सुप्रीम कोर्ट बोला- महिलाएं होममेकर नहीं, राष्ट्र निर्माता हैं:  सड़क दुर्घटना केस में कहा- उनके श्रम की कीमत ₹30 हजार महीना; पति को 62 लाख का मुआवजा
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सुप्रीम कोर्ट बोला- महिलाएं होममेकर नहीं, राष्ट्र निर्माता हैं: सड़क दुर्घटना केस में कहा- उनके श्रम की कीमत ₹30 हजार महीना; पति को 62 लाख का मुआवजा

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नई दिल्ली4 दिन पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला में कहा, ‘सड़क हादसे में गृहिणियों की मौत होने पर उनके द्वारा की जाने वाली परिवार की देखभाल और घरेलू काम की कीमत कम से कम ₹30 हजार प्रति महीना (₹3.6 लाख सालाना) मानी जाएगी।’

जस्टिस संजय करोल और न्यायाधीश एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा- यह रकम ‘प्रणय सेठी’ मामले में तय अन्य सभी मुआवजा नियमों के अलावा होगी। घर संभालने वाली महिलाओं को राष्ट्र निर्माता (नेशन बिल्डर) का दर्जा मिलना चाहिए। उनके काम की तुलना किसी पेशेवर से करके उनके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता।

दरअसल, कोर्ट का यह फैसला नवंबर 2001 में हरियाणा में सड़क हादसे में हुए गृहणी की मौत के मामले में हुई सुनवाई पर आया। बेंच ने 25 साल पहले हुए हादसे में पत्नी को खो चुके व्यक्ति को ₹62.77 लाख का मुआवजा मंजूर किया।

दरअसल, सड़क हादसों के मुआवजा मामलों की सुनवाई करने वाले मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) में अक्सर गृहिणियों के योगदान का मूल्यांकन करना चुनौती होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है।

सुप्रीम कोर्ट की 6 बातें, कहा- महिलाएं प्रतिदिन 7 घंटे से ज्यादा का करती हैं

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 15-59 साल की आयु के बीच की महिलाएं प्रतिदिन 7 घंटे से अधिक समय बिना वेतन वाले घरेलू कामों में बिताती हैं, जबकि पुरुष ऐसे कार्यों में 3 घंटे से भी कम समय देते हैं। महिलाएं बिना वेतन वाले देखभाल और घरेलू कार्य पुरुषों की तुलना में 2.6 गुना अधिक करती हैं, यहां तक कि तब भी जब वे आर्थिक रूप से योगदान दे रही होती हैं।’
  • एक गृहिणी का काम केवल खाना बनाना, बच्चों की देखभाल और घर संभालना नहीं है। वह परिवार की नींव को मजबूत बनाती है, अगली पीढ़ी तैयार करती है। जब किसी दुर्घटना के कारण गृहिणी की मौत हो जाती है, तब उसका मुआवजा तय करते उसके योगदान का आकलन जरूरी है।
  • यदि किसी सड़क दुर्घटना में गृहिणी घायल हो जाती है या उसकी मौत हो जाती है, तो परिवार को केवल उसकी आय न होने के आधार पर कम मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
  • गृहिणियों की आय का आकलन करते समय उनकी उम्र, एजुकेशन, स्किल, पारवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक हालात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • ‘मुआवजा न तो किसी के लिए अचानक छप्परफाड़ लॉटरी जैसा होना चाहिए और न ही इतनी कम रकम होनी चाहिए कि पीड़ित का मजाक बने।

सुप्रीम कोर्ट ने 2 आदेश दिए, दावों का निपटारा एक साल में हो

  1. देश के सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अपील की है कि वे खुद ऐसे मामलों की निगरानी करें और निर्देश जारी कर तय समय में मामलों का निपटारा सुनिश्चित कराएं।
  2. मुआवजा केस सालों पेंडिग रहने पर कोर्ट ने ध्यान दिया। 120 से अधिक मामलों के विश्लेषण में पाया कि हाई कोर्ट में ऐसे मामले औसतन 8 साल और ट्रिब्यूनलों में 6 साल लंबित रहते हैं। कई मामलों में पीड़ितों को न्याय के लिए 15 से 18 साल तक इंतजार करना पड़ा। कोर्ट ने कहा कि ये पेंडेंसी न्यायसंगत और उचित मुआवजे की अवधारणा को कमजोर करती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सड़क दुर्घटना के दावों का निपटारा आमतौर पर एक साल के भीतर हो जाना चाहिए। 4 साल से अधिक समय से लंबित मामले पहले निपटाए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पुरुष भी राष्ट्रनिर्माता हो सकते हैं

  • गृहिणी की मृत्यु पर मुआवजे के लिए 30 हजार रु. प्रतिमाह न्यूनतम आय मानेंगे। फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स, मल्टीप्लायर और अन्य मद जोड़ मुआवजा तय होगा।
  • कोई महिला नौकरी के साथ घर संभालती है। हादसे में मृत्यु पर मुआवजा तय करते समय ‘लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर’ का घटक उसकी आय में अतिरिक्त जुड़ेगा।
  • कोर्ट ने माना कि पुरुष भी होममेकर हो सकते हैं। इसे मान्यता मिलनी चाहिए। हालांकि, 30 हजार रुपए मासिक का मानक अभी महिलाओं तक सीमित रहेगा।

अब समझिए अब तक क्या थे नियम?

देश की अदालतें और एक्सीडेंट ट्रिब्यूनल किसी हादसे में जान गंवाने वाली गृहिणियों का मुआवजा तय करने के लिए एक ‘काल्पनिक आय’ मानती थीं। जिसे न्यूनतम मजदूरी के आधार पर तय किया जाता था। उन्हें कुशल या अकुशल श्रमिक माना जाता था।

2001 में हरियाणा की महिला की हादसे में मौत पर आया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला हरियाणा में एक मोटर एक्सीडेंट दावे पर आया। नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उसके पति और 3 बच्चों ने मुआवजे के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था।

ट्रिब्यूनल ने 2003 में मुआवजा दिया, लेकिन यह मामला सालों तक उलझा रहा। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दिसंबर 2024 में 8 लाख रुपए से ज्यादा का मुआवजा देने का आदेश दिया था। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कोर्ट ने दुर्घटना के दो दशक से भी फैसला ना आने पर आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट मुआवजे के दावे पर आम तौर पर एक साल के अंदर फैसला आ जाना चाहिए।

बेंच ने जिस प्रणय सेठी के केस का जिक्र किया, उसके बारे में जानिए

प्रणय सेठी मामला मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून का एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला है, जिसे सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच ने 2017 में दिया था।

मामला यह था कि सड़क दुर्घटनाओं में मौत होने पर मुआवजा तय करते समय अलग-अलग अदालतें अलग-अलग तरीके अपना रही थीं। इस वजह से एक जैसे हालात में भी मुआवजे की राशि में बड़ा अंतर आ जाता था।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद यह सिद्धांत तय किया था कि सड़क दुर्घटना में मौत होने पर मुआवजा तय करते समय मरने वाले की वर्तमान आय ही नहीं, बल्कि भविष्य में आय बढ़ने की संभावना को भी शामिल किया जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि अंतिम संस्कार, संपत्ति की हानि और जीवनसाथी के साथ संबंधों की हानि जैसी मदों के लिए एक समान और तय मानक अपनाए जाएं, ताकि देशभर में मुआवजा देने का तरीका एक जैसा और न्यायसंगत रहे, ताकि एक जैसे हालात होने पर अलग-अलग अदालतें, अलग-अलग मुआवजा न दें।

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