइटम छोटे और अनौपचारिक क्षेत्र में तैयार हो रहे हैं, ऐसे में इन पर प्रतिबंधों को अमल में लाना चुनौती भरा है। पारदर्शिता और अनुपालन के अभाव में ईपीआर व्यवस्था कमजोर हो गई है।

यहां अच्छी खबर भी है। कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने प्लास्टिक कैरी-बैग्स के उपयोग पर रोक लगाई है। कई शहरों में गीले-सूखे कचरे को अलग-अलग संग्रहीत करना शुरू किया गया है, ताकि प्लास्टिक समेत अन्य सूखे कचरे को री-प्रोसेस्ड किया जा सके।

ये निकाय या तो मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) बना रहे हैं, जहां री-साइकल हो सकने वाले प्लास्टिक को छांटकर कचरे से अलग किया जा सके। या वे कचरे से इस “मूल्यवान’ हिस्से को निकालने के लिए सीधे अनौपचारिक क्षेत्र के साथ काम कर रहे हैं। री-साइकल नहीं हो सकने वाले प्लास्टिक कचरे को सीमेंट प्लांट की भट्टियों में थर्मल ट्रीटमेंट के लिए भेज दिया जाता है या सड़क निर्माण में इसे काम में ले लिया जाता है।

लेकिन अब भी बहुत चुनौतियां हैं। सब जानते हैं कि जिसे इकट्ठा करना ही मुश्किल है, उसे रीसाइकल करने के लिए नहीं भेजा जा सकता। इसीलिए 2016 के प्लास्टिक प्रबंधन नियमों में अनिवार्य किया गया कि गुटखा और चिप्स की पैकिंग में काम आने वाले प्लास्टिक समेत सभी प्रकार के बहुस्तरीय प्लास्टिक को 2018 तक चरणबद्ध तरीके से उपयोग से बाहर किया जाए।

लेकिन बाद में नियमों में संशोधन कर कह दिया गया कि ऐसा तभी किया जाएगा, जब बहुस्तरीय प्लास्टिक रीसाइकल करने और फिर से ऊर्जा प्राप्त करने योग्य नहीं होगा। जबकि कचरे और लैंडफिल्स में मिलने वाले इस प्लास्टिक का कोई मोल नहीं और इसे एकत्र करना और री-प्रोसेस करना मुश्किल है।

हमें यह भी समझना होगा कि आज यदि हम प्लास्टिक कचरा प्रबंधन कर पा रहे हैं तो यह अनौपचारिक क्षेत्र के उन लाखों मजदूरों की बदौलत है, जो हमारी फेंकी चीजों में से भी अपने लिए मूल्य निकाल पा रहे हैं। हमें हमारे कचरे के प्रति जिम्मेदार होना पड़ेगा। यूज-एंड-थ्रो के बजाय, जिम्मेदारी से उपयोग करें। प्लास्टिक का उपयोग कम से कम हो, कचरे को अलग-अलग संग्रहीत किया जाए और रीसाइकलर्स को सहयोग किया जाए। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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